क्या है समाजवादी पार्टी के चंदे की सच्चाई?

अफ़रोज़ आलम साहिल, TwoCircles.net

उत्तर प्रदेश में इन दिनों चुनावों का मौसम है. सत्ता की इस लड़ाई पर देशभर की नज़र है. राजनीति हो रही है, मुद्दे उछाले जा रहे हैं, उपलब्धियाँ गिनाई जा रही हैं, वोट मांगे जा रहे हैं. पर इन सब के बीच राजनीतिक पार्टियों की ही पारदर्शिता गायब है. और बात जब राजनीतिक दल की फंडिंग या इनको मिलने वाली चंदे पर आती है तो हमाम में सभी नंगे नज़र आते हैं.

मायावती के बहाने देश में राजनीतिक दलों के चंदों की बात हो रही है, लेकिन सच यह है कि इस मामले में सभी पार्टियां एक जैसी ही हैं. कोई भी पार्टी खुद को मिलने वाले चंदे का सही सच नहीं बताती हैं और जो जानकारियां वे चुनाव आयोग को पेश करती हैं, वो सभी जानकारियाँ अपने आप में ही झूठ का पर्दाफ़ाश करने के लिए काफी होती हैं.

उत्तर प्रदेश में मायावती की पार्टी बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) ने अपने चंदे की जानकारी पिछले 12 सालों में कभी भी नहीं दी है, लेकिन इसके विपरित मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपने चंदों की जानकारी चुनाव आयोग को देने की कोशिश ज़रूर की है. लेकिन सपा को मिलने वाली चंदे की रक़म की मिक़दार इतनी कम है कि आप सबको हैरान देने के लिए काफी है.

चुनाव आयोग की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी बताती है कि साल 2015-16 में सपा को सिर्फ़ एक लाख रूपये का चंदा मिला है. जबकि साल 2014-15 में चंदे की रक़म 1.95 करोड़ रही. ये रक़म सिर्फ़ चार लोगों ने मिलकर दी है. इसमें भी एक करोड़ रूपये सिर्फ़ सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट से आया है.

साल 2013-14 में इसी सपा को सिर्फ़ 6 लोगों ने मिलकर 1.69 करोड़ का चंदा दिया है. इसमें भी 1.5 करोड़ का चंदा सिर्फ़ कोलकाता की श्रीमती अदिती सेन ने अकेले दिए हैं.

साल 2012-13 में 2.24 करोड़ का चंदा मिला है. इसे अकेले कोलकाता की अदिती सेन ने दिए हैं. साल 2011-12 में 3.57 करोड़ रूपये मिले हैं. इसमें एक करोड़ जनरल इलेक्टोरल ट्रस्ट और 1.81 करोड़ का चंदा कोलकाता से आया है.

बताते चलें कि चंदे की यह जानकारी उन दानदाताओं की है, जिन्होंने पार्टी को 20 हज़ार से अधिक का चंदा दिया है. दरअसल, रिप्रेज़ेंटेशन ऑफ़ पीपुल्स एक्ट (1951) में वर्ष 2003 में एक संशोधन के तहत यह नियम बनाया गया था कि सभी राजनीतिक दलों को धारा 29 (सी) की उपधारा-(1) के तहत फ़ार्म 24(ए) के माध्यम से चुनाव आयोग को यह जानकारी देनी होगी कि उन्हें हर वित्तीय वर्ष के दौरान किन-किन व्यक्तियों और संस्थानों से कुल कितना चंदा मिला. राजनीतिक दलों को इस नियम के तहत 20 हज़ार से ऊपर के चंदों की ही जानकारी देनी होती है.

यहां यह भी बताते चलें कि सपा ने बिहार चुनाव के बाद मार्च 2016 में चुनाव आयोग को दी गई एक जानकारी में बताया है कि पार्टी के पास 12 नवम्बर 2015 तक कैश की शक्ल में 4 करोड़ 37 लाख 58 हज़ार 635 रूपये और बैंक में 539 करोड़ 32 लाख 38 हज़ार 966 रूपये हैं. इस तरह पार्टी के पास कुल रक़म 543 करोड़ 69 लाख 97 हज़ार 602 रूपये हैं.

अब यदि पार्टी के खर्च की बात करें तो इसी समाजवादी ने चुनाव आयोग को बताया है कि पार्टी ने साल 2014-15 में 181.88 करोड़, साल 2013-14 में 159.70 करोड़ और साल 2012-13 में 146.09 करोड़ रूपये खर्च किए हैं.

यहां यह भी बताते चलें कि चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार से सिफ़ारिश की थी कि ऑडिट के लिए एक संयुक्त जांच दल बनाया जाए जो राजनीतिक दलों के पैसे की ऑडिट करे. अगर ऐसा होता तो राजनीतिक दलों के खर्च पर नज़र रख पाना और उसकी जाँच कर पाना संभव हो पाता. इससे पार्टियों की पारदर्शिता तो तय होती ही, साथ ही राजनीतिक दलों के खर्च और उसके तरीक़े पर भी नियंत्रण क़ायम होता. पर केंद्र सरकार ने इस सिफ़ारिश को फिलहाल ठंडे बस्ते में ही रखा है.

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