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उज़मा नाहिद : मुस्लिम महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की एक मिशन

(Photo By: Afroz Alam Sahil)

अफ़रोज़ आलम साहिल, TwoCircles.net

मुंबई : मुसलमानों में मज़हबी तौर पर जो रिवायती घराने हैं, उन घरानों की बेटियां भी देश की खुली फ़िज़ा में बुलंदियों की एक नई उड़ान तय कर रही हैं. इनमें एक नाम सबसे पहले उज़मा नाहिद का आता है.

उज़मा नाहिद दारूल उलूम देवबंद के संस्थापकों के परिवार से आती हैं. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की सदस्य हैं. साथ ही देश में मुस्लिम महिलाओं के उत्थान के लिए काम कर रही हैं. ख़ास ध्यान महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने पर है.

TwoCircles.net के साथ बातचीत में कहती हैं कि, मुल्क के मौजूदा हालात में मुसलमानों को अपनी हिकमत-अमली में अब यू-टर्न लेने की ज़रूरत है. अब तक हम अपनी अधिकारों को मांगों को पूरा कराने के लिए हम धरना-प्रदर्शन व हड़ताल जैसे हथियारों का इस्तेमाल करते रहे हैं, लेकिन हमें इससे बचने की ज़रूरत है.

वो कहती हैं कि, मुसलमान इस मुल्क के पहले शहरी हैं, इसलिए हमें किसी भी तरह के अहसास-कमतरी में मुब्तला होने की ज़रूरत नहीं है. ये एक सेकूलर व लोकतांत्रिक देश है और हमारा भी फ़र्ज़ है कि हम इसे हमेशा ज़िन्दा रखें. हम सिर्फ़ अपने मसायल तक सीमित न रहे, बल्कि क़ौमी एजेंडे को ध्यान में रखें.

ग़ौरतलब रहे कि उज़मा नाहिद पिछले 30 सालों से मुस्लिम महिलाओं के बीच काम रही हैं. इन्हें कई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय अवार्डों से नावाज़ा जा चुका है. पिछले साल मार्च महीने में ही उनके महिला कल्याण और आर्थिक विकास के कार्यों से प्रभावित होकर इंटरनेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया था. इन्हें ये अवार्ड वर्ल्ड ट्रेड सेंटर द्वारा महिलाओं के आर्थिक विकास से संबंधित एक वैश्विक सम्मेलन में दिया गया. इस सम्मेलन में दुनिया भर के अर्थशास्त्री व व्यापारी शरीक थे. यही नहीं, पिछले दिनों दक्षिण कोरिया में आयोजित अमन कांफ्रेस में भी इन्हें सम्मानिक किया गया था.

उज़मा नाहिद एक मां की कहानी सुनाते हुए बताती हैं कि, पांच बेटों ने अपनी मां घर से बाहर फेंक दिया. अपने बेटों की इस घिनौनी हरकत के बाद वो बेहोश हो गई और पूरी रात सड़क पर ही पड़ी रही. सड़क पर आवारा कुत्तों ने उसे खाने की भी कोशिश की थी. इस घटना ने मेरे अंदर इतनी बेचैनी पैदा कर दी कि इसी दिन से मैंने महिलाओं को सशक्त बनाने क़सम खा ली. बस यहीं से मैंने गरीब और बेसहारा महिलाओं के रोज़गार के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए और उन्हें धन उपलब्ध करवाया ताकि यह महिला अपने कौशल के माध्यम से विभिन्न उत्पादें बना सकें. ऐसी गरीब महिलाओं के सामने यह समस्या है कि माल कैसे खरीदें और अपने उत्पादें कहाँ बेचें. तो ये प्लेटफॉर्म भी हमने तैयार कर लिया है.

बताते चलें कि उज़मा नाहिद का संगठन इक़रा इंटरनेशनल वूमेन्स अलाएंस (IIWA) महिलाओं का संगठन है, जिसने विभिन्न शहरों में अपने केंद्र स्थापित करके बेसराहा महिलाओं को धन उपलब्ध करवाके उनकी शिल्प व कौशल का इस्तेमाल किया और फिर बड़े शहरों में प्रदर्शनियों के माध्यम से बड़े शो रूम्स में बेचने का काम किया. या फिर बड़े व्यापारियों से संपर्क करके उनकी हाथ की बनाई चीज़ों को उच्च क़ीमत पर बेचने की व्यवस्था की, जिससे इन महिलाओं की क़ीमत कई गुणा बढ़ गई.

नवंबर 2008 में औपचारिक रूप से शूरू हुए इस संस्था के माध्यम से आज भारत भर में केवल महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार में हजारों महिलाएं डेढ़ सौ से अधिक उत्पाद बना रही हैं, जो भारत और विदेशों में लोकप्रिय हैं. आमतौर ये औरतें अपने घरों से ही काम कर रही हैं ताकि वे अपनी घरेलू जिम्मेदारियों का भी निर्वहन अच्छे से कर सकें. तलाक़शुदा और विधवा औरतें भी बड़ी संख्या में इस संस्था के विभिन्न योजनाओं से लाभ उठा रही हैं.

उज़मा नाहिद का मानना ​​है कि जिस तरह प्राचीन काल में महिलाएं व्यापार करती थीं, उसी तरह आज भी मुस्लिम महिलाएं व्यवस्था के दायरे में रहते हुए कई काम कर सकती हैं और गरीबी और तंगदस्ती से छुटकारा पा सकती हैं, जिससे उनके बच्चों का भविष्य नष्ट होने से बच सकता है.

(Photo By: Afroz Alam Sahil)

वो कहती हैं कि, मुस्लिम बच्चियां ख़्वाब ज़रूर देखें. और हर तरह के ख़्वाब देखें. और घर वालों को यक़ीन भी दिलाएं कि आप में इस ख़्वाब को पूरा करने की क्षमता भी है. मुझे मालूम है कि हमारी लड़कियों को सलाहियतों व हौसलों की कोई कमी नहीं है. बस कमी है तो सिर्फ़ रहनुमाई की. अगर ये इन्हें हासिल हो गई तो फिर ये किसी से भी पीछे नहीं होने वाली हैं. तो इन्हें मैं बता दूं कि आज पूरी दुनिया बस क्लिक पर है. आप दुनिया के एक्सपर्ट से रहनुमाई हासिल कर सकती हैं. आप हर काम कर सकती हैं.

उज़मा नाहिद कहती हैं कि, सोचने की बात है कि जब एक यहूदी कम्पनी हिजाब बेच सकती है तो हमारी मुस्लिम बच्चियां क्यों नहीं. हलाल कॉस्मेटिक भारत एक बड़ा व्यापार है, लेकिन इस व्यापार को करने वाला मुस्लिम नहीं. हमें इस पर सोचने और आगे आने की ज़रूरत है. अपने अंदर कांफिडेंस लाने की ज़रूरत है. हमें नए-नए बिज़नेस स्टार्टअप शुरू करने की ज़रूरत है. ज़रा सोचिए हमारे क़ौम की महिलाएं व मर्द लेबर बने हुए हैं, कमा कोई और रहा है. हमें इस सिस्टम को बदलने की ज़रूरत है. याद रखिए! दुनिया को आपके लिबास से कोई मतलब नहीं है, बल्कि वो आपके टैलेंट व दीमाग़ की क़द्र करता है.