बुंदेलखंड : वोट के लिए दलितों को प्रताड़ित कर रहे हैं भाजपा प्रत्याशी

प्रियंका कोटमराजू और अंशु ललित, TwoCircles.net

बुंदेलखंड : ‘वोट नहीं दोगे, तो देख लेंगे. सरकारी नल से पानी नहीं पीने देंगे, सरकारी रोड पर चलने नहीं देंगे‘, यह कह कर भाजपा से बांदा विधानसभा के उम्मीदवार प्रकाश द्विवेदी और उनके समर्थक वोट मांग रहे हैं. 23 फ़रवरी यानी कल उत्तर प्रदेश बुंदेलखंड की सभी 19 विधानसभा सीटों पर मतदान होने हैं. अगर बांदा और चित्रकूट जिले की सभी विधानसभा सीटों को देखें तो कहीं भी मामला एकतरफा नजर नहीं आ रहा है, लगभग हर विधानसभा में त्रिकोणीय समीकरण बना हुआ है.

प्रकाश द्विवेदी

बांदा विधानसभा में तीन बार विधायक रह चुके मौजूदा कांग्रेस विधायक विवेक सिंह के सामने भाजपा से पहली बार लड़ने वाले उम्मीदवार प्रकाश द्विवेदी और बसपा के मधुसुदन कुशवाहा खड़े हैं. इन तीनों में विवेक सिंह और प्रकाश द्विवेदी ‘बांदा के लड़के’ के रूप में जाने जाते हैं. दोनों के चुनाव कार्यालय से लेकर प्रचार गाड़ी तक सब आमने-सामने लगे हुए हैं.

20 फ़रवरी को सुल्तानपुर की जनसभा में बसपा सुप्रीमो मायावती ने सीधे-सीधे नरेन्द्र मोदी को निशाने पर लेते हुए कहा, ‘अपने देश का प्रधानमंत्री दलितविरोधी आदमी है.’ मायावती का यह पलटवार नरेन्द्र मोदी की फतेहपुर के रैली में साम्प्रदायिक भाषण देने को लेकर बाहर आया है. यह देख कर लग रहा है कि सिर्फ नरेन्द्र मोदी ही नहीं, भाजपा के उम्मीदवार भी अपने विधानसभा के स्तर पर भी यही तरीका अपना रहे हैं.

नाई गाँव का दलित बस्ती, जहाँ बाहर बैठ कर धमकी दी गई है.

बुंदेलखंड में अभी भी दबंग लोग पिछड़ी जाति के लोगों को दबाते हैं और दबंगई कर उनकी पट्टे की जमीन पर कब्ज़ा कर लिया जाता है. जबकि बुंदेलखंड के केवल बांदा जिले में कुल 21 प्रतिशत दलित वोटर हैं. हाल ही में घुरेटनपुर गांव के कुर्मी जाति के लोगों द्वारा दलितों के पट्टे पर कब्ज़ा कर लेने का मामला सामने आया है. वहीँ गोवारिया बुजुर्ग गांव के मुस्लिम और दलित समुदाय के लोग, खासकर महिलाएं, बताते हैं कि ठाकुर और ब्राह्मण जाति का दबाव आज भी यहां चलता है. जिसके कारण उनके मोहल्लों में सफाई नहीं हो रही है, पेंशन की सूची में उनका नाम भी नहीं दिया जाता है. यही नहीं, उज्ज्वला योजना के नाम पर उनसे पैसे मांगे जाते हैं.

हालांकि यह दलित विरोधी रवैया भाजपा के लिए नया नहीं है. बांदा विधानसभा के नाई गांव में भी कुछ ऐसा ही सुनने को मिला. नाई गांव मुख्य सड़क से लगभग 15 किलोमीटर अन्दर है. जहां लगभग 3200 मतदाता हैं. गांव में धोबी जाति को छोड़ लगभग सभी जाति के लोग रहते हैं. इनमें आधे ब्राहमण और आधे दलित हैं. गांव में प्रवेश करते ही सवर्णों के घर दिखाई देते हैं. इनके घरों के बाहर पक्की सड़क और कुआं है. जबकि दलितों के घर गांव से बिल्कुल अलग-थलग एक कोने में दिखाई पड़ते हैं. यहां कोई कुआं नहीं है, बस एक हैंडपंप है. सिर्फ यही नहीं, यहां तक पहुंचने के लिए कोई सरकारी सड़क नहीं है.

गांव के दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाली ‘रजनी’ बताती हैं, ‘एक सप्ताह पहले यहां भाजपा के उम्मीदवार प्रकाश द्विवेदी के लोगों ने हमारी बस्ती के बाहर बैठकर, वोट मांगते हुए कहा कि अगर तुम लोग वोट नहीं दोगे और (हम) हार गये तो, तुम लोग सरकारी नल से पानी नहीं पिओगे, सरकारी रोड पर नहीं चलोगे. चलोगे तो पैर-हाथ तोड़ देंगे.’

रजनी की 13-14 साल की बेटी चौखट पर बैठी हुई है. वह पढ़ती नहीं है. अभी तक उसने अपना पूरा गांव भी नहीं देखा है. इस मोहल्ले से, इस उम्र की वह अकेली लड़की नहीं है, जो स्कूल नहीं जाती, घर से बाहर नहीं निकलती. इस मोहल्ले से बाहर निकलने का रास्ता ठाकुरों के घर से होकर गुजरता है. जिसके लिए ठाकुर, दलितों के साथ आए दिन गाली-गलौच करते रहते हैं. रजनी कहती हैं, ‘हम लोग जब उनके घर से होते हुए गुजरते हैं तो ठाकुर लोग हमें मां-बहन की गालियां देते हैं.’

इसी गांव की 30 साल की दलित महिला ‘नीलम’ बताती हैं, ‘आज सुबह ही तो कमल छाप वाले आकर कह रहे थे कि वोट नहीं दोगे तो पानी नहीं पीने देंगे, चलने नहीं देंगे, देख लेंगे. वोट तो गुप्त दान होता है? क्या हम लोग इनको वोट नहीं देंगे तो ये हम लोगों को गांव से निकाल देंगे?’

नाई गाँव के दलित मोहल्ले के अन्दर

इस मामले में दलित समुदाय की महिलाएं जितना खुलकर बोल रही हैं, उतना पुरुष खुलकर नहीं बोल पा रहे हैं. इसी गांव के 55 साल के ‘सुरेश’ कहते हैं, ‘यहां कोई दबाव नहीं है. सब ठीक है.’ लेकिन जब उनसे उम्मीदवार के बारे में पूछा जाता है तो वह अपनी बात की शुरुआत ये कहते हुए करते हैं, ‘प्रकाश द्विवेदी क्षेत्रीय गुंडा है.’ केवल इस गांव के ही पुरुष नहीं, बल्कि इस विधानसभा के कई गांव के पुरुष भी इस उम्मीदवार के बारे में कुछ भी नहीं बोलना चाहते हैं. चाहें वह मकरी गांव के हरिजन हों, छिबांव के ‘महेश’ और ‘दिनेश’ या बंसखा के ‘प्रतीक’ हों, सब कहते हैं कि यहां कोई दबाव नहीं है, लेकिन प्रकाश द्विवेदी इस क्षेत्र का दबंग है.

एक व्यक्ति बताता है, ‘आप अतीक़ अहमद को जानती हैं, ठीक वैसा ही व्यक्ति प्रकाश द्विवेदी है.” माफ़िया और आपराधिक छवि वाले अतीक़ अहमद समाजवादी पार्टी से जुड़े हुए हैं. यूपी के गुंडा एक्ट में सबसे पहला नाम अगर किसी का आता है तो वह अतीक़ अहमद का ही है.

यह व्यक्ति काली शर्त-पैंट के ऊपर अपनी जैकेट पर कांग्रेस के चुनाव चिन्ह का बैज लगाए यह कहते हैं, ‘मैं बोल सकता हूँ क्योंकि मैं सेवनिवृत्त हूं. सब नहीं बोल सकते हैं.’ पेशे से अध्यापक रहे ये अपनी पहचान गुप्त रखना चाहते है. प्रकाश द्विवेदी के बारे में बताते हैं, ‘प्रकाश द्विवेदी मेरा स्टूडेंट था, 9वीं और 10वीं में मैंने उसे पढाया था. पढाई में कमजोर था लेकिन अब धन से भारी हो गया है.’

बांदा विधानसभा में स्वतंत्र मतदाता की बात कितना गंभीर है, इसका अंदाजा ‘महेश’ और ‘दिनेश’ के बातों से जाहिर हो रहा है. ‘दिनेश’ बताते हैं, ‘पूरा का पूरा गांव कहता है कि हम प्रकाश दिवेदी को वोट करेंगे, तो आप इस बात से अंदाजा लगा सकते है कि कितना दबाव है’.

बीजेपी प्रत्याशी प्रकाश दिवेदी का प्रचार

प्रकाश द्विवेदी पर आरोप है कि भाजपा से जुड़ने के पहले वे बसपा और सपा दोनों में रह चुके है और इन सभी पार्टियों के साथ रहते हुए उन्होंने ढेर सारा धन और रसूख कमाया है. प्रकाश द्विवेदी का मूल काम कोटा गोदाम, चावल मिल और खनन इत्यादि का है. यहां के लोगों का मानना है कि वास्तव में केवल बिकाऊ और ब्राह्मण लोग ही प्रकाश द्विवेदी के साथ जाना चाहते हैं. इस पर कांग्रेस और सपा के गठबंधन का धर्म निभा रहे कांग्रेस नेता पंकज मिश्रा कहते हैं, ‘मोदी जी और अमित शाह एक तरफ उत्तर प्रदेश से खनन माफियों से मुक्ति की बात करते हैं और वहीं भाजपा से प्रकाश दिवेदी जैसे खनन मफिया को टिकट दे दिया जाता है. इससें ‘खनन माफिया मुक्ति’ एक जुमला ही नजर आता है.’

इस क्षेत्र में भाजपा के उम्मीदवार के अपराधों में लिप्त होने के कई मामले हैं. जिसमें लोकल स्तर पर किए गए भ्रष्टाचार का मामला भी शामिल है. इस उम्मीदवार के बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि उनके खिलाफ बोलने वाले लोगों को वह ‘गलत मुकदमों’ में फंसाकर जेल भेज देते है. जैसा कि उन्होंने एक गरीब, भूमिहीन दलित के साथ किया है.

प्रकाश द्विवेदी पर आरोप है कि उन्होंने ग्रामसभा की ज़मीन को जबरन हथियाने की कोशिश की, जिसका विरोध ग्रामसभा के एक दलित सदस्य ‘अरुण’ ने किया. जिसके बाद, उस पर अपने घर में काम करने वाली 50 वर्ष की महिला द्वारा आइपीसी 376 के तहत बलात्कार का फर्जी केस दर्ज करवाया गया. अरुण का कहना है, ‘केस पूरा फर्जी था. मुझे थाने से फ़ोन आया वहां आने के लिए. थाने में मुझसे कहा गया कि तुम क्या कर लिए हो, लोग जिनके पैरों में गिरते है, तुम उनसे लड़ाई मोल ले लिए हो. मैं वही बैठा था तभी वहां एक आदमी आया और उसने पूछा क्या मामला है (मेरे बारे में)? तो पुलिस ने कहा – अरे कुछ नहीं, कल जो आये नही थे गाड़ी से वही हैं. फिर वहां एक और आदमी आया उसने भी पूछा, क्या दीवान जी क्या मामला है? तो पुलिस ने कहा कि अरे कुछ नहीं एक फर्जी मुकदमा है 376 का और कुछ नहीं. उस आदमी ने बोला जब फर्जी है तब जाने दो गरीब है. तो पुलिस ने कहा – अरे क्या करें सब राजनीति है.’

बलात्कार का आरोप लगाने वाली महिला के परिजन मांग रहे भाजपा के लिए वोट

इस क्षेत्र के लोगों का कहना है कि अरुण को झूठे केस में फंसाया गया है, लेकिन इतने दबंग आदमी के सामने कौन मुंह खोलेगा. जिस महिला ने केस दर्ज किया है, उनसे भी बात करने की लगातार कोशिश की गई लेकिन उन्होंने भी बात करने से मना कर दिया. बाद में हमें पता चला कि महिला के परिजन भाजपा प्रत्याशी के चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं. इस केस के चक्कर में प्रकाश द्विवेदी का विरोध करने वाला अरुण अपने सात सदस्य के परिवार का मुखिया होते हुए पांच महीने जेल में काट चुका है. अब केस बांदा की फ़ास्टट्रैक अदालत में चल रहा है. कई सुनवाईयां हो चुकी हैं. पेशे से मजदूर अरुण अब तक अपने केस में 2 लाख रुपये कर्ज लेकर खर्च कर चुका है. अपने टूटे हुए कच्चे मिट्टी के घर की ओर इशारा करते हुए कहता है कि ‘गरीब आदमी हूं, एक साल से मनरेगा में काम नहीं मिला है. इस केस के कारण कर्ज में डूबता जा रहा हूं.’

दलितों पर अत्याचार के आरोपों के विषय में जब हमने प्रकाश द्विवेदी से संपर्क करने की कोशिश की तो दो दिनों तक कोई बात नहीं हो सकी. हर बार कई बहानों से प्रकाश द्विवेदी बात करने से बचते रहे.

अरुण अपनी बात खत्म करते हुए कहते हैं, ‘आप लिखेंगे, तो इसके बाद क्या होगा. आप को मैं बता दूं कि मेरी जान भी जा सकती है. मैंने पहले ही यहां के पुलिस प्रशासन को लिखित दे दिया है कि मेरी जान को खतरा है.’ विकास पर होने वाले इस चुनाव से आपको क्या उम्मीद है? यह पूछने पर युवक कहता है, ‘हमें(दलितों को) क्या चाहिए? ‘विकास’ नहीं, न्याय चाहिए, सबसे पहले, विकास से पहले, शिक्षा से पहले, हमें न्याय चाहिए.’

[नोट : नेताओं के नाम जस के तस हैं, जबकि आम लोगों की पहचान गुप्त रखने के लिए उनके नाम बदल दिए गए हैं.]

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