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मुज़फ्फरनगर दंगे का कितना गुनाहगार है कवाल ?

मुज़फ्फरनगर दंगे का कितना गुनाहगार है कवाल ?

[caption id="attachment_415868" align="aligncenter" width="3264"] कवाल का मुख्य रास्ता[/caption]

आज़ादी के बाद उत्तर प्रदेश में मुज़फ्फरनगर दंगा ऐसा साबित हुआ जिसमे पचास हज़ार से ज्यादा लोगो ने अपना घर-बार छोड़ दिया. ऐसे दंगा, जिसने उस इलाके की सामाजिक स्थिति बदल दी. दो समुदाय के बीच ऐसी लाइन खीच दी जिसने दोनों को अलग अलग पाले में खड़ा कर दिया. मुज़फ्फरनगर दंगे के चार साल होने पर आस मोहम्मद कैफ  ने दुबारा फिर उसी जगह का दौरा किया जहाँ से ये खूनी खेल शुरू हुआ था. आज चार साल बीतने के बाद भी वहां पी ए सी तैनात है. लोगो के दिल में खौफ हैं. पेश है इस सीरीज की पहली रिपोर्ट.

कवाल, मुज़फ्फरनगर : 27 अगस्त 2013 को मुज़फ्फरनगर के गाँव कवाल में तीन कत्ल हुए. एक मुसलमान और दो जाट लडको के. यह मुज़फ्फरनगर के लिए एक सामान्य आपराधिक घटना थी. शुरुवात साइकिल टकराने को लेकर हुई थी. लड़की छेड़ने का कोई मामला नहीं था. मगर यह घटना सबसे कलंकित करने वाले साम्प्रदयिक दंगे की जमीन बन गयी. दंगे में रासुका में निरुद्ध हुए लोग विधायक बन गए और कुछ जेल में पड़े पड़े बर्बाद हो गए.

कवाल गाँव मोहरा बना और मुज़फ्फरनगर खून में नहा गया. 15 दिन तक हुई साम्प्रदयिक हिंसा में 100 से ज्यादा लोग मारे गए (सरकार के हिसाब से 68, मगर बाद में लापता को भी मृतक मान लिया गया) दर्जनो बलात्कार हुए, सैकड़ो घर जला दिए गए, कई धार्मिक स्थल गिरा दिए गए और लाखों लोग बेघर हो गए. कवाल के माथे पर यह कलंक है कि यह सब उसकी वजह से हुआ.

[caption id="attachment_415873" align="aligncenter" width="3264"] घटनास्थल के चोराहे की मिठाई की दुकान पर आफ़ताब[/caption]

जानसठ से मुज़फ्फरनगर मार्ग पर कवाल 8 हजार की आबादी वाला एक गाँव है. मुस्लिम बहुल इस गाँव में 3 हजार से ज्यादा कुरैशी बिरादरी है. 27 अगस्त को जिस शहनवाज़ का क़त्ल करके गौरव और सचिन भाग रहे थे वो शहनवाज़ भी कुरेशी बिरादरी से ही था. मगर गौरव और सचिन को मारने वाले सभी कुरैशी नही थे. शहनवाज़ के घर से लगभग 100 मीटर आगे चोराहे पर मारे गए गौरव सचिन को भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला. यह बात इसी चौराहे पर मिठाई की दुकान चलाने वाले आफताब बताते है. आफ़ताब बताते है कवाल में लोगो ने बेटी देना कम कर दिया है अब रिश्तों में परेशानी होती है. जबकि कवाल में दंगा नही हुआ. झगडे में तीनों जान गई. जिसका आज भी दुःख है. इस घटना का राजनीतिकरण हुआ और अमन में आग लग गयी. वो बताते है दंगा की आग में हवन कर कई नेता बन गए. रासुका में जेल में बंद रहे विक्रम सैनी विधायक बन गए. मगर गाँव में मुस्लिमो के साथ भी उनका अच्छा बर्ताव है. बाहर वो कैसे भी हो !

जिन विक्रम सैनी की बात आफ़ताब कर रहे है, वो और मुफ़्ती मुकर्रम दोनों को दंगे का दोषी मानते हुए रासुका में निरुद्ध किया गया था. गाँव में हमने कई लोगो से यह जानने की कोशिश की विक्रम सैनी की गलती क्या थी. उन पर रासुका क्यों लगी? मगर अब विधायक बन चुके विक्रम सैनी के खिलाफ कोई नही बोलता. मोहम्मद आजम बताते है कि इस झगड़ा में तो विक्रम सैनी और मुफ़्ती मुकर्रम की कोई गलती थी नही थी. मगर पुलिस ने इन दोनों को ही जिम्मेदार माना. मुफ़्ती मुकर्रम जेल में रहकर बर्बाद हो गए और दंगे ने विक्रम सैनी को आबाद कर दिया पहले वो जिला पंचायत सदस्य बने और अब विधायक है. खतौली विधानसभा से भाजपा ने उन्हें प्रत्याशी बनाया था.

[caption id="attachment_415872" align="aligncenter" width="3264"] दोनों एफआईआर में समय का अंतर आज भी सवाल है[/caption]

इस बार भी कवाल के पास के गाँव मलिकपुरा में गौरव और सचिन की बरसी की तैयारी चल रही है. इस बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी जनपद जिलाधिकारी के माध्यम से बुलावा भेजा गया था मगर वो नही आये. गौरव और सचिन मलिकपुरा के रहने वाले थे. मलिकपुरा में इन दोनों को शहीद मानकर इनकी प्रतिमा भी लगी है. मलिकपुरा कवाल से सटा हुआ एक छोटा गाँव है जिसका रास्ता कवाल के बीच को होकर गुजरता था. मलिकपुरा के बच्चे इसी रास्ते से स्कूल जाते थे. जिस दिन शहनवाज़ और गौरव में झगड़ा हुआ तो उस दिन मीडिया ने कहा यह झगड़ा छेड़छाड़ को लेकर हुआ इसका बड़ा पैमाना पर प्रचार भी हुआ.

मगर इस बात को खुद मृतक गौरव के पिता और इस मामले के पक्षकार रविंद्र ने झुठला दिया. जानसठ कोतवाली पर दर्ज एफआईआर संख्या 403/13 में वादी रविंद्र ने लिखकर दिया कि मेरे पुत्र गौरव और शहनवाज़ में साईकिल टकराने को लेकर विवाद हुआ. जिसके बाद उनकी हत्या कर दी गयी.

जबकि दंगे के कहानी लिखने वालो ने कहा कि हिन्दू लड़की से छेड़छाड़ के विरोध पर मुसलमानो ने दो सगे भाइयो का क़त्ल कर दिया. एक अख़बार ने दंगा भड़काने के लिये घटना की काल्पनिक कहानी ऐसे लिख दी जैसे लाइव टेलीकास्ट किया गया हो,शीर्षक था "सीने पर चढ़कर काटी थी साँसो की ड़ोर" दंगे फ़ैलाने की साज़िश के तहत पाकिस्तान की वीडियो को कवाल की बताकर प्रचार दिया गया.

[caption id="attachment_415869" align="aligncenter" width="3264"] शहनवाज़ के अब्बू जो अब पैरोकारी करते है.[/caption]

मृतक शहनवाज़ के ताया अब्बू नसीम अहमद बताते है कि शाहनवाज़ की मलिकपुरे के गौरव से साईकिल टकराने से कहासुनी हो गयी , गौरव ने कहा कि "अपनी मां से पैदा है तो यहीं मिलना "वो अपने ममेरे भाई सचिन के साथ आया और शहनवाज़ को चाकू से मार दिया. बाद में वो भाग गए शोर मचाने पर भीड़ ने इन दोनों को मार दिया. नसीम अहमद बताते है चार साल से उनके बेटे जेल में है जमानत पर सुनवाई भी नही हुई. उनमे से एक मुज्जमिल विकलांग है. शहनवाज़ की हत्या में बाकि लोगो को पुलिस ने विवेचना में निकाल दिया था. गौरव और सचिन की हत्या के आरोप में बंद उनके बच्चो की जमानत पर अभी सुनवाई नही हुई.

पहले शहनवाज़ का कत्ल हुआ, उसके 10 मिनट बाद गौरव और सचिन का, जाहिर है कि शहनवाज़ की एफआईआर पहले लिखी जानी चाहिए,मगर हुआ क्या. गौरव और सचिन की एफआईआर पहले लिखी गयी तीन बजे और शहनवाज़ की एफआईआर रात में साढ़े नौ पर.

[caption id="attachment_415870" align="aligncenter" width="3264"] शाहनवाज़ का घर जहां उसका क़त्ल हुआ[/caption]

सवाल यह भी था जिस सरकार पर मुस्लिमो की हिमायती होने का इल्जाम लग रहा था वो मक़तूल के पिता की तहरीर तक नही ले रही थी. इस सवाल को किसी ने नही उठाया पूछने पर अलग अलग जवाब आते है. जैसे कवाल के चाँद मोहम्मद कहते है कि इस घटना के बाद डीएम और एसएसपी ने गांव में आकर जिस प्रकार से एक समुदाय के लोगो को निशाना बनाया और बेगुनाहों को गिरफ्तार कर लिया तो किसी की भी थाने जाने की हिम्मत नहीं हुई. सब डर रहे थे कि पुलिस जेल भेज देगी.

उस समय जानसठ सीओ रहे जगतराम जोशी के अनुसार हम इंतेज़ार कर रहे थे मगर वो आये ही नही. पहले जो पक्ष आया उसकी रिपोर्ट लिख दी गयी. मगर जानसठ के नोशाद के मुताबिक घटना के बाद ही कोतवाली पर भारी भीड़ जमा हो गयी थी. यहाँ एक सौ से ज्यादा गाड़िया थी. रात में 9 बजे डीएम सुरेन्द्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी को हटा दिया गया और उसके बाद शहनवाज़ पक्ष की रिपोर्ट दर्ज की गयी. पास के गाँव के पूर्व प्रधान सज़्ज़ाद कहते है दरअसल डीएम और एसएसपी जज्बात में बह गए थे वो शहनवाज़ पक्ष की रिपोर्ट नही लिख रहे थे. जब वो हटे तब शहनवाज़ का मुकदमा दर्ज हुआ. यह बात किसी मीडिया और नेता की जानकारी तक नही पहुंची.

कवाल में हिरासत में लिए गए 7 लोगो को छोड़ना भी आज तक सवाल है. प्रचारित किया गया कि कि इन्हें पूर्व सरकार में मंत्री रहे आज़म खान के कहने पर छोड़ा गया. मगर ऐसा नही है. उस समय के सीओ जगतराम जोशी बताते है कि इनमें से एक भी नामजद अभियुक्त नही था. इन्हें छोड़ना ही था. निर्दोष थे तो छोड़ दिया.

[caption id="attachment_415871" align="aligncenter" width="3264"] वो क़ातिल चौराहा जहाँ गौरव सचिन मारे गए.[/caption]

साम्प्रदयिक सौहार्द कायम करने ने सहायता प्रदान करने वाले यहाँ के प्रधान महिन्द्र सैनी कहते है कि लोगो के बर्ताव में कोई फर्क नही है वो अच्छा है. मगर जब बाहर जाते है तो कवाल के लोग हिकारत से देखे जाते है जबकि यहाँ सिर्फ घटना हुई कोई दंगा नही हुआ और यह हमारी बदकिस्मती है कि गाँव में चार साल से पीएसी तैनात है.