कुंभ को रोशन कर रहा है एक मुसलमान

आस मोहम्मद कैफ , TwoCircles.net

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में कुंभ का आयोजन हो रहा है.यहां 15 करोड़ हिंदुओ के धार्मिक स्नान में भाग लेना का अनुमान है.  कुंभ में लाइट का काम देख रहे मुजफ्फरनगर के मुल्ला जी महमूद आजकल खबरों में है जूना अखाड़े के साथ उनका साथ 33 साल पुराना है. 2013 में दंगे का दंश झेलने वाले मुजफ्फरनगर के मुल्ला जी कुंभ में साधुओं के तंबू को रोशन कर रहे हैं अपने अनुभवों को साझा करते हुए वो हमसे कहते हैं


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“ईशा(रात में पढ़ी जाने वाली)की नमाज़ देर तक पढ़ी जाती है इसमें आधा घण्टा लगता है।यही वक़्त रोशनी की जरूरत का वक़्त है।बिजली खराब हो जाएं तो कैम्प में अंधेरा हो जाता है।मैं नमाज़ में होता हूँ और महाराज जी मेरे तंबू में आ जाते हैं।तब तक मैं नमाज़ पढ़ता हूँ वो खड़े रहते हैं मेरे सलाम फेरने(नमाज़ पूर्ण होने की एक प्रक्रिया)के बाद वो मेरे नजदीक आते है मेरे पास बैठकर धीरे से कहते है बिजली खराब हो गई है मैं उनके साथ जाता हूँ।बिस्मिल्लाह(ईश्वर के नाम से शुरू करता हूँ) पढ़ता हूँ”.

महूमद बताते है “मुस्तक़िल तरीके से यह हमारा ग्यारहवा कुम्भ है इससे पहले मैं चार कुंभ हरिद्वार और तीन उज्जैन में कर चुका हूँ जबकि चौथा प्रयाग में चल रहा है। 76 साल के मुल्ला जी के अनुसार जिंदगी के 33 साल इन्हें आयोजन में खर्च हो गए है. साधुओं ने कभी उन्हें यह अहसास नही कराया है कि वो उनमे से नही हूँ। जैसे वो कहते हैं “मेरे  ईरिक्शा पर मुल्ला जी लाइट वाले का बैनर लगा है यहां सब जानते है कि मैं मुसलमान हूँ यहाँ नमाज़ पढ़ता हूँ ,सब सहयोग करते हैं हंसी मजाक होती है।मोहब्बत का माहौल है।कभी किसी ने मुसलमानों पर कोई आपत्तिजनक टिप्पणी नही की है कई बार जूना अखाड़े के प्रेमगिरि महाराज ने अपने साथ बैठाकर खाना खिलाया है”.

मुल्ला जी महमूद कुंभ में मशहूर हो चुके हैं (Photo: WhatsApp)

मुल्ला जी महमूद मुजफ्फरनगर के सरवट गेट के रहने वाले हैं।दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से यह मुजफ्फरनगर के सबसे सवेदनशील इलाका है और दो बड़ी आबादियों को अलग अलग हिस्से में बांटता है.मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान यहां जमकर बवाल भी हुए यहीं मुल्ला जी के इकलौते बेटे की मुल्ला जी लाइट वाले के नाम से दुकान भी है.मुल्ला जी कहते हैं”मुझे अपने घर से अच्छा माहौल कुंभ में मिलता है मैं तीन दशक से जून अखाड़े के साथ हूँ पहली बार मैं हरिद्वार में उनके संपर्क में आया था उसके बाद हम साथ साथ हो गए हालांकि यहां मैं पैसे कमाने की नीयत से नही आता.यहां ज्यादा पैसा भी नही है मगर अब मोहब्बत हो गई है जूना अखाड़े के साधु संत अपने परिवार की तरह मानते हैं.मुजफ्फरनगर में दंगा सियासतदानों की देन था।साधु संत तो प्रेम की बात करते हैं मैं इनके बीच सुरक्षित महसूस करता हूँ.

हरिद्वार उज्जैन और प्रयागराज के पिछले 33 सालों के 11 कुम्भ में मुल्ला जी स्नान कर चुके है.गंगा के इसी पानी मे उन्होंने वुजू करके हमेशा नमाज पढ़ी है वो कहते हैं”खुदा को मानने के अपने तरीके है सब रास्ते वही जाते हैं मैं नमाज पढ़ता हूँ वो पूजा करते हैं मेरी टीम में यहां 10 लोग है जिसमे मैं अकेला मुसलमान हूँ”.

पिछले कुछ दिनों से मुल्ला जी मीडिया की सुर्खी बने हुए हैं वो कहते हैं”यहां टीवी नही चलता इसलिए लोगो को पता नहीं है मगर मुझे फोन बहुत आ रहे हैं इनमे विदेशों से भी कुछ फोन आए है”

मुल्ला जी महमूद कभी स्कूल नही गए वो दाढ़ी रखते हैं टोपी पहनते है और पैर में हमेशा हवाई चप्पल रखते हैं.इनकी शारीरिक क्षमता देखकर आपको यह समझने में भी मुश्किल हो सकती है कि क्या वाकई वो 76 साल के है मुल्ला जी कहते हैं “जिंदगी भर मेहनत की है इसलिए शरीर मजबूत है अगर आपका हाथ पकड़ लूं तो छुड़ा नही पाओगे”.साधुओं की संगत उन्हें भाती है और उनकी गहरी मित्रता हो गई है वो कहते है “एकदम अपनापन है किसी तरह का कोई भेदभाव कभी नहीं हुआ है मेरे दिल को कोई ठेस पहुंचे ऐसी कोई बात कभी नही कही गई .है 1986 में पहली बार जब हरिद्वार में  जूना अखाड़े के लोगो ने मुझे अपने टेंट की बिजली ठीक करने के लिए बुलाया था तो प्रेमगिरि महाराज मेरे काम से प्रभावित हुए और मुझे नियमित तौर पर साथ रहने की पेशकश की गई मेरे लिए टेंट की व्यवस्था की गई “.

मीडिया में उनकी तारीफ के बाद वो नायक बन गए हैं मुजफ्फरनगर में  हाजी आसिफ कहते हैं कि उनके तमाम आयोजनों के काम पिछले 15 साल से वो ही देखते है उनके काम मे कभी कोई शिकायत नही आई वो अत्यंत मेहनतकश और ईमानदार है शायद उनकी इसी बात ने जूना अखाड़े महंत प्रेमागिरी महाराज को प्रभावित किया और वो उन्हें प्रत्येक कुम्भ में हमेशा अपने साथ रखते हैं.इंसान का इंसान से भाईचारा ही सबसे अहम बात है. मुल्ला महमूद मियां ने मुजफ्फरनगर का सकारात्मक चेहरा दुनिया के सामने पेश किया है.

मुजफ्फरनगर में रह रहे उनके इकलौते बेटे मशकूर बताते हैं है लाखों लोग की भीड़ के चलते अक्सर उनके फोन के नेटवर्क भाग जाते हैं और वो कई-कई दिन संपर्क से बाहर रहते हैं मगर हम इससे परेशान नही होते क्योंकि हमें विश्वास है अखाड़े के साधु संत उनको कोई परेशानी नही होने देँगे.

 

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