भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध क्या मुमकिन है?

अनिल मिश्र

15 अगस्त को लाल क़िले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी के बलोचिस्तान (बलूचिस्तान नहीं, क्योंकि ये शब्द पाकिस्तान हुकूमत प्रयोग करती है और बलोची राष्ट्रीयता के लोग इसे अपना अपमान मानते हैं) गिलगित-बालतिस्तान, पाक नियंत्रित कश्मीर के बयान को कई तरह से व्याख्यायित किया जा रहा है. शेखर गुप्ता जैसे पत्रकार इसे, मोदी की कार्यसंस्कृति के आलोक में, भारत की विदेशनीति में पाकिस्तान के प्रति नाटकीय और मूलभूत रणनीतिक बदलाव या “ड्रामैटिक एंड फ़ंडामेंटल स्ट्रैटेज़िक शिफ़्ट” कह रहे हैं. भानुप्रताप मेहता ने इस रणनीति का संजीदगी से आकलन करते हुए लिखा है कि आपसी संबंधों और ख़ासतौर से कूटनीति में ऐसी खुली घोषणाएं दुस्साहसी साबित होती हैं.


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इसमें कोई दो राय नहीं कि स्वतंत्रता दिवस जैसे मौक़े की नज़ाक़त के लिहाज़ से यह घोषणा एक घरेलू जनमत का निर्माण और दबाव बनाती ही है. साथ ही, मीडिया में क्या और कैसी बहस होगी इसका पब्लिक एजेंडा भी तय करती हैं. हालांकि, कुछ उबलते दिमाग़ों की ख़ुराफ़ातों से यह किसी राष्ट्र को युद्ध की लपटों में भी झोंक सकती है. जैसा कि कथित राष्ट्रवाद के प्रचारक चैनलों के एंकरों और उनके पैनल में शामिल कुछ रिटायर्ड सैन्य अधिकारी उत्तेजना और उन्माद परोसते दिखाते रहते हैं. अगर सेना और रक्षा प्रतिष्ठानों में हमलावर तत्वों यानी हॉकिश लोगों का दबदबा हो जाए तो इसके ख़तरे कई बार वास्तविक हो जाते हैं.

पूर्व गृह और वित्तमंत्री पी चिदंबरम इसे “गेमप्लान, गैम्बित या गैम्बल?” जैसी श्रेणियों में विभाजित करते हुए आगाह करते हैं कि पड़ोसी देश के आतंरिक मामलों में दख़लंदाज़ी करने की मंशा के खुल्लमखुल्ला ऐलान से पाकिस्तान को फ़ायदा होगा. लोकप्रिय साहित्य में गैम्बित का सामान्य आशय एक ऐसे काल्पनिक सुपरहीरो से होता है जिसका असली नाम, पहचान और कार्य-प्रणाली सब नामालूम होता है. और यह बेनामी तरीक़े से वार करता है.

इस बीच जस्टिस (रि.) मार्कण्डेय काटजू इस घोषणा से ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही लहालोट हो गए हैं. वे इस विषय पर कुतर्क और सनक की ज़बान को मज़बूत कर रहे हैं. जस्टिस काटजू की यह परिकल्पना कि पाकिस्तान एक कृत्रिम रचना है (वे इसे देश मानने से भी इंकार करते हैं) और इसे भारत के साथ एक सच्ची धर्मनिरपेक्ष, आधुनिक राज्य-प्रणाली के अंतर्गत समाहित होना होगा को मानो एक नया पंख लग गया हो. बलोचिस्तान, सिंध और NWFP आदि इलाक़ों में वे भारत सरकार प्रायोजित हथियार आपूर्ति, प्रशिक्षण और कूटनीतिक-राजनीतिक समर्थन की हिमायत कर रहे हैं. जस्टिस काटजू (अनजाने में या कि सुचिंतित तौर पर? कहना मुश्किल है) या अति-राष्ट्रवादी, विचार-सारणी की अनुगूंज तब बन जाते हैं जब वे पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों में इस तरह के प्रत्यक्ष या परोक्ष सैन्य हस्तक्षेप को भारत के कश्मीर में पाकिस्तान की प्रछन्न सैन्य महत्वाकांक्षाओं का समुचित मुंह-तोड़ जवाब मान बैठते हैं.

कश्मीर घाटी में पिछले डेढ़ महीने से जिस पैमाने पर अत्याचारों और मानवीय त्रासदियों की ख़बरें आ रही हैं, वे कई टीवी चैनलों और सोशल मीडिया में उपस्थित संगठित उग्रवादी राष्ट्रवाद के बर्बर नुमाइंदों तथा नफ़रत और उन्माद के कारोबारियों के लिए अपनी टुच्ची, लेकिन क्रूर देशभक्ति के वर्चस्व के फंदे की जकड़ और पकड़ को हरसंभव मज़बूत करने का उपक्रम हैं. वे इन परिस्थितियों का मनचाहा अनुवाद ये कर रहे हैं कि पाकिस्तानी हुकूमत के सैन्य प्रतिष्ठानों को, जो पाकिस्तानी राष्ट्रवाद के आख्यान में कश्मीर पर अपना नैतिक हक़ जताते हैं, को सबक़ सिखाने का उचित मौक़ा है. इस पृष्ठभूमि में, अतिवादी राष्ट्रवाद के रणनीतिकार यह द्वैध सायास तौर पर नज़रंदाज़ कर रहे हैं कि बलोचिस्तान के लोगों के लिए वे जिस आज़ादी की हिमायत करने जा रहे हैं, उसके सिद्धांत किसी भी उत्पीड़ित उप-राष्ट्रीयता के लिए निःशर्त वैध हैं. ऐतिहासिक तौर पर उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के आत्म-निर्णय का अधिकार एक मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार है और सैन्य तौर-तरीक़ों से इस अधिकार को एक लंबे, अंतहीन समय तक के लिए अपदस्थ नहीं किया जा सकता.

अतिवादी राष्ट्रवाद के रणनीतिकारों की पाठ्य पुस्तक में यह भी नहीं है कि वे इस अंतर्द्वंद का क्या संतोषजनक जवाब देंगे कि एक तरफ़ तो उनकी महत्वाकांक्षा ये है कि भारत को वैश्विक राजनीति में, अर्थव्यवस्था और विशाल बाज़ार की सम्भावनाओं के आधार पर, एक निर्णायक हैसियत और प्रतिष्ठा मिले. जैसे, संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता और परमाणु आपूर्ति समूह की सदस्यता वग़ैरह. वहीं, दूसरी तरफ़ वे दक्षिण एशिया के साझेपन को बढ़ाने और मज़बूत करने के बजाय पड़ोसी देश से द्विपक्षीय सैन्य टकराव का संकेत दे रहे हैं. जैसे, दक्षेस मंच में भारत-पाक के परंपरागत द्विपक्षीय उलझनों को गतिरोध को मुख्य बिंदु बनाना. इन निराधार प्रतिस्पर्धात्मक हरकतों से अमेरिका की ‘बिग-ब्रदर’ हुकूमत को क्या संदेश हासिल होगा? जबकि, उसके सैन्य हित भी परस्पर विरोधाभासी हैं. एक तरफ़, अमेरिकी हुकूमत को भू-रणनीतिक कारणों, अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सैन्य दादागिरी के विस्फोटक परिणामों से निजात पाने के लिए और चीन को ‘चेक-बैलेन्स’ करने के इरादे से पाकिस्तान को अपने अनुकूल रखना है, डॉलर और हथियारों की आपूर्ति करनी है और दूसरी तरफ़ उसकी नज़र भारत की आबादी और विशाल बाजार पर भी है.

भारतीय हुकूमत का हालिया राजनीतिक नेतृत्व यद्यपि अमेरिकी हुकूमत से गलबहियाँ करने को उत्कट रूप से इच्छुक है. लेकिन, अमेरिकी विदेश नीति व्यापक सामरिक हितों के लिए सिर्फ़ द्विपक्षीय संबंधों पर ही नहीं टिकी रहती है. अमेरिका की नज़र सिर्फ़ भारत पर ही नहीं, समूचे दक्षिण एशिया पर है. हालांकि, भारत-अमेरिका संबंधों में काफ़ी निकटता आई है, लेकिन वैश्विक मंच पर अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान भारत को दक्षिण एशिया के भूगोल में एक क्षेत्रीय थानेदार जैसी भूमिका में ही देखता है. इससे ज़्यादा अमेरिका ये छूट देने को तैयार है कि इस कड़ी में भारत के अपने कुछ क्षेत्रीय हित हो सकते हैं. लेकिन इन हितों को अमेरिका कभी सफल नहीं होने दे सकता है. इसकी सबसे बढ़िया मिसाल ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन है. जिसे शांति पाइपलाइन भी कहा गया था. यह परियोजना भारत के अपने क्षेत्रीय हितों के लिहाज़ से काफ़ी अहम थी. लेकिन, अमेरिका ने इस मामले में पेंच फंसाया और 2009 में परमाणु करार के बाद भारत ने इस पाइपलाइन परियोजना से हाथ खींच लिए.

अमेरिका ने दक्षिण एशिया में अपने हितों के अनुकूल भारत और पाकिस्तान को “बड़ी बहू-छोटी बहू” का दर्ज़ा दिया हुआ है. जिन्हें वह वक़्त पड़ने पर दुत्कारता भी है और पुचकारता भी है. अमेरिका की हथियार लॉबी के सारे फ़ायदे भारत-पाकिस्तान के टकराव के बढ़ने पर ही टिके हुए हैं. लेकिन, अर्थव्यवस्था के व्यापक मानदंडों की कसौटी पर देखें तो भारत-पाकिस्तान के बीच खुली, लंबी और औपचारिक लड़ाई नामुमकिन है. पाकिस्तानी सेना को अब भारतीय फ़ौज़ से टकराने में कोई रणनीतिक, सामरिक या राजनीतिक फ़ायदा नहीं है. कश्मीर, पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान के एक प्रभावी हिस्से के लिए, एक रस्साकशी वाला मुद्दा है. लेकिन, कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तानी सेना वैश्विक भू-राजनीति के आलोक में किसी तरह की बचकानी हरकत नहीं कर सकती है.

भारत में सत्ताधारी दल के अधिकतर नेता कश्मीर के हालिया माहौल के लिए जिस तरह पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं, यह दो मुख्य प्रवृत्तियों को ज़ाहिर करता है. पहला कि दिल्ली और कश्मीरियों की भावनाओं के बीच, श्रीनगर के आश्वासनों के बावजूद, भारी खाई बन चुकी है और गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के अफ़सरान मामले को सुलझाने के लिए कोई रचनात्मक पहलक़दमी उठाने की स्थिति में नहीं हैं. सत्ताधारी भाजपा के अपने वैचारिक दुराग्रह और इसके शीर्ष नेतृत्व के अहंकारी हठी आचरण और उनमें कल्पनाशीलता की दरिद्रता इसकी मुख्य वजहें हैं. दूसरा, पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति जिस कलह की ओर बढ़ रही थी उसमें कश्मीर में ताज़ा घटनाओं ने एक जीवनदान दिया है. कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ वग़ैरह में उठाने की पाकिस्तान की सारी कूटनीतिक क़वायद इसलिए है कि भारतीय हुकूमत ऐसे में भी उसे अगर इतनी क्रेडिट दे रही है तो कश्मीरियों के प्रति हमदर्दी दिखाने के लिए वे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कुछ तो करते हुए दिखाई दें.

आख़िर में, मीडिया के द्वारा उग्रवादी राष्ट्रवाद के विषैले प्रचारों की चर्चा करना यहाँ ज़रूरी होगा. पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट ने फ़ेसबुक पर लिखा है कि उन्हें पता नहीं क्यों ये अहसास हो रहा है कि भारतीय सरकार कश्मीर मसले को एक परिपाटी बनाते हुए सैन्य तौर पर कोई दुस्साहसी क़दम उठाने जा रही है. इस अहसास को निर्मित करने में कथित राष्ट्रवादी पत्रकारिता के दावेदार एंकर्स का एकमात्र योगदान है. टीवी पत्रकारिता, सत्ता से मुश्किल सवाल करने के अपने पेशेगत उत्तरदायित्व के बतौर, अपनी प्रासंगिकता पहले ही खो चुका है. तकनीकी विकास के बावजूद अधिकतर समाचार चैनलों के पास दिखाने और बताने के लिए ख़बरों का अकाल है. भारत की अधिकतर आबादी टीवी समाचार से ग़ायब है. डिज़िटल सोशल मीडिया की प्रवृत्तियों से टीवी न्यूज़ के प्राइम टाइम का विषय तय किया जा रहा है. और अधिकतर सोशल मीडिया भीड़तंत्र की मानसिकता से लबरेज़ है. टीवी के परदे पर युद्ध का ऐलान काफ़ी रहस्य, रोमांच और सिहरन पैदा करने वाला होता है. युद्ध का माहौल वग़ैरह निर्मित करने से मीडिया को अचानक से काफ़ी मुनाफ़ा कमाने की उम्मीद होती है. सुस्त धंधे में नई जान फूंकी जाती है.

जनमत को ख़ून का प्यासा बनाने से हुक्मरानों का फ़ायदा ये होता है कि उन्हें रोज़ी-रोटी, किसानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, इंसानी गरिमा की बहाली आदि की व्यवस्था पर मुश्किल सवालों का सामना नहीं करना पड़ता. लेकिन, कोई भी राजनेता ये अकाट्य सत्य समझता है कि पृथ्वी को कई बार नष्ट करने की क्षमता रखने वाले परमाणु हथियारों की होड़ के बाद किसी युद्ध का ऐलान करना आसान होता है लेकिन इस युद्ध को सीमित रख पाना आजकल किसी के बस में नहीं बचा है. इसलिए, घरेलू राजनीति की बाध्यताओं के चलते, लोगों को बरगलाने के लिए भले कुछ उत्तेजक बयान दे दिए जाएं, टीवी न्यूज़ चैनलों की 24´7 अंध-राष्ट्रभक्ति को एक असलियत के युद्ध से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता.

[डॉ. अनिल मिश्र राजस्थान विवि, जयपुर में मीडिया और पत्रकारिता में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. उनसे [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.]

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