दलित साहित्य समारोह, दूसरे साहित्य समारोह के बीच में एक अलग पहचान

मीना कोटवाल, Twocircles.net

दिल्ली। देश में कई तरह के साहित्यिक समारोह होते हैं। लेकिन पिछले दो साल से दिल्ली में दलित साहित्य समारोह का आयोजन किया जा रहा है। यह साहित्य समारोह दूसरे साहित्य समारोह के बीच अपनी एक अलग पहचना बना रहा है। यहां दलितों और बहुजनों से जुड़े मुद्दों पर ख़ास चर्चा होती है। जो शायद ही कहीं दूसरे साहित्य समारोह में शामिल किया जाता हो। दूसरे समारोह में एक विषय के तौर पर कुछ समय के लिए इनके मुद्दों को शामिल किया जाता है। लेकिन दिलत साहित्य समारोह की थीम ही इस तरह से तैयार की जाती है कि अधिक से अधिक दलितों के संघर्ष और उत्पीड़न का सच सामने लाया जा सके। इस कार्यक्रिम की शुरूआत पिछले साल से ही की गई है।


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इसका आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में किया जाता है। इस साल इसका आयोजन 16 और 17 फरवरी को किया गया। इस समारोह में कई दलित चिंतक, समाज सेवक आदि भाग लेते हैं। लेकिन बहुत दुखद है कि इन समारोहों में केवल वही लोग दिखाई दिए जो खुद दलित, आदिवासी या वंचितसमुदाय से हो। कुछ-एक उनके संघर्ष को समझने वाले भी मौजूद रहे। इस कार्यक्रम में ना केवल देश के बल्कि विदेशी छात्र और वक्ताओं ने भी भाग लिया।

इस आयोजन का कार्यक्रम दो दिन के लिए आयोजित किया गया। समारोह में कॉलेज की दीवारें दलितों के संघर्ष से भरे पोस्टर से लदी हुई थी। इसके साथ हीदलित और बहुजनों से जुड़ों मुद्दों पर कई तरह की किताबें भी वहां मौजूद रही। नए-नए युवाओं में दलितों के संघर्ष को जानने के इस मौक़े पर उनके बीच एक अलगजोश दिखाई दिया। एक विद्यार्थी ने बताया कि यहां आकर उन्हें वो सब देखने और समझने का मौका मिल रहा है जो सिलेबस की किताबों में केवल नाम मात्र है। आए दिन समाचार में दलितों के प्रति घृणा की कई खबरे मिल जाती हैं लेकिन यहां उनके असल मुद्दें जानने को मिले।

पहले दिन ममता कालिया, प्रो. विवेक कुमार, चौथीराम यादव आदि जैसे बड़े नामचीन हस्तियों ने अपना वक्तव्य रखा। सभी ने दलितों के प्रति हो रहे भेदभाव परचिंता व्यक्त की। साथ ही आरक्षण के प्रति सर्वण समाज की कड़वाहट से भी रू-ब-रू करया।

इस बार के समारोह में कई मुद्दों पर बात हुई, जिनमें एलजीबीटीक्यूआई, दलित उत्पीड़िन, ब्राह्मवादी विचारधारा, बहुजनों की भागीदारी आदि पर चर्चा की गई। दूसरेदिन कार्यक्रम में बल्ली सिंह चीमा, जयप्रकाश कर्दम, हेमलता, स्नेहलता नेगी , जैसे नामचीन कवियों ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध और आंदोलितकिया। इन कविताओं में जहाँ उत्पीडन की वेदना थी वहीँ उनमें संघर्ष का जोश और अस्मिता का उत्सवगान भी था।

कार्यक्रम में विभिन्न महाविद्यालयों के शोधार्थियों द्वारा शोधपत्रों की प्रस्तुति की गयी। शोधपत्रों के विषयों में दलित चिंतन, मीडिया, फिल्म, स्त्री अस्मिता आदिशामिल थे। सत्र के अध्यक्ष, ख्यातिप्राप्त साहित्यकार एच. एल. दुसाध ने कहा कि समतामूलक समाज के लिए हमें कार्ल मार्क्स को हमेशा याद रखना होगा। उन्होंनेयह भी कहा कि दलित साहित्य उन्मुक्ति का साहित्य है।

युवाओं और भाग लेने वाले लोगों का जोश बना रहे इसलिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी प्रवंध किया गया, जिनमें कई गीत गाए। बाबा साहेब से जुड़ी कविताएं कीगई। आखिर में प्रेमचंद की रचनाओं ‘ठाकुर का कुआँ’ और ‘सद्गति’ का ब्लू फेदर थिएटर ग्रुप द्वारा मंचन किया गया। इस नाटक के माध्यम से ग्रामीण समाज मेंजाति के दंश को भावपूर्ण तरीके से दर्शाया गया।

समापन सत्र में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने कहा कि साहित्य ही ब्राह्मणवादी व्यवस्था द्वारा खोजे जा रहे भेदभाव के नित नए रूपों को चुनौती दे सकता है।उन्होंने फैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म ‘हम देखेंगे’ को उद्धृत करके साहित्य की संभावनाओं पर जोर दिया और कहा कि ये सत्ता को भयभीत करता है। उसने कहा कि येचंद शब्द सैकड़ों भाषणों से अधिक शक्ति रखते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासियों, नर्मदा बचाओ आंदोलन के संघर्षरत लोगों और जीवनशालाओं के बच्चों तक इस उत्सव को ले जाया जाए तो फासीवादीताकतों को हमारी एकजुटता की झलक मिल सकेगी। प्रख्यात पत्रकार और लेखक चंद्रभान प्रसाद ने कहा कि साहित्य को दलितों की संघर्ष, साहित्य और सफलताको दर्ज करना चाहिए।

आयोजकों ने उन सभी लोगों को धन्यवाद दिया जिन्होंने इस घटना को अपनी उत्साही भागीदारी और निस्वार्थ श्रम से संभव बनाया। पहले दिन की ही तरह पुस्तकमेले और हस्तशिल्प के स्टॉल्स पर भीड़ लगी रही। इस समारोह में शामिल हुए सभी दर्शकों ने कहा कि समाज में जागरूकता और संवेदनशीलता लाने के लिए इसतरह के उत्सव अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं जहाँ हर वंचित आवाज़ को एक स्वर मिले। एक नई दुनिया की संभावना प्रबल हो। एक नए समाज, जहाँ सबके लिए अवसर औरबराबरी का अधिकार हो।

 

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