मोदी के तीन साल: युवा विद्रोह या राजनीतिक जीत?

साक़िब सलीम शरजील ईमाम


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प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के तीन साल पूरे होने के साथ ही सब ने उनके अब तक के कार्यकाल का आंकलन अपने-अपने हिसाब से किया है और कर रहे हैं. जो प्रधानमन्त्री और उनकी नीतियों के समर्थक हैं, वो गुणगान करते नहीं थक रहे हैं. उनकी मानी जाए तो सरकार ने पिछले तीन साल में जो कर दिखाया वो इस से पहले के 70 बरस की तुलना में कहीं अधिक है. दूसरी ओर विरोधी ख़ेमा है. जिसका कहना है कि सरकार बुरी तरह विफल रही है.

प्रधानमन्त्री और सरकार के प्रतिद्वंदी ख़ेमे की ओर से आने वाला एक इल्ज़ाम जो मुझे सबसे रोचक लग रहा है वो है —सरकार के विरुद्ध खड़े होते रोज़ नए आंदोलन…

हमारे एक मित्र जो कि सरकारी नीतियों के प्रखर आलोचक भी हैं. उन्होंने कल सवेरे एक फ़ेसबुक स्टेटस साझा किया. इस स्टेटस में कहा गया था कि मोदी जी के कारण केजरीवाल, कन्हैया, हार्दिक, चंद्रशेखर ‘रावण’ जैसे लोग भी नेता बन गए.

दूसरी ओर मेरे कई और बुद्धिजीवी मित्रों का मानना है कि जिस तरह पिछले कुछ समय में हार्दिक, शेहला, जिगनेश, कन्हैया आदि का राष्ट्रीय राजनीति में उदय हुआ है वो सरकार की नाकामी को दर्शाता है. उनके हिसाब से ये आने वाले समय में भाजपा शासन के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरेंगे.

मुझे नहीं पता कि क्यों हमारे देश का बुद्धिजीवी वर्ग इतनी कम सोच रखता है कि वो ये मान भी सकता है कि ये प्रधानमन्त्री की विफलता का नतीजा है? मेरे अनुसार प्रधानमन्त्री मोदी के पिछले तीन साल की सबसे बड़ी राजनैतिक उपलब्धि इन युवा चेहरों का उदय ही है.

मशहूर शायर हफ़ीज़ जालंधरी ने फ़रमाया है;

तुझे तो अभी देर तक खेलना है

इसी में तो है जीत हारे चला चल

किसी और ने इस शेर को समझा है या नहीं. लेकिन ऐसा मालूम होता है कि प्रधानमन्त्री और उनके साथियों ने न सिर्फ़ इस शेर को समझा है, बल्कि उसको अपने राजनितिक प्रतिद्वंदियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल भी किया है.

अब आप पूछेंगे कि भला ऐसे युवा नेता अपने ख़िलाफ़ खड़े कर लेना कौन सी राजनितिक समझ है. कौन चाहेगा कि कोई भी उसकी आलोचना करे और उसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन करे?

चलिए, कुछ देर को मान लेते हैं कि इन युवाओं को नाराज़ न होने दिया जाए तो क्या सब कुछ सही रहेगा? सरकार की आलोचना और विरोध क्या तब नहीं होगा? बाक़ी राजनीतिक दल क्या मौन धारण कर लेंगे?

प्रधानमन्त्री और उनकी पार्टी ने बड़ी ही अक्लमंदी के साथ ये पक्का किया है कि देश में जो भी गुस्सा सरकार के ख़िलाफ़ उभरे, उसको कोई स्थापित राजनितिक दल न भुना पाए और वो ऐसे नए नेताओं के ज़रिए सड़कों पर आए, जिनसे सरकार आसानी से निपट सके.

चलिए, कहानी शुरू करते हैं जनवरी 2016 से. 17 जनवरी, 2016 को हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला ने आत्महत्या की थी. जिसका देश भर में विरोध हुआ और मायावती जैसे कई क़द्दावर नेताओं ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया था. इस ही बीच 22 जनवरी को लखनऊ में कुछ छात्रों ने प्रधानमन्त्री के सामने रोहित की आत्महत्या को लेकर नारेबाज़ी की. बजट सत्र शुरू होने को था और सरकार के लिए कुछ भी सही नहीं चल रहा था.

तब ही 9 फ़रवरी को किसी वरदान की तरह जेएनयू में अफ़ज़ल गुरु की बरसी मनायी जाती है. पर केवल इतना काफ़ी नहीं था. ऐसे जलसे तो पिछले दो बरस भी हो चुके थे. कार्यक्रम के आयोजकों में से एक उमर खालिद को टीवी पर बहस के लिए बुलाया जाता है. जिसमें कि वो शामिल भी होता है, ये जानते हुए भी कि उस टीवी चैनल और एंकर का भाजपा प्रेम जग-ज़ाहिर है.

11 फ़रवरी को इस शो के साथ ही देश को एक मुद्दा मिल जाता है, जेएनयू और देशद्रोह. जितने भाजपा विरोधी ख़ेमे थे वो जेएनयू को बचाने उतर पड़ते हैं और वहां के सारे छात्र नेता देश की मीडिया पर छा जाते हैं. इस के साथ ही रोहित वेमुला का मुद्दा पीछे छोड़ दिया जाता है. सरकार देशभक्ति और देशद्रोह के इस नए मुद्दे पर आक्रामक नज़र आई और बजट सत्र की मुश्किलें हल हो गई.

अभी हाल ही में परेश रावल जो कि भाजपा के सांसद भी हैं. उन्होंने ट्वीट किया कि अरुंधती रॉय को जीप से बांधना चाहिए. अगले ही दिन अभिजीत भट्टाचार्य ने जेएनयू की छात्र नेता शेहला के बारे में अपशब्द कहे. सारे सरकार के आलोचक एक बार फिर एकजुट हो गए. होना भी चाहिए. पर क्या कभी आपने सोचा कि परेश रावल ने ये बात जिसके बारे में कही उसके ही बारे में क्यों कही? या अभीजीत ने भी.

मान लीजिए, परेश रावल यही बात मायावती, ममता, सोनिया या किसी और के बारे में बोलते तो भाजपा को सिर्फ़ फ़ेसबुक ही नहीं, सड़कों पर विरोध दिखता. यही बात शेहला के बारे में सच है. ‘बात तो सच है, मगर बात है रुसवाई की’ के शेहला जिस दल से सम्बन्ध रखती हैं, वो भारतीय लोकतंत्र में कोई ताक़त नहीं है. उनका न कोई सांसद हैं और नाम-मात्र को कुछ विधायक हैं बिहार में. ऐसे में अगर लोग इनके पीछे हो भी लेंगे तो भाजपा को नुक्सान नहीं. लोगों का गुस्सा भी निकलता रहेगा और उनको कोई विकल्प भी नहीं मिलेगा.

अब आप पूछेंगे कि मेरे भाई ये बखेड़ा खड़ा ही क्यों करना था? करना था, बिलकुल करना था. जो लोग सरकार के विरोध में सबसे आगे रहते हैं. इस समय सरकार के लिये ये ज़रूरी है कि वो GST की बात न करें. और देखिए उन्होंने नहीं की.

राजनितिक नज़रिए से देखें तो हार्दिक, शेहला, जिगनेश, इनके ज़रिये लोगों का गुस्सा जंतर-मंतर पर फट तो ज़रूर सकता है, पर ये चुनावी दंगल में भाजपा का विकल्प नहीं दे सकते. अगर हम उत्तर प्रदेश को ही लें, तो इनमें से कोई युवा ऐसी पार्टी से नहीं आता जो सरकार से नाराज़ लोगों को चुनावी विकल्प मुहय्या कराता. और यही भाजपा की तीन साल की सबसे बड़ी जीत है. आप धरने दीजिए, प्रदर्शन कीजिए, फेसबुक पर लड़िए, परन्तु एक चुनावी विकल्प खड़ा नहीं कर पाइए.

(दोनों लेखक जेएनयू से इतिहास के शोधकर्ता हैं. यह उनके अपने विचार हैं.)

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