आख़िर तीन तलाक़ पर क़ानून की बात इसी वक़्त क्यों उठी?

नासिरूद्दीन, TwoCircles.net के लिए


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जी हां, क्यों तलाक़-ए-बिद्दत यानी एक म‍जलिस की तीन तलाक़ का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के लगभग तीन महीने बाद फिर उभर आया है? याद कीजिए, अगस्त में हमारी सरकार का नज़रिया क्या था? उस वक़्त तो वह ख़ास इस मुद्दे पर क़ानून की बात नहीं कर रही थी. है न?   

तब फिर अभी क्यों?

ठीक गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले तीन तलाक़ पर क़ानून बनाने का ख्याल क्यों हवा में तैरने लगा? क्या यह गौर करने वाली बात नहीं है? क्या मुसलमान महिलाओं से उमड़ते लगाव का चुनाव से कोई रिश्ता बनता जा रहा है? इसका सही-सही जवाब इन लाइनों को लिखने के वाले के पास नहीं है. तो आइए हम मिलकर समझने की कोशि‍श करते हैं कि क्या हो रहा है. 

बदलाव का पहिया इतना तेज़ कैसे घूमने लगा

अचानक एक दिन ख़बर आती है, लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के कई शहरों में तीन तलाक़ पर क़ानून के पक्ष में, प्रधानमंत्री और मौजूदा सरकार वाली पार्टी के हक़ में मुसलमान महिलाओं के जुलूस निकल रहे हैं. ये महिलाएं प्रधानमंत्री से कह रही हैं, ‘आपने हमारा साथ दिया, हम आपका साथ देंगे.’

इनकी अपील है, ‘तीन तलाक़ मुद्दे पर हम मोदी जी के साथ हैं: भाजपा को वोट करें.’ यूपी में तो इस वक़्त कोई चुनाव हो नहीं रहा है. फिर ये मुसलमान महिलाएं इस वक़्त किससे वोट देने की अपील कर रही हैं.

जी, अंदाज़ा बिल्कुल सही है. ये अपील गुजरात चुनाव के लिए है. ये भारतीय जनता पार्टी की जीत की दुआएं कर रही हैं. ये महिलाएं कौन हैं? किस संगठन की हैं? कैसे लाई गई हैं? इन सब पर अलग से लम्बी बात हो सकती है. पर यह मुसलमान महिलाएं सड़क पर भाजपा के साथ दिख रही हैं, यह तो हक़ीक़त है.

इससे पहले भी कुछ होता है. एक दिन इत्ती सी ख़बर आती है कि तीन तलाक़ को रोकने के लिए सरकार क़ानून बनाएगी. जब वह बात आई-गई होने लगी तो चंद रोज़ बाद ही एक और चौंकाने वाली ख़बर आई कि अब तो क़ानून का मसौदा भी तैयार है. दिसम्बर में संसद के सत्र में इस पर विचार भी होगा. इस बीच इस मसौदे पर सहमति मिलने लगी. उत्तर प्रदेश सरकार ने कैबिनेट में विचार कर इस पर अपनी मुहर भी लगा दी. इतनी तेज़ी से महिलाओं के हक़ ‘सामाजिक बदलाव’ का पहिया कैसे घूमने लगा?

क्या मज़हबी लीडरशिप को उकसाने की कोशि‍श है…

ऐसा लगता है कि कुछ लोगों को मुसलमानों के दकियानूस, मर्दाना मज़हबी लीडरशिप से उम्मीद के मुताबिक़ इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया नहीं मिल रही है. वे उन्हें लगातार उकसाने की कोशि‍श में लगे हैं. वे चाहते हैं कि यह समूह कुछ तीखी प्रतिक्रिया के साथ मैदान में आए.

सुप्रीम कोर्ट में केस के दौरान कई उदारमना-तरक़्की़पसंद लोग भी इस मज़हबी लीडरशिप से वैसे ही उम्मीद लगाए बैठे थे, जैसा उन्होंने अस्सी की दहाई में शहनाज़ और शाहबानो के मामले में किया था.

मगर जाहिर है, गंगा में तब से बहुत पानी बह चुका है. इस लीडरशि‍प ने भी बदलते समाजी-सियासी माहौल में अपने तौर-तरीक़ों में बदलाव किया है. उसके काम करने का अंदाज़ बदला है. इसीलिए उसने सु्प्रीम कोर्ट में केस के दौरान और फैसले के बाद ऊपरी तौर पर वैसा कुछ भी नहीं किया, जैसा वलवला उन्होंने तीस साल पहले पैदा किया था.

सवाल है, क्या कुछ लोग चाहते हैं कि यह वलवला फिर पैदा हो? क्या इसलिए वे तीन तलाक़ के मुद्दे पर उन्हें लगातार उकसाने में लगे हैं? वैसे, इस बार इनकी यह रणनीति थोड़ी कामयाब भी दिखती है. मीडिया ने इस पर जबरन चर्चा भी शुरू कर दी है. मीडिया में ‘शरीअत में दखलंदाज़ी’ की आवाज़ को जगह मिलने लगी है. जगह-जगह से इसके ख़ि‍लाफ़ ख़बरें आना शुरू हो रही हैं.

मुसलमानों में खौफ़ और महिलाओं से लगाव- ये कैसा रिश्ता है…

एक और बात गौर करने लायक़ है. आमतौर पर इस मुल्क की सेक्यूलर मानी जाने वाली पार्टियां मुसलमानों के मुद्दे पर वही बात बोलती रही हैं, जो इस समुदाय के मर्दाना दकियानूस मज़हबी लीडरशिप को पसंद आता रहा है. वे उन मुद्दों पर बोलने से कतराती रही हैं, जिनका वास्ता मुसलमान महिलाओं की ज़िन्दगी या उनके हक़ों से रहा है.

भारतीय जनता पार्टी ने इस कमज़ोर कड़ी को मज़बूती से पकड़ लिया है. वह मुसलमानों से कितना लगाव रखती है, यह बात उससे बेहतर कोई नहीं जानता है. इसलिए मुसलमान महिलाओं की हालत और उनके हक़ के प्रति उसका लगाव कितना ईमानदार है, यह तो आने वाला वक़्त बताएगा. हालांकि, वह इसका इस्तेमाल करने में बखूबी लगी है. इसका फ़ायदा भी उन्हें मिला है.

एक तरफ़ देश के बड़े हिस्से के मुसलमानों पर खौफ़ का साया है. उनकी ज़िन्दगी और रोज़ी पर संकट है. इस पार्टी की सरकारों को जैसा कारगर क़दम उठाना चाहिए, वे नहीं उठा रही हैं. मगर मुसलमान महिलाओं के हक़ों के लिए वे बैचेन हैं. यह तो सोचने वाली बात है. क्यों है न?

यह मुसलमान मर्द बनाम मुसलमान महिला का मसला नहीं है. यह गैरबराबरी और इंसाफ़ का मसला है. क्या गैरबराबरी और इंसाफ़ सिर्फ़ ‘इकट्ठी तीन तलाक़’ तक सिमटी हुई है? 

…तो मुसलमान महिलाएं बनीं हैं चुनावी मुद्दा

इसलिए शक पैदा होना लाज़िमी है.  इस मुद्दे का इस्तेमाल उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान मुसलमानों को घेरने, कलंकित करने और उनके ख़ि‍लाफ़ गोलबंदी के लिए बखूबी किया गया. कहीं मुसलमानों को घेरने और अपमानित करने के लिए वैसा ही माहौल बड़े पैमाने पर बनाने की कोशि‍श तो नहीं हो रही है.

आख़िर क्या वजह है कि इस क़ानून की कोशिश में मुसलमानों के उस तरक्क़ीपसंद तबक़े को भी शामिल नहीं किया गया, जो इस तरह के तलाक़ के ख़ि‍लाफ़ हैं. इसमें सिर्फ तलाक़शुदा महिलाएं या महिलाओं की तंज़ीम ही नहीं हैं, बल्कि बड़ी तादाद में मर्द दानिश्वर, क़ानून के जानकार भी शामिल हैं जो इस तरह के इकतरफ़ा और इकट्ठी तलाक़ के ख़िलाफ़ हैं. अभी तक की जानकारी के मुताबिक़, ये सभी इस प्रक्रिया से बाहर हैं. मुमकिन है, कुछ लोग शामिल हों. हालांकि बड़ा समूह इन सबसे अलग ही दिख रहा है.

वैसे, सरकार ने अब तक क्या किया

इस क़ानून के पक्ष में सबसे बड़ी दलील यह दी जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी एक मजलिस की तीन तलाक़ रुक नहीं रही है.

एक मजलिस की तीन तलाक़, एक ऐसा मसला है, जो सदियों से चलन में है. इसे मज़हबी मानकर अपनाया जाता रहा है. इसके ख़ि‍लाफ़ उठती हर सदा को चुप कराने की अरसे से कोशि‍श होती रही है. इसके नाम पर मज़हबी और फ़िरक़ापरस्त गोलबंदी होती रही है. इसलिए तलाक़ का यह तरीक़ा किसी फैसले के बाद अचानक ग़ायब हो जाएगा, यह मुमकिन नहीं है. 

इसलिए यह गौर करना भी ज़रूरी है कि जिन लोगों पर सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के फैसलों या दूसरे क़ानूनी उपायों की जानकारी आम लोगों ख़ासकर आम महिलाओं तक पहुंचाने की है, उन्होंने क्या किया? सिर्फ बेहतर फैसले आने या क़ानून बनाने से लोगों तो इसका फ़ायदा पहुंचने लगेगा, यह सोच ही गड़बड़ है. उसके बारे में जानकारी पहुंचाना भी सरकार का काम है.

एक मजलिस की तीन तलाक़ पर मौजूदा सरकार ने मुसलमान म‍हिलाओं के पक्ष में ज़बरदस्त चिंता ज़ाहिर की थी. मगर जब यह फैसला आया तो इसके प्रचार-प्रसार के लिए क्या किया? यही नहीं, परेशानहाल मुसलमान महिलाओं को और भी क्या क़ानूनी साधन मुहैया हैं, इसके बारे में भी कोई जानकारी जन-जन तक पहुंचाने की कोशि‍श नहीं हुई.

यह सवाल तो महिला मुद्दों पर काम करने वाली तंजीमें, समाजी कारकुनों से भी किया जाना चाहिए. मुद्दा तो यह है कि बड़ी आबादी अब भी इन फैसलों या उपायों के बारे में नहीं जानती हैं.

वह नहीं जानती है कि इन मसलों में क़ानूनी हक़ का कैसे इस्तेमाल किया जाए. तो नए क़ानून बनते ही, क्या यह सब दुरूस्त हो जाएगा? सामाजिक बदलाव न तो सिर्फ़ क़ानून या फैसलों से हुए हैं और न होंगे. क़ानून के साथ मज़बूत सामाजिक मुहिम की ज़रूरत होती है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह मुहिम कहां है.

वैसे, ख़बरों के मुताबिक़, विधि आयोग हर धर्म के निजी क़ानूनों में सुधार पर विचार कर रहा है. बेहतर तो यही होता कि उसके मसौदे का इंतज़ार किया जाता. अगर कुछ बनाना ही है तो पारिवार‍िक या वैवाहिक क़ानून के दायरे में आने वाले हर क्षेत्र में संहिताबद्ध क़ानून बनाने की पहल हो.

सवाल भरोसे का भी है…

यह गौर करने लायक़ है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला और मौजूदा सरकारी की क़ानून बनाने की पहल – दोनों एक जैसी चीज़ नहीं है. सुप्रीम कोर्ट अब भी एक इंसाफ़ पसंद इदारे के रूप में मक़बूल है. नागरिकों का यक़ीन इस इदारे पर क़ायम है. इसलिए जब तलाक़-ए-बिद्दत को खारिज करने का फैसला आया तो बड़े तबक़े ने उसे मान लिया. जिन्होंने नहीं माना, वे खुलकर बोल नहीं पाए. मगर क्या मुसलमानों का यही यक़ीन/भरोसा मौजूदा सरकार के मामले में है? इसलिए इसकी पहल को क्या आसानी से गोलबंदी का ज़रिया नहीं बनाया जा सकता है?

इसलिए, मौजूदा समाजी-सियासी माहौल में जहां, हर चीज़ को साम्प्रदायिक चश्मे से देखने की कोशि‍श हो रही हो, मुसलमानों के बड़े तबक़े में असुरक्षा का माहौल हो, सिर्फ़ एक मजलिस के तीन तलाक़ को फौजदारी क़ानून के दायरे में लाने का ख्याल बेहतर नहीं है. इससे चीज़ें सुलझेगी नहीं. किसी भी समाज में सुधार सिर्फ़ क़ानून नहीं लाते हैं. सुधार कभी भी समाज को उकसाकर, उसे दरकिनार कर न तो लाया जा सका है और न लाया जा सकेगा. (जारी…)

(नासिरूद्दीन वरिष्ठ पत्रकार/शोधकर्ता हैं. सामाजिक मुद्दों और ख़ास तौर पर महिला मुद्दों पर लिखते हैं.)

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