तबलीग़ी जमात से जुड़े होने के शक मेंं आर्थिक बहिष्कार झेल रहें हैं जम्मू के गुज्जर बकरवाल मुसलमान

MILK SUPPLIER MASKEEN ALI

ज़हूर हुसैन, twocircles.net

सोशल मीडिया पर पिछले हफ्ते जम्मू के सीमा क्षेत्र सुचेतगढ़ के घराना नामक पंचायत हल्क़े के सरपंच की तरफ़ से जारी एक कथित आदेश की कॉपी वायरल हुई। इसके अनुसार पंचायत घराना में गुज्जर बकरवाल मुसलमानों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसी बीच सोशल मीडिया पर ही पता चला कि जम्मू के पांच जिलों के बहुसंख्यक समुदाय के लोगों ने गुज्जर बकरवाल मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार करते हुए उनसे दूध खरीदना बंद कर दिया है  जिसके चलते यह समुदाय दूध नदियों नालियों में बहाने पर मजबूर हो गया है।


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आर्थिक बहिष्कार क्यों?

पिछले महीने पूर्व दिल्ली के निज़ामुद्दीन मरकज़ में तबलीग़ी जमात पर कोरोना लॉकडाउन के बीच विशाल धार्मिक समारोह किये जाने तथा उन पर कोरोना फैलाने के आरोप की गाज जम्मू में रहने वाले गरीब गुज्जर बकरवाल समुदाय विशेष पर भी पड़ रही है। बहुसंख्य समुदाय इस गुज्जर बकरवाल समुदाय पर आरोप लगा रही है कि यह समुदाय तबलीग़ी जमात के समर्थक हैं। साथ ही यह अफवाह भी फैलाई जा रही हैं कि समुदाय विशेष के दूध बेचने वाले उन्हें दूध सप्लाई करने से पहले इस पर थूक देते हैं। इनकी वजह से बहुसंख्य समुदाय के लोगों ने अब इन से दूध और दूध से बनी चीज़ें ख़रीदना बंद कर दिया है।

बता दें कि गुज्जर बकरवाल समुदाय से सम्बंधित ज्यादातर लोग दूध विक्रेता हैं और अपने मवेशियों से प्राप्त होने वाला दूध यहाँ के स्थानीय लोगों को बेचने के अलावा फैक्टरियों को भी सप्लाई करके अपनी रोज़ी रोटी कमाते हैं। लेकिन उक्त आरोपों के चलते इन दिनों न तो स्थानीय लोग इनसे दूध खरीद रहे हैं और न ही फैक्टरियों के मालिक।

वर्ष 2018 के जनवरी में जब कठुआ के रसाना क्षेत्र में गुज्जर बकरवाल समुदाय की एक छोटी बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या का मामला सामने आया तो इस समुदाय को उस समय भी सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा था। प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता गुफ़तार अहमद चौधरी ने TwoCircles.net को बताया कि देश में पिछले कुछ समय से तबलीग़ जमात के खिलाफ मीडिया ट्रायल जारी है जिस के कारण यहाँ का गुज्जर बकरवाल समुदाय भी प्रभावित हुआ है।

उन्होंने कहा, “जम्मू के कई क्षेत्रों खासकर कठुआ, साम्बा और आरएस पुरा में लोगों ने उनसे दूध लेना बंद किया है। बीच में अफवाहें फैलाई गई कि मुसलमानों की वजह से कोरोना फैल रहा है। यह अफवाह भी फैलाई गई कि ये लोग दूध थूक कर दे रहे हैं। दूध की यह सप्लाई अखनूर से लखनपुर जाती है।”

गुफ़तार के अनुसार जम्मू में दूध के व्यवसाय से जुड़े गुज्जर बकरवाल समुदाय के लोगों की आबादी तीन से साढ़े तीन लाख है। उनका दूध इस्तेमाल करने वालों की संख्या पंद्रह से बीस लाख है। यह हर दिन एक से डेढ़ लाख लीटर दूध बाज़ार में सप्लाई करते हैं। उन्होंने कहा, “आप ने सोशल मीडिया पर वीडियो देखी होगी, गुज्जर बकरवाल समुदाय के लोग अब अपना दूध फेंक रहे हैं। कर भी क्या सकते हैं? पनीर बनाएंगे तो उसका क्या करेंगे? इन के लिए दूध बेचना आमदनी का सबसे बड़ा स्रोत है।”

उन्होंने आगे कहा, “गुज्जर बकरवाल समुदाय के लोग दूध बेचकर अपने लिए दो समय के भोजन और मवेशियों के लिए चारे का प्रबंधन करते थे। परंतु अब क्या करेंगे? उन्हें मवेशियों के लिए चारा नहीं मिल रहा।”

कठुआ के रहने वाले दूध आपूर्तिकर्ता मस्कीन अली कहते हैं, ” मैं कारखानों और दुकानदारों को दूध सप्लाई करता था। लेकिन अब लोग कहते हैं पता नहीं इन के दूध में क्या मिला होगा। दूध के साथ साथ पनीर भी नहीं बिकता है। हम दूध पानी में फेंकने पर मजबूर हैं। हम इस दूध से घी बनाते लेकिन हमारे पास उसको रखने के लिए बर्तन नहीं हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “ये लोग हमें तबलीग़ी जमात के साथ जोड़ते हैं। कहते हैं उन को बीमारी है आप को भी बीमारी हो सकती है। अब हम जिला मजिस्ट्रेट से मिलते लेकिन वहाँ जाने नहीं देते।”

एक और दूध आपूर्तिकर्ता ने नाम छिपाने की शर्त पर TwoCircles.net को बताया कि हमें बहुत सी समस्याओं का सामना  करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी समस्या यह कि  हमारे दूध  की बिक्री नहीं हो रही है। दुकानदार बोलते हैं लोगों ने दूध लेना बंद किया है।

उन्होंने कहा, “कुछ समुह हैं जो लोगों से कहते हैं उन को कोरोना है और उनसे दूध मत खरीदो। हम समस्या को बढ़ाना नहीं चाहते हैं, हम चाहते हैं बेवजह की सजा हमें न दी जाए। अगर यह समस्या बढ़ गई तो हमारा यहाँ रहना और जीना कठिन बन जाएगा। सरकार को हमारे बारे में भी सोचना चाहिए, वह हम से दूध खरीद सकती है।”

दूध आपूर्तिकर्ता ने बताया कि हमें कोरोना वाले कह कर पुकारा जाता है। हमें मजबूरन अपना दूध फेंकना पड़ता है। हमारे पास मवेशियों को चारा खिलाने के लिए भी पैसे नहीं हैं। उन्होंने आगे कहा, “हम एक दो दिनों के अंदर हस्ताक्षर अभियान शुरू करेंगे। इसके माध्यम से हम सरकार हस्तक्षेप की अपील करेंगे। यही स्थिति रही तो हमारे मवेशी भूखे मर जाएंगे।”

जम्मू और कश्मीर में बहुत से लोग गुज्जर बकरवाल समुदाय के पक्ष में बोलने लगे हैं। जम्मू की एक महिला पत्रकार पल्लवी सरीन ने गुज्जर बकरवाल समुदाय से दूध न लेने की कार्रवाई को सामाजिक बहिष्कार का नाम दिया है। उन्होंने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में लिखा, “कोरोना  विश्वमारी के बीच गुज्जर समुदाय को प्रताड़ित करने और उनका सामाजिक बहिष्कार की कई ख़बरें सामने आई हैं। लोगों ने इनसे दूध अथवा दुग्ध उत्पाद की  खरीदारी बंद कर दी जबकि इनकी जीवन निर्वाह केवल इस पर ही निर्भर करता है।”

प्रशासन क्या कह रहा है?दोधी गुर्जर एसोसिएशन के अध्यक्ष जमील चौधरी ने मामले को लेकर जम्मू और कश्मीर पुलिस के आईजी जम्मू मुकेश सिंह के साथ बैठक की है जिन्होंने समुदाय के भरपूर सहयोग देने का वादा क्या है। एसोसिएशन ने प्रशासन के अन्य अधिकारियों से भी मुलाकात की है और उनसे कहा है कि वे दूध की गुणवत्ता और चल रही नफरत अभियान को लेकर एडवाइज़री जारी करें।

इस बीच जमील चौधरी ने एक बड़ी घोषणा की है, उन्होंने जम्मू प्रांत में स्थापित सभी क्वारंटीन केन्द्रों को दूध मुफ्त सप्लाई करने की घोषणा की है। उन्होंने कहा, “मेरी प्रांतीय आयुक्त से बात हुई और में ने उनसे कहा है कि हम सभी क्वारंटीन केन्द्रों को दूध मुफ्त सप्लाई करेंगे। हमारी माली हालत जैसी भी हो लेकिन हम दिल से ग़रीब नहीं हैं। हम सरकार के साथ खड़े रहेंगे।”

उन्होंने आगे कहा, “अफवाहों का बाजार गर्म है। हम जम्मू में 80 प्रतिशत से अधिक आबादी को दूध सप्लाई करते हैं। लोग हमारा दूध सालों से इस्तेमाल करते आए हैं। आज कोई नया दूध नहीं है। दोधी गुर्जर समुदाय के किसी भी व्यक्ति का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव नहीं आया है।”

आर्थिक बहिष्कार को दिया जा रहा है रसाना का नाम

कुछ लोग जम्मू में गुज्जर बकरवाल समुदाय के आर्थिक बहिष्कार को रसाना 2 का नाम दे रहे हैं। ग़ौरतलब है कि वर्ष 2018 में जम्मू के रसाना क्षेत्र में उक्त समुदाय की एक आठ वर्षीय बच्ची के अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या के मामले के सामने आने के बाद भी उक्त समुदाय को बहुसंख्यक की तरफ से सामाजिक बहिष्का दंश झेलना पड़ा था। मृतक बच्ची के दुष्कर्म व उसकी हत्या में  बहुसंख्यक समुदाय के एक पुजारी और कुछ अन्य लोगों के संलिप्त होने के सबूत मिलने के बावजूद भी बहुसंख्यक समुदाय ने पीड़ित बच्ची के परिजनों के साथ साथ इस समुदाय विशेष के लोगों को सताया और उनका सामाजिक बहिष्कार कर तत्कालीन प्रशासन से उस समुदाय को वहाँ से हटाने पर दबाव डाला था।

 

 

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