ये घटनाए बताती है कि उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के लिए सब कुछ सही नही हो रहा है!

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हिना मंसूर ।Twocircles.net 

13 जून-


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न्यूज़ वेबसाइट ‘स्क्रॉल’ की कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा ने लॉकडाऊन खत्म होने और अनलॉक के प्रारंभ होने के तुरंत बाद भारत के लोगो को इस दौरान हुई परेशानियों का आंकलन करने का फैसला लिया और उन्हें लगा वाराणसी इसके लिए सबसे सही जगह है। सुप्रिया यहां जून के पहले सप्ताह तक वो यहां रही और उन्होंने 8 ग्राऊंड रिपोर्ट लिखी। इन रिपोर्ट्स में उन्होंने विविधताओं के आधार पर लोगो की समस्याओं को उजागर किया। इसमे मंदिर के पुजारी, फूल बेचने वाले, बुनकर, महिलाएं ,मजदूर ,बच्चों और समाज के अलग अलग वर्ग के अलावा वो डोमरी गांव भी गई। वहां लोगो से बात की, उनकी मुश्किलो को सुना।

दिल्ली में रहने वाली सुप्रिया देशभर में लॉकडाऊन के दौरान  हुई परेशानियों पर रिपोर्टिंग करना चाहती थी और उन्हें लगा कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र से बेहतर समझने के लिए कुछ और नही हो सकता है। सातवें दिन सुप्रिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गोद लिए हुए गांव डुमरी पहुंची। गांव के लोगो की तक़लीफ़ को उन्होंने लिखा,इसमे उन्होंने एक महिला माला देवी से बातचीत का वर्णन किया। सुप्रिया की रिपोर्ट के मुताबिक महिला ने उन्हें बताया कि “वो चाय और रोटी खाकर सो रही थी और कई बार भूखी ही सो गई”।

रिपोर्ट के पब्लिश होने के एक सप्ताह बाद 18 जून को उक्त महिला माला देवी स्थानीय रामनगर थाने पहुंची और उन्होंने दावा किया कि रिपोर्ट में उनकी तरफ़ से लिखी गई बात सच नही है। वो तो नगरनिगम(आउटसोर्सिंग) में काम करती है। उन्हें लॉकडाऊन में एक भी दिन भूखा नही सोना पड़ा।उन्हें किसी तरह की कोई परेशानी नही हुई। इसी थाने में सुप्रिया शर्मा के ख़िलाफ़ विभिन्न धाराओं में तत्काल मुक़दमा दर्ज कर लिया गया। साथ ही सुप्रिया के विरुद्ध एस सी/एसटी उत्पीड़न की धाराओं में भी केस दर्ज किया गया।

8 जून-

इसी जून माह की एक तारीख़ को एक और घटना हुई। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के दर्जनों पत्रकार हाथों में पत्रकार उत्पीड़न की तख्ती लेकर नदी में नाभि की गहराई तक पानी मे नग्न खड़े हो गए। ये सभी स्थानीय जिलाधिकारी को हटाएं जाने की मांग कर रहे थे,इनका कहना था कि यहां पत्रकारों में डर पैदा करने की कवायद की जा रही है और इसी परिपेक्ष्य में अजय भदौरिया नाम वाले एक वरिष्ठ पत्रकार के विरुद्ध केस दर्ज कर लिया गया।

10 जून

एक अलग घटनाक्रम में 4 जून को मुजफ्फरनगर के सैकड़ों पत्रकार केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान के घर पहुंचकर धरने पर बैठ गए।  केंद्रीय मंत्री महोदय वहां नही थे तो उन्होंने राज्य सरकार में मंत्री कपिल देव अग्रवाल और विद्यायक उमेश मलिक को इन्हें सुनने के लिए भेज दिया। पत्रकारों ने स्थानीय प्रशासन पर पत्रकारों के उत्पीड़न का आरोप लगाया जो एक पखवाड़े में दर्जनों पत्रकारों के विरुद्ध मुक़दमे दर्ज कर चुका था। कइयों के साथ दुर्व्यवहार किया गया था पत्रकार सबसे ज्यादा इसलिए नाराज थे क्योंकि  एक ऐसे न्यूज़ चैनल के पत्रकार पंकज बालियान को भी पुलिस ने जेल भेज दिया था जिसकी बहन की दो दिन बाद शादी थी। इसमें 8 अप्रैल सहारनपुर देवबंद में एक पत्रकार को पुलिस ने सरेआम लाठी से पीटे जाने जैसे मामलेे अलग है,इसके अलावा  ख़बर लिखने वाले पत्रकार के साले के विरुद्ध मुकदमा लिखकर जेल भेज दिया गया।

मेरठ में भी पत्रकारों में डर पैदा करने के लिए कुछ युवकों को फर्जी पत्रकार बताकर कार्रवाई कर दी गई।पिछले तीन महीनों के लॉकडाउन के दौरान प्रदेश भर से पत्रकार उत्पीड़न की असंख्य घटनाएं आई। एक अनुमान के मुताबिक 55 पत्रकारों के विरुद्ध मुकदमा लिखा गया है अथवा जेल भेज दिया गया है।

उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन(उपजा) के प्रदेश सचिव मनोज भाटिया के अनुसार यह हालात चिंताजनक है।पत्रकारों को निर्भीक होकर अपना काम करना चाहिए। यह घटनाएं आपस मे एक दूसरे से जुड़ी है। निश्चित तौर पर इस समय सच बयां करना बेहद मुश्किल काम हो गया है।

हमारे संगठन के लोग इससे चिंतित है। हमने सरकार से कहा है कि पत्रकारों के प्रति इस तरह की कार्रवाई आमजन में बहुत ग़लत संदेश जा रहा है। हमें स्पष्ट दिखाई दे रहा है यह पत्रकारों पर दबदबा क़ायम करने की कवायद है।उन्हें नियंत्रित किया जा रहा है। यह ‘मीठा मीठा गप गप’और कड़वा कड़वा थू थू ‘जैसी स्थिति है। हम भयभीत नही होंगे।

सुप्रिया शर्मा ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वो अपने स्टैंड पर क़ायम है। उन्होंने ख़बर में जो लिखा है। वो सही है। माया देवी के हवाले से जो लिखा गया है वो माया देवी ने ही बताया था। माया देवी से बात करने पर अब उनसे बात नही हो पा रही है।

उत्तर प्रदेश सरकार पत्रकारों को पूर्ण स्वतंत्रता देने का दावा करती है।उत्तर प्रदेश के सूचना निदेशक शिशिर दावा करते हैं एक भी निर्दोष पत्रकार का उत्पीड़न नही हो रहा है।अगर इस तरह की कोई शिकायत मिलती है तो निश्चित सुनवाई होगी।

यूपी में मोहम्मद वसीम एक स्थानीय साप्ताहिक अखबार के संपादक है वो बताते हैं कि धरातल पर स्थिति
अलग है,आज एक सिपाही और दरोगा भी पत्रकार का आईडी कार्ड मांग रहे हैं जोकि बेहद अपमानित करने वाला है। सरकारी अफसर पत्रकारों के प्रति दुर्भवना से भरे हुए हैं। एक विशेष  शैली के पत्रकारों को अफसरशाही बाग़लगीर रखती है। जनता की बात लिखने वाले पत्रकार आंखों पसंद नही आ रहे हैं।वसीम बताते हैं “लॉकडाऊन के दौरान खुद उन्हें पुलिस के एक दरोगा ने अपमानित किया और रिपोर्टिंग करने से रोक दिया। उन्होंने उच्च अधिकारियों से शिकायत की तो अनुमति मिली।”
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