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शाहीन बाग प्रोटेस्ट के 90 दिन पूरे, अब ऐसा है हाल

शाहीन बाग प्रोटेस्ट के 90 दिन पूरे, अब ऐसा है हाल

यूसुफ़ अंसारी, Twocircles.net

नई दिल्ली। शाहीन बाग़ में नागरिकता संशोधन कानून, एनपीआर और एनआरसी के ख़िलाफ़ लगातार चल रहे धरना प्रदर्शन ने को 90 दिन पूरे हो चुके हैं। इस दौरान इस प्रोटेस्ट ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। कई बार प्रदर्शन के दौरान गड़बड़ी फैलाने की कोशिश हुई। एक बार गोली चली। एक बार हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने यहां आकर नारेबाज़घ की। कुछ हिंदू संगठनों ने पहली मार्च को ज़ोर जबरदस्ती से इस प्रदर्शन को हटाने का ऐलान किया था लेकिन पुलिस ने उन्हें सख़्ती से रोक दिया। फ़िलहाल शाहीन बाग़ का यह धरना प्रदर्शन जारी है। हालांकि यहां अब भीड़ पहले के मुकाबले थोड़ा कम हो गई है लेकिन नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA, NPR और NRC के ख़िलाफ़ जोश और जुनून पहले की तरह बरक़रार है।


क़रीब 50 मीटर लंबे बने पंडाल के भीतर अब महिलाओं की पहले जैसी भीड़ नहीं दिखाई देती। महीने भर पहले तक जहां यह पंडाल महिलाओं से खचाखच भरा रहता था अब उस तरह की भीड़ या नहीं है। लेकिन अभी भी 700-800 महिलाएं लगातार धरने पर बैठे रहती हैं। 90 दिन पूरे होने के मौक़े पर पंडाल में 90 दिन का एक पोस्टर भी टांग दिया गया है। हालांकि शुक्रवार की रात 10:00 बजे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस रखने का ऐलान किया गया था। कई मीडिया चैनलों ने इसे लाइव दिखाने का इंतजाम भी किया था। लेकिन बगैर कोई कारण बताए यह प्रेस कॉन्फ्रेंस टाल दी गई। इससे मीडिया में शाहीन बाग़ को लेकर छवि और ख़राब हुई है।

 


पंडाल के बाहर भी अब पहले की तरह भीड़ दिखाई नहीं देती। लोगों का आना-जाना बदस्तूर जारी है। कुछ लोगों ने इस प्रदर्शन में शामिल होने को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया है। शाम के वक्त लोग अपने जरूरी काम निपटा कर एक,  2 या 3 घंटे इस प्रदर्शन में ज़रूर शामिल होते हैं। कुछ लोग बच्चों को भी साथ ले आते हैं। रोज़ाना दो से 3 घंटे इस प्रदर्शन में शामिल होने वाले शाहीन बाग़ के मोहम्मद अफ़सर कहते हैं कि लगातार तीन महीने तक इस प्रदर्शन को जारी रखना एक बड़ी कामयाबी है। पिछले 3 महीने से वह ख़द यहां लगातार आ रहे हैं। इसी तरह कई और लोग हैं जो पूरे परिवार के साथ यहां हाज़िरी लगाने ज़रूर आते हैं। उनका भी कहना यही है कि हां आए बिना चैन नहीं पड़ता।

 

कालिंदी कुंज से सरिता विहार की तरफ जाने वाली इस सड़क के दाहिनी तरफ़ महिलाओं ने अपने प्रदर्शन के लिए पंडाल लगाया हुआ है। वहींं बाई तरफ़ का हिस्सा सामाजिक गतिविधियों के लिए छोोड़ हुआ है। सड़क किनारे बस बने बस स्टॉप को एक लाइब्रेरी में तब्दील कर दिया गया है। यहां बहुत सारी किताबें रखी हुई हैंं। ज्यादातर किताबे लोगों ने दान की हैं। यहां लोग आते हैं और किताबे देखते हैैं, पढ़ते भी हैं। इस अस्थाई लाइब्रेरी में एक बहुत ही ख़ूबसूरत पोस्टर लगा हुआ है। इसमेें एक बच्ची एक पुलिसकर्मी को संविधान पढ़ा रही है।




सड़क के इसी हिस्से में इंडिया गेट का मॉडल बनाया गया है। सफेद रंग के बने इस इंडिया गेट के मॉडल के बीचो-बीच अमर जवान ज्योति जलाई गई है। इंडिया गेट के चारों तरफ़ उन लोगों के नाम लिख दिए गए हैं जो जो नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करते हुए पुलिस की गोली से शहीद हुए हैं। प्रदर्शन में आने वाले लोगों के लिए यह आकर्षण का केंद्र है लोग यहां जमकर लोग यहां खूब फोटो खिंचवाते हैं और सेल्फी लेते हैं।


इंडिया गेट से थोड़ा आगे बढ़ने पर डिटेंशन सेंटर का मॉडल नज़र आता है। डिटेंशन सेंटर के अंदर क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह, महात्मा गांधी  और संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर की तस्वीर लगी हुई है। यह भी लोगों के आकर्षण का केंद्र है। लोग डिटेंशन सेंटर में खड़े होकर फोटो खिंचवाते हैं और सेल्फी भी लेते है। डिटेंशन सेंटर में खड़े होकर फोटो खिंचवाने वाले एक शख्स से जब पूछा गया कि वह ऐसा क्यों कर रहा है तो उसने रोंगटे खड़े करने वाला जवाब दिया। वह बोला, "मैं असम में डिटेंशन सेंटर में बंद रखे गए लोगों के दर्द को महसूस करने की कोशिश कर रहा हूं। आगे चलकर मुझ जैसे न जाने कितने लोगों को इसी दर्द से गुजरना पड़ सकता है।"

 

थोड़ा आगे चलने पर सड़क के बीच भारत का एक बड़ा सा नक्शा लगाया गया है। इसके दोनों तरफ लिखा हुआ है, 'हम भारत के लोग CAA, NPR और  NRC को रिजेक्ट करते हैं।" यह नक्शा काफी पहले लगाया गया था। इसका रंग फीका पड़ गया है। इसलिए दोबारा से इसकी रंगाई-पुताई और मरम्मत का काम जारी है। यह बात का संकेत है कि यह प्रदर्शन अभी हाल फिलहाल में ख़त्म होने वाला नहीं है।



 

सड़क को पार करने के लिए बनाए गए पैदल पार पथ के ऊपर नागरिकता संशोधन कानून, एनपीआर और एनआरसी के विरोध में अलग-अलग तरह के पोस्टर टंगे हैं। यहां महात्मा गांधी, सरदार भगत सिंह और संविधान निर्माता बाबा भीमराव अंबेडकर जैसी शख्सियतों के फोटो के साथ नारे लिखे हुए हैं। 

 

इसी पुल के नीचे एक सड़क के डिवाइडर की दीवार पर एक फोटो गैलरी बनाई गई है। इस फोटो गैलरी में नागरिकता संशोधन उनके खिलाफ शुरू हुए आंदोलन की पहले दिन से लेकर अब तक की वह तमाम तस्वीरें लगाई गई है जो पुलिस बर्बरता की कहानी कहती हैंं। इस गैलरी में कुछ फोटो के नीचे लिखा है "इन्हें याद रखा जाएगा।"

 

मोदी सरकार ने शाहीन बाग़ के प्रदर्शन को ख़त्म करने के लिए कई तरह की कोशिश की लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली। कुछ लोगों ने दिल्ली हाई कोर्ट में यह सड़क खाली कराने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। हाईकोर्ट ने

महिलाओं को वहां से हटाने का निर्देश देने से साफ इनकार कर दिया था।  साक्षी पुलिस को निर्देश दिया था कि वह क़ानून व्यवस्था की स्थिति बिगाड़े बगैर रास्ता खाली कराने के लिए उचित कदम उठा सकती है। पुलिस ने प्रदर्शनकारी महिलाओं से कहीं और शिफ्ट होने की गुजारिश की थी लेकिन महिलाओं ने दिल्ली पुलिस की यह पेशकश ठुकरा दी थी।


बाद में यही याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी यह कहते हुए महिलाओं को वहां से हटने का निर्देश देने से साफ इनकार कर दिया कि किसी भी क़ानून का विरोध करना नागरिकों का अधिकार है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दो वरिष्ठ वकीलों को प्रदर्शनकारी महिलाओं से बात करके रास्ता खाली कराने की कोशिश करने को ज़रूर कहा। मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है दिल्ली में हुई हिंसा के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई महीने भर के लिए टाल दी थी। इतना तो तय है कि सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई तक यह प्रदर्शन बदस्तूर जारी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से तैनात किए गए वरिष्ठ वकीलों संजय हेगडे और साधना रामचंद्रन प्रदर्शनकारी महिलाओं से कई दौर की बातचीत कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला करता है उस फैसले पर इस प्रदर्शन का भविष्य टिका है। फिलहाल तो लोग इस प्रदर्शन को ख़त्म करने के मूड में नहीं दिखते हैं।