‘जान दे देंगे, अगर चंद्रशेखर को हाथ भी लगाया तो…’

आस मुहम्मद कैफ़, TwoCircles.net

सहारनपुर :  मेरा नाम विमला… मेरे आदमी का बदलू और लड़के का देवेंद्र और पोते का परमवीर! क्यों अर वोई रख सके अपने बच्चों का नाम वीर, हम भी रखेंगे, क्योंकि उन में ही पैदा हो सके चंद्रशेखर… म्हारे भी है, यो महारा चंद्रशेखर है. जब हम इनके बालकों से नहीं किलषते तो यो म्हारो से क्यों किलष रे…’

‘चंद्रशेख़र के चक्कर में न पड़े यो सरकार वरना जेल में पैर रखने की जगह न मिलेगी. जान दे देंगे जान… कम से कम बच्चे तो चैन से रहेंगे…’

ये भावनाएं हैं गांव की बूढ़ी औरतों का, जिनकी नज़र में ‘भीम आर्मी’ का चंद्रशेख़र किसी हीरो से कम नहीं है. बल्कि शायद ‘हीरो’ शब्द भी कुछ लोगों के लिए कम पड़े. कुछ तो इसे ‘देवता’ के तौर पर देखने लगे हैं.

twocircles.net के इस संवाददाता ने आज सहारनपुर के देहात कोतवाली क्षेत्र के सबसे अधिक हिंसा प्रभावित क्षेत्र रामनगर नया गांव में भ्रमम किया. ये वही गांव है, जहां महाराणा प्रताप भवन को आग में झोंक दिया गया था. पत्रकारों की बाईक जलाकर राख कर दी गई थी. एसपी सिटी को यहां से जान बचाकर भागना पड़ा था. यहीं सहारनपुर के सीओ घायल हो गए थे.

यह गांव जितना पुलिस से नाराज़ है, उससे कहीं ज्यादा पत्रकारों से. बड़गांव रोड शहर से सटे हिंसा का केंद्र रहे इस गांव में प्रवेश से पहले आईपीएस सुकीर्ति माधव, आईपीएस देवेंद्र कुमार, सीओ 2 अब्दुल क़ादिर और सीओ ट्रैफिक ओजस्वी चावला बैठे हैं. तापमान 42 डिग्री सेल्सियस है और अफ़सर 48 से ज़्यादा घंटों से वहीं जमे हैं.

गांव में अंदर जाने से अफ़सर मना करते हैं. हालांकि इनके मना करने का कारण हम पत्रकारों की सुरक्षा है. लेकिन हमारा इस गांव में जाना ज़रूरी है. क्योंकि ये गांव हमारी रिपोर्ट के लिए काफी अहमियत वाला है. ये गांव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ‘भीम आर्मी’ के ज़िला अध्यक्ष कमल इसी गांव के हैं और दो दिन पहले सबसे ज्यादा तांडव भी इसी गांव के लोगों ने किया.

गांव वाले बताते हैं कि गांव में कोई भी आ जा सकता है मगर पुलिस नहीं. गांव पहुंचने पर 65 साल बूढ़ी  केलेशो हमें बताती हैं कि, ‘कोई यो हमारी सरकार है यो ठाकुरों की सरकार है और पुलिस तो सरकार की हो, शब्बीरपुर में एक ठाकुर मर गया तो 10 लाख रुपए और नौकरी और चमारों के घर फूंक दिए, तलवार पेट में घुसेड़ दी, शादी का सामान जो इक्क्ठा कर रखा था उसमें आग लगा दिया, यह नंगी तलवारे लेकर  जब जा रे थे तब पुलिस न थी क्या? पुलिस तो इनकी ही है. अचानक से राजपूतो में सोया हुआ राक्षस जाग गया. मायावती जब मुख्यमंत्री थी तो तंग करने की हिम्मत न हुई किसी की…’ 

बुजुर्ग शिमला देवी भी गुस्से में हैं. वो कहती हैं, 70 साल की हूं मैं. यह खेत में मज़दूरी करा लेंवे थे और टिक्कड़ (रोटी) हाथ पर फेंकते थे, कहीं हमारा हाथ छू न जाये, अब हमारे बच्चे पढ़ गये और हमने गुलामी छोड़ दी तो इनके आग लग री. जब इन्होंने बाबा साहब की जयंती तो निकालने नहीं दी और महाराणा प्रताप की हमें चिढ़ाकर निकाल रहे थे तो क्या म्हारा बालकों ने कोई चूड़ी पहन रखी. अब हम पहले वाले चमार ना हैं. और पुलिस में दम है तो गांव में आकर दिखावे. जान दे देंगे जान…

नया गांव दलित बहुल गांव है. कुछ नौजवान और पुरुष भी आसपास हैं. मगर बात करने और फोटो खींचने की इजाज़त सिर्फ़ महिलाओं की है.

राजकुमारी कहती हैं, क्या यह अत्याचार नहीं है. कल चंद्रशेखर भाई के घर पर हमला हुआ. अब उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा हो गया. आज अगर चंद्रशेखर को उंगली लग गई तो एक लाख चमार अपनी जान दे देंगे.  आज के अत्याचार के खिलाफ़ अगर नहीं खड़े हुए तो कल को हमारे बच्चे फिर ग़ुलाम हो जाएंगे, जवाब आज ही देना है और हम कोई अत्याचारी नहीं हैं. खुद पर हुए अत्याचार का विरोध कर रहे हैं.

वो आगे कहती हैं कि, मुसलमानों से लड़ाने को हमें हिन्दू बता दें. वैसे हम चमार हैं. हम हरीजन भी ना. जब हरी को हमारी परवाह ना तो क्यों कहे हरिजन. हम हैं चमार और हमें गर्व है चमार कहने व कहलाने में. 

दलितों में ‘भीम आर्मी’ की छवि मसीहा की बन गयी है. अतरो कहती हैं, बिल्कुल ठीक काम कर रही है ‘भीम आर्मी’. अब थप्पड़ का जवाब लाठी से देने का ही वक़्त है. हम सब भीम आर्मी के साथ हैं.

गांव वालों का गुस्सा है कि उतर ही नहीं रहा. सतबीरी कहती हैं कि, अगर आज यह गुस्सा उतर गया तो कल बच्चे चैन से ना जी पावेंगे, यह गुस्सा चढ़ने दो…

बताते चलें कि बवाल के बाद से गांव छावनी बना हुआ है, मगर कमाल की बात यह है कि पुलिस गांव के अंदर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है. गिरफ़्तारी की बात छोड़िये, फ्लैग मार्च तक का साहस नहीं हो पा रहा है. इसकी वजह, शायद हर किसी के ज़बान बस यही वाक्य का होना है  —‘अजी! हम मरने के लिए तैयार बैठे हैं! आवे तो पुलिस!’

क्या है भीम आर्मी

‘भीम आर्मी’ का संस्थापक एक दलित चिंतक सतीश कुमार को बताया जाता है, जो छुटमलपुर के रहने वाले हैं. बताया जाता है कि सतीश कुमार पिछले 10 साल से ‘शिव सेना’ जैसे किसी संगठन को बनाने की फ़िराक में हैं, जो दलितों का उत्पीड़न करने वालों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे सके. मगर उन्हें कोई ऐसा क़ाबिल दलित युवा नहीं मिल रहा था, जो इसकी कमान संभाल सके.

5 साल पहले मिले चंद्रशेखर ‘रावण’

यहीं के एएचपी कॉलेज में राजपूतों का दबदबा था. यहां चंद्रशेखर पढ़ने आया. भीम आर्मी के लोग बताते हैं कि यह कॉलेज भीम आर्मी का प्रेरक केंद्र बना. यहां दलित छात्रों की सीट अलग थी. पानी पीने का नल अलग और तब आये चंद्रशेखर. इस नौजवान ने ठाकुरों के सामने झुकने से इंकार कर दिया. रोज़-रोज़ मारपीट होने लगी. स्कूली छात्र सड़कों पर टकराने लगें. कई बार राजपूत लड़के पीटे गए. दलित नौजवानों की हिम्मत बढ़ने लगी. और कॉलेज से राजपूतों का वर्चस्व ख़त्म हो गया. सतीश कुमार को नेता मिला और ‘भीम आर्मी’ का चंद्रशेखर को इसका अध्यक्ष बना दिया गया.

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