30 जनवरी के दिन भी लावारिस रही रामपुर की गांधी समाधि

अफ़रोज़ आलम साहिल, TwoCircles.net

रामपुर : आपको जितना हैरानी ये जानकर होगी कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की एक समाधि यूपी के रामपुर ज़िले में है, उससे कहीं ज़्यादा हैरान आप ये जानकर हो जाएंगे कि बापू के पुण्यतिथि के मौक़े पर ये पवित्र समाधि लावारिस की तरह पड़ी रही और कोई झांकने तक नहीं आया.


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इस समाधि स्थल की देख–रेख करने वाले नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताते हैं कि -‘नेता लोग तो सिर्फ़ 26 जनवरी, 15 अगस्त या फिर 2 अक्टूबर को ही आते हैं. बाक़ी दिन यहां कोई नेता क्यूं आएगा.’ 

बताते चलें कि दिल्ली के राजघाट के बाद यूपी का रामपुर ही पूरी दुनिया में इकलौती ऐसी जगह है, जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अस्थियां दफ़न की गई हैं. यहां गांधी की शहादत की प्रतीक के तौर पर उनकी समाधि स्थल बनाई गई है. ये समाधि रामपुर के मशहूर मौलाना मुहम्मद अली जौहर मार्ग पर बाब–ए–हयात व बाब–ए–निजात के दरम्यान में स्थित है.

Gandhi Samadhi in Rampur

ऐसा भी नहीं है कि ये समाधि स्थल से यूपी सरकार के नुमाइंदे अंजान हैं. बल्कि सीएम अखिलेश यादव तो बाक़ायदा इसके सौन्दर्यीकरण के काम को गुज़रे 26 नवम्बर 2016 को मुकम्मल अंजाम तक पहुंचा चुके हैं. इस मौक़े पर यूपी के कद्दावर मंत्री मोहम्मद आज़म खान भी मौजूद थे. रामपुर आज़म खान का घर है और वे यहीं से विधायक भी हैं. बावजूद इसके आज़म खान भी आज के पवित्र मौक़े पर यहां झांकने तक नहीं आएं. 

यूपी में चुनावी मौसम है. उम्मीद की जा रही थी कि इस चुनावी सीज़न में राजनीतिक मक़सद से ही सही कोई न कोई क़द्दावर नेता यहां ज़रूर आएगा, मगर जब राजनीति जात–पात, धर्म–मज़हब, धनबल व बाहुबल तक सिमट चुकी है, तो ऐसे में गांधी को कौन याद करे.

30 जनवरी के दिन रामपुर में राष्ट्रपिता गांधी की ये बेक़दरी गांधीवादी आर्दशों की बात करने वाले नेताओं व पार्टियों के क़लई खोलने जैसा है. बल्कि यूं कहिए कि ये उपेक्षित पड़ी समाधि उनके आदर्शों के धूमिल होते जाने का संकेत है.

Gandhi Samadhi in Rampur

रामपुर कैसे पहुंची गांधी की अस्थियां 

30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की ख़बर मिलते ही पूरे रामपुर में ग़म में डूब गया. रामपुर के तत्कालीन नवाब रजा अली खां के आदेश पर 31 जनवरी को रामपुर रियासत पूरी तरह से बंद रहा. इतना ही नहीं, पूरे 13 दिन तक सरकारी शोक मनाने का हुक्म जारी किया गया.

2 फ़रवरी को दिल्ली में राष्ट्रपिता गांधी का अंतिम संस्कार किया गया तब रामपुर के क़िले से 23 मातमी तोपें छोड़ी गईं. यहां के इतिहासकारों के मुताबिक़ रज़ा अली खां बापू के अंतिम संस्कार में खुद शामिल हुए थे. इसके बाद उन्‍होंने बापू की अस्थियां रामपुर लाने की इच्छा ज़ाहिर की. शुरू में एक मुसलमान होने के नाते उन्हें अस्थियां देने में संकोच किया गया, लेकिन गांधी के प्रति प्यार होने के कारण पंडितों की राय उनके हक़ में बनी.

10 फ़रवरी को जब देवदास गांधी ने राष्ट्रपिता गांधी की अस्थियां नवाब रामपुर को सौंप दी तो उसे 18 सेर वज़न के अष्टधातु के विशेष कलश में स्पेशल ट्रेन से रामपुर लाया गया. 11 फ़रवरी को सुबह नौ बजे स्टेशन से जुलूस के साथ अस्थियों को स्टेडियम मैदान में जनता के दर्शन के लिए रखा गया. 12 फरवरी को यहां शोक–सभा और धर्म ग्रंथों का पाठ हुआ. फिर अस्थि कलश सुसज्जित हाथी पर कोसी नदी ले जाया गया, जहां नवाब साहब ने अस्थियों का कुछ हिस्सा नदी में विसर्जित किया. शाम को शेष अस्थियां समाधि के लिए नवाब के दरवाज़े पर लाई गई. एक चांदी के बर्तन में अस्थियां रखकर उसके साथ रामपुर का इतिहास और नवाब खानदान का शजरा भी छह–छह फुट के चांदी के दो कैप्सूल में रखकर दफ़न किए गए. नवाब रजा अली खां ने खुद सीमेन्ट का मसाला लगाकर उसको बंद किया. आज उसी स्थान पर गांधी समाधि बनी हुई है.

 

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