नागेपुर : अस्पताल, पानी और काम के लिए कराह रहे मोदी के आदर्श ग्राम के लोग

सिद्धांत मोहन, TwoCircles.net

वाराणसी: हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गोद लिए दूसरे गांव जाते हैं तो हम शहर से 25 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं. हम एक अच्छे रास्ते पर अच्छा वक़्त काटते हैं तो थकान नहीं होती है. हम मुख्य सड़क से जब मुड़ते हैं तो भी रास्ता अच्छा होता है. जब गांव नागेपुर के अन्दर पहुंचते हैं तो भी सड़क अच्छी मिलती है. इन सभी सड़कों में एक समानता है, इनमें से किसी को भी नरेंद्र मोदी ने नहीं बनवाया. न ही उनके प्रभाव के बाद इन सड़कों को बनवाया गया और न ही तब जब उन्होंने इस गांव को गोद लिया.

नागेपुर गांव को गोद लेने का वक़्त धीरे-धीरे एक साल का होने जा रहा है. बीते फागुन के आसपास इस गांव को गोद लिया गया था, लेकिन इस गांव में वेदांता द्वारा बनवाए गए नंद घर यानी आंगनबाड़ी केंद्र(जहां पहुंचने पर ताला बंद मिलता है) और एक अम्बेडकर की मूर्ति के अलावा किसी चीज़ को देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि इसे सांसद और भारत के प्रधानमंत्री ने गोद लिया हो.

सेवापुरी ब्लॉक में स्थित नागेपुर गांव की जनसंख्या 4500-5000 के बीच है लेकिन वोटरों की संख्या 1800 के आसपास है. सबसे अधिक संख्या राजभर समुदाय की है, फिर पटेल हैं, तेली हैं, यादव हैं, मौर्या हैं, गोंड और हरिजन हैं. ब्राह्मण, ठाकुर या भूमिहार जैसे समुदाय नहीं हैं. मुस्लिम का एक घर मिलता है और वह गांव के बाहर है.

इस गांव की कहानी बेहद रोचक है. आज से पंद्रह साल पहले तक इस गांव के लगभग हरेक घर में हथकरघे चलते थे और लगभग हर बड़े-बूढ़े-बच्चे बुनकारी से कमाई करते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं है. पंद्रह साल हो गए हैं, इस गांव के लोगों ने बुनकारी करना बंद कर दिया है. अब शायद इक्का-दुक्का लोग करते हैं, तो वे भी काम के दिनों में रोज़ के सौ रूपए से ऊपर नहीं कमा पाते हैं.

शिवचरन राजभर वृद्ध हैं और गांव में घुसते ही मिल जाते हैं. कहने लगते हैं, ‘बुनकारी बंद हो गयी भाई साब. खेती है नहीं और कोई सझैतिया लायक भी नहीं समझता. कभी मजदूरी हो गयी, मिल गयी तो काम कर लेते हैं नहीं तो काम चलाते हैं, रखे-रखाए से.’ पूर्वांचल में सझैतिया उस आदमी को कहते हैं जो खेत की रखवाली करता हो और फसल की उपज की कमाई का हिस्सा खेतमालिक को देता हो. शिवचरन आगे बताते हैं, ‘आपको मोदी जी का गांव देखना है न. देख लीजिए. कोई नंद घर या अम्बेडकर की मूर्ति से अलग कोई बात करे तो बताइयेगा.’

पूछने पर लोग बताते हैं. पानी का पाइप बिछाया गया है. सप्लाई के लिए दो इंच का पाइप लगाया गया था. पहले दिन जनरेटर चलाकर पानी सप्लाई शुरू की गयी तो दो इंच के पाइप का दबाव जेनरेटर झेल न सका और जल गया. तब से जेनरेटर तो नहीं बना, उसे बनाने-रखने वाला ठेकेदार भी गायब हैं. ठेकेदार और चीजों और लोगों का पैसा लेकर भी फरार है, कई जगहों पर शिकायत की गयी है, लेकिन सुनवाई कहीं नहीं हुई है. गांव के लोग पाइप की बात बहुत तेज़ी से गिनाते हैं, फिर धीरे-धीरे बताते हैं कि वे अभी भी उस पाइप से पानी आने की बाट जोह रहे हैं.

गांव से सबसे पास का अस्पताल जक्खिनी में है, जो गांव से 17 किलोमीटर दूर है. एक छोटा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बनाने की बात हुई थी जो अभी तक सिर्फ बात ही है. मोदी द्वारा गांव को गोद लिए जाने के बाद गांव के लोगों की ख्वाहिशें बढ़ गयी हैं, लेकिन वे इन ख्वाहिशों को दबाकर सिर्फ तीन चीजों की बात करते हैं – अस्पताल, पानी और काम.

मुश्किल से तीस से चालीस लोगों के पास खेती के लिए ज़मीन है, इसलिए शायद उनके पास कोई मसला नहीं होगा. लेकिन उन्हें हटा दें तो बाकी सारे लोग मजदूरी पर निर्भर हैं. बुनकारी बंद हुए ज़माना हो गया है, अब मोटा काम कर सकते हैं. मोटा काम यानी मजदूरी, जोड़ाई, खुदाई या ऐसे ही दूसरे काम. मनरेगा के तहत बहुत सारे लोगों के जॉब कार्ड बने हैं और काम भी मिल जाता है. लेकिन बीते तीन महीनों से कोई काम नहीं है, तीन महीने पहले किए गए कामों के पैसे भी अभी तक नहीं मिले हैं. संतोष कुमार और उनके साथ मिले लोग दिन के बीच सुस्ताते हुए मिलते हैं. संतोष कुमार बताते हैं, ‘दिन का 2 बज रहा है. मेरी उम्र है 42 साल. इस समय 42 साल का आदमी आराम करता हुआ मिल सकता है?’

रोचक बात यह है कि अपने गोद लिए गांव नागेपुर में मोदी अभी तक एक बार भी नहीं आए हैं. उनके आने-जाने की जगह शायद केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने ले ली है, इसलिए वे कुछेक बार गांव आ चुके हैं. अनुप्रिया पटेल भी आ चुकी हैं, लेकिन जैसा संतोष कुमार कहते हैं, ‘जयापुर होता तो पता नहीं कवन-कवन आ जाता लेकिन इहां तो कोई नहीं आया.’ इन दोनों मंत्रियों से गांव के लोग अपने रोजगार को लेकर और बुनकारी को शुरू कराने के लिए योजना की बात कई बार कह चुके हैं लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है. यह आशा इसलिए है कि ऐसी कुछ व्यवस्था जयापुर में की गयी है, जिसके बारे में हम बाद में बताएंगे.

गांव में सीवेज की समस्या बहुत बड़ी है. घरों से निकलने वाला पानी एक बड़ी जगह इकट्ठा होता रहता है और बारिश आने पर गांव का आधा हिस्सा घुटने भर पानी में डूब जाता है. 57 वर्षीय सहदोई पटेल बताती हैं, ‘आप तो अभी मोटरसाइकिल से धड़धड़ाकर आ गए हैं, लेकिन बारिश में आते तो पता चलता कि नागेपुर कवन चिड़िया का नाम है.’

एक सामुदायिक केंद्र है गांव में, जिसका नरेंद्र मोदी से इतना ही सम्बन्ध है कि इसमें उन्होंने आने के बाद वाई-फाई लगवा दिया है. अन्दर जाने पर रेखा यादव मिलती हैं जो मनरेगा के तहत इस सामुदायिक केंद्र का प्रबंधन देखती हैं. वे भी रोजगार की बात करती हैं और वाई-फाई के बारे में पूछने पर बताती हैं कि अभी आधे घंटे पहले ही इसको रिपेयर किया गया है. वे अकेली अपने मोबाइल पर वाईफाई से इंटरनेट चलाते हुए मिलती हैं. प्राइमरी स्कूल भी है गांव में, जो नरेंद्र मोदी के पहले से मौजूद है. दिव्यांग पेंशन के इंतज़ार में बैठे कुछ लोग हैं, जो इस गांव में नरेंद्र मोदी के पहले से हैं.

गांव में बायो-टॉयलेट नहीं लगे हैं, लेकिन प्रधान ने कई जगहों पर पक्के शौचालय बनवाए हैं. कुछ जगहों पर पोर्टेबल टॉयलेट लगाए गए थे तो वे आंधी में उलट जाते थे, कभी तो उन्हें उलटने के लिए महज़ थोड़ी तेज़ हवा का ही सहारा चाहिए होता था. गांव में दलित बस्ती में अम्बेडकर की प्रतिमा लगी हुई है. पास में आराम फरमाते बच्चेलाल और रामराज मिलते हैं. बच्चेलाल बताते हैं, ‘बाबासाहब का मूर्ति लगा दिया, सही किया. लेकिन ई कोऊ काम होत है का?’ गांव में बैंक नहीं है लेकिन यूनियन बैंक की ओर से कृषक प्रशिक्षण केंद्र खोला गया है. इस पर तंज कसते हुए रामराज कहते हैं, ‘केतना किसान हैं कि किसानी का ट्रेनिंग देंगे? सब मजूरा हैं.’

गांव में देखने में सम्पन्नता है लेकिन भीतर-भीतर गांव में बहुत सारी दिक्कतें हैं. कुछ लोग कहते हैं कि काम मिल जाए और कुछ टीका करते हैं कि मोदी जी ने ऐसे गांव को गोद लिया, जहां उन्हें दिखावटी काम करने की कोई ज़रुरत नहीं है.

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