‘तलाक़ जायज़, लेकिन उसे देने का तरीक़ा ग़लत’ —शाही इमाम अहमद बुख़ारी

TwoCircles.net News Desk

अलीगढ़ : क़ुरआन और हदीस में तलाक़ तो है, लेकिन इसका जो तरीक़ा वर्तमान में अपनाया जा रहा है, वो ग़लत है. व्हाट्सअप और फ़ोन पर फ़ौरन तलाक़ बोल देना महिलाओं के साथ नाइंसाफ़ी है. एक-एक तलाक़ के बीच कम से कम महीने भर का समय हो, जिससे कि आपसी समझौते की कोई गुंजाईश बनी रहे. इसके लिए मुसलमानों को जागरूक करने की ज़रूरत है. लेकिन इसको लेकर हुकूमत और नेताओं की बयानबाजी ग़लत है.

ये बातें रविवार को अलीगढ़ में दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुख़ारी ने कही. उन्हें यहां क़स्बा छर्रा में एक निजी कार्यक्रम में शामिल होना था.

आगे उन्होंने कहा कि, तलाक़ पर जिस तरह से बहस चल रही है और रोज़ाना नेता इस बयानबाज़ी कर रहे हैं. सरकार की तरफ़ से भी बयान आ रहे हैं. हालांकि हुकूमत को इस मसले पर बोलने से परहेज़ करना चाहिए. इस मामले में सरकार की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं की जा सकती. क्योंकि यह सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमानों का मसला है और उलेमाओं को ही इसको तय करना होगा और इसके लिए पर्सनल लॉ बोर्ड काम कर रहा है.

उन्होंने ट्रिपल तलाक़ के मसले को लेकर टीवी पर होने वाली बहसों पर भी  कड़ा एतराज जताया.

उन्होंने कश्मीर मामले पर कहा कि वहां आज से नहीं, बल्कि बरसों से हालात बिगड़े हैं. सब को ग़ौर करना होगा कि आख़िर वहां के लोग खासकर छोटे-छोटे बच्चे पत्थरबाज़ी करने पर आमादा क्यों हैं?

आगे उन्होंने कश्मीर के हालात पर कहा कि, ‘पत्थर और बंदूकों से कोई हल नहीं निकलने वाला. इसके लिए बातचीत को ज़रिया बनाना पड़ेगा.’

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