राजेंद्र अग्रवाल का बदहाल आदर्श ग्राम, जहां सांसद जी सिर्फ़ शादी-ब्याह में दिखते हैं

आस मोहम्मद कैफ, TwoCircles.net

मेरठ: शहर से 12 किलोमीटर दूर गढ़ रोड पर गांव भगवानपुर चट्टावन. मुख्य मार्ग से डेढ़ किलोमीटर लिंक रोड पर चलने के बाद गांव के मौजूद होने का आभास होने लगता है. हालांकि किठौर का क्षेत्र है, लेकिन यहां से किठौर की दूरी भी करीब 8 किलोमीटर है. लिंक रोड को देखकर ऐसा लगता है, जैसे गांव में विकास की बयार बह रही हो लेकिन गांव में प्रवेश करने पर भ्रम दूर होने में देर नहीं लगती जबकि प्रधानमंत्री ग्राम विकास योजना के तहत सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने एक साल पहले गांव को गोद लिया था.

गांव में घुसते ही आपको झटके लगने शुरू हो जाते हैं. सबसे पहला झटका आपको तब लगता है जब लिंक रोड आपका साथ छोड़ देती और आप अचानक से कच्चे रास्तों पर आ खड़े होते हैं. हालांकि गांव में इक्का-दुक्का रास्ते पक्के ज़रूर हैं, लेकिन उनका सांसद या सांसद निधि से कोई सरोकार नहीं है. अब अति-पिछड़े गांवों में भी खड़ंजा सड़क की प्रथा लगभग खत्म हो चुकी है, ऐसे में सांसद जी के इस गांव में आपको संकरी गलियों में पांच दशक पुराने खड़ंजे दिखाई दे जाएंगे.

गांव का स्वागत मार्ग

गांव के पानी की निकासी की व्यवस्था लगभग शून्य है. हालांकि जहां-तहां कुछ नालियां बनी हैं, लेकिन उनमें पानी और कीचड़ का उफान इस कदर है कि उसने आधे रास्ते को भी अपनी चपेट में ले लिया है. घरों से बाहर आते पानी के लिए निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है, नालियां बिल्कुल अटी पड़ी हैं या फिर बंद हो चुकी हैं. नतीजतन लोगों ने पानी की निकासी के लिए अपने घरों के बाहर ही गड्ढे खोद लिए हैं, जिनमें हमेशा पानी भरा रहता है और उसके ऊपर मच्छर भिनभिनाते रहते हैं.

संजीव तोमर कहते हैं, ‘एक साल हो गया, लेकिन अभी तक सांसद जी ने गांव में कोई नाली निर्माण तक भी नहीं कराया. सांसद निधि से आज तक विकास के नाम पर कोई ईट भी नहीं लग पाई है.’ वहीँ रामपाल सिंह आरोप लगाते हैं, ‘गांव के विकास के लिए आने वाले पैसे को सांसद अपनी कोठी पर खर्च कर रहे हैं. सांसद खुद आलीशान बंगले में रहते हैं, जबकि गांव दुर्दशा का शिकार हो रहा है.’

गर्मियां आते ही एक ओर जहां लोग धमार्थ प्याऊ लगाकर प्यासे लोगों का गला तर करते हैं, वहीं सांसद राजेंद्र अग्रवाल के गांव में हैंडपंप सूख गए हैं, खराब पड़े हैं. यदि एकाध सही भी हैं, तो उनका पानी उतर गया है या तो वह पीने लायक नहीं बचा है. नलों के चारों ओर बड़ी-बड़ी घास और कीचड़ इस कदर जमी है कि कोई नल तक जाने की हिम्मत भी न कर पाए.

गांव में बिजली का भी बुरा हाल है. बिजली के जो तार लगाए गए थे, अब उनमें गांठ मारकर काम चलाया जा रहा है. ट्रांसफार्मरों का टोटा इस कदर है कि नलकूप के ट्रांसफार्मर में कनेक्शन जोड़कर घर में उजाला किया जा रहा है. गांववालों ने कई बार ट्रांसफार्मर की क्षमता बढ़वाने के प्रयास किए, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई.

गांव के बदहाल रास्ते

गांवों में जोहड़ आदि की व्यवस्था जलस्तर को बरकरार रखने के लिए की जाती थी, लेकिन भगवानपुर चट्टावन के जोहड़ जलस्तर के स्थान पर कीचड़ और गंदगी को बरकरार रख रहे हैं. गांव में चार जोहड़ हैं, जिनसे निकल रही दुर्गन्ध के कारण उनके नजदीक खड़े होकर दो मिनट सांस लेना दूभर है. जोहड़ का सुंदरीकरण तो दूर, उन पर चहारदीवारी भी नहीं है. बुरी स्थिति तब हो जाती है, जब पता चलता है कि कुछ लोगों ने जोहड़ की जमीन को कब्जा कर उस पर अपने आशियाने खड़े कर लिए हैं.

सामुदायिक सेवाओं और शिक्षा की बदहाली

अब बात करते हैं सामुदायिक सेवाओं की. वैसे तो गांव में में दस साल पहले ही सामुदायिक स्वास्थ केन्द्र का निर्माण करा दिया गया था, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि आज तक इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को कोई चिकित्सक मयस्सर नहीं हो सका है. सामुदायिक स्वास्थ केन्द्र की हालत यह हो गयी है कि यहां रात में असामाजिक तत्वों की आवाजाही और दिन में कुत्ते-बिल्लियों का ठिकाना रहता है. गंदगी इस कदर फैली है कि पैर रखने के लिए कोई जगह नहीं बची है. एक सरकारी नल है, जिसका पानी शायद ही कभी किसी ने पिया हो और आज उसके मरम्मत करने वालों के भी टोटे पड़े हैं.

गांव में सबसे बुरा हाल तो शिक्षा के मंदिरों का है. गांव में दो प्राइमरी पाठशालाएं और एक जूनियर हाईस्कूल है. स्कूलों की इमारत जहां जर्जर दिखाई देती है, वहीं प्रसाधन संबंधी सेवाएं पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी हैं, टॉयलेट आदि के स्थान पर टूटी-फूटी सीटों को देखकर ऐसा लगता है कि मानो हम स्कूल में नहीं बल्कि किसी खंडहर में खड़े हों. प्रसाधन व शौच संबंधी सेवाओं के दुरस्त न होने से सबसे बड़ी आफत गांव की बालिकाओं की है.

गांव में सांसद के प्रति नाराजगी व्यक्त करते ग्रमीण

गांव वालों का कहना है कि जब से गांव गोद लिया गया है, तब से सांसद जी के दर्शन केवल एक या दो बार विवाह समारोह में हुए हैं. सांसद जी दावत खाने आते हैं और दावत खाकर निकल जाते हैं. इस बीच न तो किसी ग्रामवासी से कोई समस्या पूछते हैं और न गांव का हाल. ग्रामवासियों का कहना है कि एक दो बार लोगों ने एकजुट होकर गांव के विकास का प्रस्ताव सांसद के सामने रखना भी चाहा, लेकिन सांसद जी ने कहा कि अभी सांसद निधि में कोई पैसा नहीं आया है. इसलिए विकास प्रस्तावों पर अभी कोई काम नहीं किया जा सकता है.

पूर्व प्रधान विजय पाल सिंह कहते हैं, ‘सांसद ने गोद लेकर गांव को और बदनाम कर दिया है.’ भूपेन्द्र तोमर कहते हैं, ‘गांव में जितना भी विकास हुआ है. वह सब ग्राम पंचायत के कोटे से ही हुआ है. सांसद निधि से यहां अभी तक कोई कार्य नहीं हो सका. इस संबंध में कई बार सांसद से बात भी की गई, लेकिन कोई फायदा नहीं हो सका.’

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