जयापुर : मोदी का आदर्श ग्राम जहां प्राइमरी स्कूल में सूत कताई केंद्र चलता है

सिद्धांत मोहन, TwoCircles.net

वाराणसी : जयापुर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पहला आदर्श ग्राम है और मैं यहां पांचवीं बार जा रहा हूं. नरेंद्र मोदी के आदर्श ग्राम के विकास में इस बात का ख़याल रखा गया है कि यहां देश भर के पत्रकारों और विदेशियों की भीड़ दिन के उजाले में आएगी. इसलिए गांव के आसपास की मुख्य सड़क पर एक भी लाईट नहीं है.

मुख्य सड़क से गांव के भीतर घुसने पर मुट्ठी-मुट्ठी भर के आकार के पत्थर और बोल्डर सड़क पर बिखरे पड़े मिलते हैं. इन पर पैदल नहीं चला जा सकता,बाइक दौड़ाने की बातें भूल जाइए. यह सड़क कारों के चलने भर के लिए ही ठीक है क्योंकि बाकी सवारियां बगल की पगडंडी से रास्ता तय करती हैं.

इस सड़क की मीडिया में सही रिपोर्टिंग नहीं हुई है. लोगों ने कहा है कि देखिए, सड़क इतनी खराब है. जबकि उन्हें पूछना चाहिए था कि प्रधानमंत्री मोदी के आदर्श ग्राम में ऐसी क्या बात है कि सड़क को दो सालों में तीसरी बार बनवाया जा रहा है? इस बनवाने का खर्च कौन ले रहा है? इस खर्च को कौन उठा रहा है? इसमें कमाई किसकी हो रही है? इन प्रश्नों का सीधे तरीके से हम जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं तो गांव वाले चुप्पी साध जाते हैं.

दरअसल मोदी ने जब इस गांव को गोद लिया तो इस गांव में काम कराने के लिए पैसों की बाढ़-सी आ गयी. इतनी बाढ़ कि गांव की मुख्य सड़क को तीन बार बनवाया गया और वह एक बार भी सही तरीके से नहीं बन पायी. एक बार कच्ची बनी थी तो उखड़ गयी. इसके बाद बालू पर बिना जुड़ाई की इंटरलॉकिंग ईंटें बिछाई गयीं, जो पूरे गांव में प्रधान की हँसी का कारण बनी रहीं. अब ये नयी बनती सड़क है, जिस पर बड़े-बड़े पत्थर डाले जा रहे हैं. और हिसाब तो किसी का भी नहीं है.

जयापुर पर हमने एक साल पहले एक रिपोर्ट की थी, आप उसे तो पढ़ ही सकते हैं. लेकिन उससे अलग यह है कि बीती रिपोर्ट में हमें रिया सिंह मिलती हैं. रिया सिंह छोटी-सी बच्ची हैं, जिन्हें पढ़ाई करने के लिए शहर से बहुत दूर जाना पड़ता है. उन्होंने कहा था कि मोदी जी यदि उनके गांव में हाल में ही बने आदर्श कन्या विद्यालय में कक्षाएं शुरू करा देते हैं तो उन्हें दूर नहीं जाना पड़ेगा. आशा थी कि स्कूल जल्द चलेगा. लेकिन जयापुर के स्कूल का कपड़ा मंत्रालय ने व्यावसायिक उपयोग करना शुरू कर दिया है.

इस आदर्श कन्या विद्यालय में कक्षाएं तो नहीं शुरू हुई हैं, लेकिन इसके तीन कमरों में सूत की कताई शुरू हो गयी है. यह सूत कताई किसी अनाधिकारिक तौर पर शुरू नहीं की गयी है. बाक़ायदा कपड़ा मंत्रालय का बोर्ड लगाकर यह कार्यक्रम चल रहा है. रीता राय इस सूत कताई केंद्र की सुपरवाइजर हैं. इसी गांव की रहने वाली हैं. उनके पास एक बना-बनाया आंकड़ा मौजूद है कि सूत कताई केंद्र की उपलब्धि क्या है? वे तुरंत बताना शुरू कर देती हैं कि यहां कुल 35 महिलाएं काम करती हैं. जिनमें से 10 सिलाई करती हैं और 25 कताई. फिर हम उनसे पूछते हैं कि स्कूल का अधिग्रहण करना क्या जरूरी था, तो रीता राय चुप हो जाती हैं. कुछ देर बाद बोलती हैं, ‘हम लोग तो कई बार कहे कि अलग जगह दिलवाईये, लेकिन कोई सुनता कहां है?’

खादी और ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष विनय कुमार सक्सेना खुद यहां इस स्कूल में सूत कताई का उद्घाटन कर चुके हैं. केन्द्रीय मंत्री पियूष गोयल भी आ चुके हैं, लेकिन जैसा इस केंद्र के आसपास मिले लोग बताते हैं कि उनमें से किसी को इस बात का ख़याल नहीं आया कि केंद्र को प्राइमरी स्कूल में खोला गया.

यहां पर अंधेरगर्दी नहीं रूकती है. स्कूल की इमारत पर एक और बैनर लगा मिलता है, जिस पर लिखा है प्रजापति ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय एवं राजयोग प्रशिक्षण केंद्र. ब्रह्मकुमारी जैसे गैर-सरकारी संगठन के बैनर पर स्थानीय शाखा में स्कूल का नाम साफ़-साफ़ लिखा है, जिसे यह कहकर भी नहीं टाला जा सकता कि यह किसी ने विज्ञापन के लिए लगाया होगा.

गांव में लगे थे टॉयलेट. टॉयलेट नहीं बायो-टॉयलेट. पोर्टबल किस्म के. पिछली बार गए थे तो अधिकतर में बाहर से ताला बंद था, इस बार गए तो ताला तो अपनी जगह बंद ही था लेकिन दरवाजा उखड़ गया था. पिछली बार गए तो टॉयलेट किसी के अहाते में रखे हुए मिले थे, इस बार गए तो किसी और के अहाते में रखे हुए मिले थे.

एक बस सेवा शुरू की गयी थी. बस एक भी दिन नहीं चली और बस को चलाने के लिए दो बहनों को नौकरी दी गयी थी, जिन्होंने एक दिन भी नौकरी नहीं की. बस बनारस के जालान परिवार की ओर से दी गयी थी, जो वापिस ले ली गयी. राज्यपाल राम नाईक इस सेवा का उद्घाटन करने आए थे. बस स्टैंड पर पिछली बार तक हफ्ते में एक दिन निःशुल्क दवा वितरण और जांच होती थी, इस बार बस स्टैंड उखड़ा और टूटा हुआ मिलता है.

गांव में बिजली महज़ आठ घंटे मिलती है. पानी की समस्या और भी ज्यादा विकट है. गांववाले बताते हैं कि लोगों को पानी की सप्लाई देने के लिए महज़ दो इंच का पाइप लगाया गया है, जिसकी वजह से आधे से भी ज्यादा घरों में पानी नहीं पहुंच पाता है. सभी को सरकारी हैंडपंप या अन्य साधनों के भरोसे रहना पड़ता है. दलितों के लिए बसाया गया ‘अटल नगर’ परफेक्ट है. यहां रह रहे परिवारों को कोई समस्या नहीं है. सोलर लाईटें लगी हैं, जो अंधेरा होने पर खुद-ब-खुद जल जाती हैं. अब इनमें से कई लाइटें ख़राब हो चुकी हैं. लेकिन मीडिया के एक बड़े समुदाय को नहीं पता है कि क्योंकि वह जयापुर रात में नहीं जाता है. अटल नगर में अभी तक एलपीजी गैस का कनेक्शन नहीं है, तो रसोईघर काला होने के डर से सभी परिवार पीछे की दो झोपड़ियों में लकड़ी पर खाना बनाते हैं. थोड़ा कुरेदने पर पता चलता है कि यहां भी पानी की समस्या विकट है. पानी नहीं मिलता, मिलता है तो ज़रुरत से बेहद कम मिलता है.

कुल मिलाकर नरेंद्र मोदी का आदर्श ग्राम जयापुर एक ऐसा आदर्श गांव है, जहां इस चीज़ का आदर्श ज़रूर स्थापित किया जा सकता है कि विकास का भ्रम कैसे पैदा किया जा सकता है. नरेंद्र मोदी का आदर्श ग्राम आदर्श इसलिए भी है कि विकास की इक्का-दुक्का कार्रवाईयों को बियाबान बनाने के लिए कैसे छोड़ा जा सकता है. आदर्श इसलिए भी है कि आदर्श तरीके से कैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सहारा लेकर गांव को गोद लिया जाता है. नीचे एक खबर का लिंक है, जिसे हमने दो साल पहले किया था. गांव की कुछ और अधूरी कहानी भी वहां मिल जाती है. पढ़िएगा ज़रूर.

शिकायतों और अनियमितताओं के आईने से प्रधानमंत्री मोदी के आदर्श ग्राम की हक़ीक़त

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