लॉकडाऊन में इस्लामिक कैसे बन गए निकाह के तौर-तरीक़े !

आस मुहम्मद कैफ, TwoCircles.net

मेरठ। 29 मई को मेरठ के इक़बालनगर इलाके में दोपहर बाद मुज़फ़्फ़रनगर से एक बड़े ख़ा नदान की बारात पहुंची। बारात में परिवार के सिर्फ ज़िम्मेदार लोग ही शामिल थे।


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दूल्हे के पहुंचने के तुरंत बाद पास की ही मोती मस्जिद के इमाम शरीफ़ तशरीफ़ ले आए और निकाह पढ़ाया जाने लगा। दोनो पक्ष के 20 लोग निकाह में शामिल हुए। मेहर तुरंत अदा किए गए। कोई शोर -शराबा नही हुआ। कोई दान दहेज़ नहींं। दूल्हे पक्ष के लोगोंं को खाना खिलाया गया और उसके बाद बेहद ही सादगी से रुख़सती कर दी गई। एक उच्च शिक्षित युवक और युवती की यह शादी कम से कम मेरठ के लिए अद्भुत थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ख़ासकर मेरठ में इस तरह के आयोजन बेहद धूम धड़ाके के साथ होते हैं। इससे कई गुना भीड़ सगाई में जुटती है। रस्मो-रिवाज, आतिश बाज़ी, शोर शराबा और गाना बजाना आम शग़ल है। हालात यह है यहां मस्जिदों से इमाम साहब अक़्सर यह सब छोड़ देने के लिए अपील करते रहे हैं। कुछ ने नाराज़ होकर निकाह पढ़ाने ही बंद कर दिए और कइयों ने उन शादियों में भी जाना बंद कर दिया जिनमे बैंड बाजे बजते थे।

इस शादी में अपने भाई इमरान ख़ान की बारात लेकर पहुंचे आफ़ताब आलम ने बताया कि ‘अरमान तो बहुत थे धूमधाम से शादी के मगर लॉकडाऊन ने सब ध्वस्त कर दिए।’ मगर इमरान के मुताबिक यह सब कुछ उनके मन मुताबिक हुआ वो हमेशा से ऐसा ही सादगी से सब कुछ चाहते थे।

एक ग़ैर सरकारी आंकड़े के मुताबिक 18 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में 6 करोड़ मुसलमान रहते हैं। इनमें इस लॉकडाऊन के दौरान 60 हजार निक़ाह हो चुके हैं। इनमें लगभग सभी के लिए विशेष अनुमति ली गई। प्रशासन ने अधिकतर जगह 15 लोगोंं को समस्त सावधानियांं बरतते हुए शामिल होने की अनुमति दी। अलग राज्य के लिए 8 लोगोंं को बारात ले जाने की अनुमति दी गई।

आंकड़ों के मुताबिक़ सबसे ज्यादा निकाह मुरादाबाद, बिजनौर और सहारनपुर में हुए। मेरठ में कोरोना के क़हर के बीच भी एक हज़ार से ज्यादा निकाह हो गए। यह अवधि लॉकडाऊन की है जिसमे पहले महीने यह संख्या नगण्य थी। मगर उसके बाद बाढ़ सी आ गई। आफ़ताब आलम बताते हैं कि इससे शादियों में होने वाले ख़र्चे पूरी तरह प्रभावित हो गए हैं। फिजूलख़र्ची की कोई जगह नहींं बची। शादियां एक बड़ा इंवेट बन गई थी। उनमें इस्लामिक अंश सिर्फ निक़ाह था। बाक़ी सब कुछ फ़िल्मी था। रस्मों-रिवाज की जकड़न थी।

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अल्लाह ने अपने आप निज़ाम इस्लामिक बना दिया। अब जिन तारीख़ों में शादियां तय है वो हो रहींं हैंं। तारीख़ आगे बढ़ जा रही है तो बेताबी बढ़ रही है इसलिए 8 लोगोंं के साथ ही निकाह हो रहा है। पिछले कुछ सालों में मुसलमानों का करोड़ो रूपये शादी के दौरान हुई फ़िज़ूलख़र्ची में बर्बाद हुआ है। अब अपने आप सब कुछ ठीक हो गया।

मेरठ के प्रभावशाली समझे जाने मुस्लिम धर्मगुरु क़ारी शफीक़ुर्रहमान कहते हैं कि उन्होंने बाक़ायदा एक अभियान चलाया जिसमें दहेज़ को सजा कर रखने, बारात को गाजे-बाजे के साथ गलियों से लेकर निकलने जैसी ग़ैर इस्लामिक बातों के ख़िलाफ़ हिदायत दी गई और कुछ आलिमोंं ने फ़तवा भी जारी कर दिया गया। मगर इसका लोगोंं पर बहुत अधिक असर नही पड़ा। अब वो ख़ुद ही सुधर गए हैं।अल्लाह अपने आप अपने तरीक़े से सुन्नती निज़ाम पर ले आया है। उसने ऐसे ही असबाब बना दिये है।

बता दें कि देशभर में 25 मार्च से कोरोना संकट के चलते लॉकडाऊन किया गया। इसमें आम जनता के बाहर निकलने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई। सभी शादियां रदद् कर दी गई। हालांकि विशेष परिस्तिथियों में इनकी अनुमति दी गई मगर हिंदू रीतिरिवाजों से होने वाली शादियों में बड़ी संख्या में शादियां रद्द कर दी गई और मुसलमानों में इन्हें आसान निकाह में बदल लिया गया।

इसमे सबसे सुखद अहसास ग़रीब परिवार की लड़कियों के लिए भी रहा। जिनके रिश्तेदारों ने ख़ौफ-ए-इलाही में बिना दहेज़ के ही निक़ाह कर लिया। ऐसे में ग़रीब मज़दूर परिवार कर्ज़ के बोझ तले दबने बच गए। बुढ़ाना के मोहल्ला मंसूरियान की फ़रीदा बताती है कि उसकी सास और ससुर दोनों का इंतेक़ाल हो चुका है। उसकी ननद की शादी करनी थी। उसका शौहर मज़दूरी करता है।अब दो महीने से तो खाने की भी दिक़्क़त थी। शादी के लिए क़र्ज़ कहाँ से मिलता! अब ‘मामा’ ने बताया कि सादा निकाह की बात कही तो बहुत हिम्मत बढ़ी। लड़का पानीपत में मज़दूरी करता है। हमारे पास कुछ नहीं है, हम तो क़र्ज़ लेकर ही शादी करते। अब क़र्ज़ की ज़रूरत नहींं पड़ेगी।

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मुज़फ़्फ़रनगर के नईम चौधरी कई साल से अपनी शादी के लिए पैसे इकट्ठे कर रहे थे। उनके मित्र सन्नी ख़ान बताते हैं कि नईम अभूतपूर्व शादी करना चाहता था जैसी उसके खानदान और रिश्तेदारों में भी कभी न हुई हों, मगर 28 मई को 5 आदमी के साथ जाकर निकाह कर आया। अब जो पैसे बच गए उनका कारोबार करेगा। सन्नी कहते हैं, ’12 साल से गहरा दोस्त था, हर वक़्त साथ रहता था।बेंड बाजा और पता नही क्या क्या ख़्वाब बुनता था, अब मुझे भी लेकर नहींं गया। एक कार में ही बारात चली गई। चलो अच्छा है लोग किसी तरह तो इस्लामिक तरीके पर आये।’

हालांकि इमरान के मामले में ऐसा नही हुआ, उनके नैनीताल में बैठे सिविल जज भाई, डीडीहाट के बैंक मैनेजर दोस्त और झारखंड में तैनात सीआरपीएफ़ के असिस्टेंट कमांडेंट मित्र ने सोशल इंटरनेट सनसनी के माध्यम से निकाह में शिरकत कर ली।

 

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