पहले तो हमारी सोच का दायरा इतना छोटा नहीं था…

तरन्नुम सिद्दीक़ी, TwoCircles.net के लिए


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भारत के तमाम नागरिकों को भारतीय संविधान के तहत यह अधिकार हासिल है कि वो जिस धर्म को चाहे, उसके नियमों का पालन करे या फिर कोई दूसरा धर्म चुनने की आज़ादी भी हम भारतीयों को हासिल है.

इसके साथ ही ‘द स्पेशल मैरेज एक्ट, 1954’ के तहत कोई भी बालिग़ हिन्दुस्तानी जिससे चाहे शादी कर सकता है. इसमें ये ज़रूरी नहीं है कि वो उस मज़हब का पालन करे. इसमें दो अलग मज़हब के लोग भी एक साथ शादी कर सकते हैं और उनकी शादी क़ानूनी रूप से सही मानी जाएगी.

मगर जब हमारे सामने हादिया जैसे मामले आते हैं तो हमें लगता है कि संविधान द्वारा मिले हमारे मूलभूत अधिकारों को हम से छिना जा रहा है.

अब अगर हादिया के मामले को सामने रखकर जब मैं 10 साल पीछे जाती हूं और अपने उन दिनों को याद करती हूं तो मुझे लगता है कि उस वक़्त प्यार करने वालों के लिए समाज का दायरा इतना छोटा नहीं था.

मैं यहां अपने कॉलेज के दिनों की दो क़िस्से रखना चाहती हूं. मेरी एक साथी जो कि पंडित बिरादरी की थी. उसने एक अनुसूचित जनजाति के लड़के को पसंद किया. घर वाले शादी के लिए राज़ी नहीं थे. बावजूद इसके हम तमाम साथियों ने मिलकर, जिसमें पंडित जाति के कुछ लड़के-लड़कियां भी शामिल थे, उनकी शादी एक आर्य समाज मंदिर में कराई. फिर कोर्ट में उन दोनों की शादी हुई.

खुशी की बात यह है कि आज वह दोनों एक खुशगवार ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं. और जात-पात आज तक उनकी शादीशुदा ज़िन्दगी पर हावी नहीं हुई है.

दुसरा क़िस्सा मेरे साथी के एक दोस्त जो कि हिन्दू थे और एक मुस्लिम लड़की को पसंद करते थे. वहां भी साथ के मुस्लिम और दूसरे मज़हब के लड़के-लड़कियों ने उन दोनों की स्पेशल मैरेज एक्ट के तहत शादी कराई.

यहां भी मेरे दोस्तों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा कि कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान. बल्कि यहां सब एक प्यार करने वालों की मदद कर रहे थे और जिसमें कामयाबी भी मिली. क़ानून ने भी पूरा साथ दिया. आज यह लोग भी एक खुशगवार ज़िन्दगी जी रहे हैं.

मगर आज जब हम हादिया जैसे मसलों को देखते हैं तो खुद को हम अपनी सोच में बहुत पीछे पाते हैं.

अगर यह माना जाए कि समाज एक ‘एटम’ है और इसको जोड़े रखने का काम उनकी सोच यानी ‘न्यूक्लियस’ करता है. अब अगर यही ‘न्यूक्लियस’ तोड़ने का काम करे तो समाज एक ‘एटम बम’ का रूप ले लगा और समाज में जो प्यार- मुहब्बत और रिश्ते हैं, वह ‘एटम बम’ की तरह ब्लास्ट कर जाएगा और चारों तरफ़ ये रिश्ते बिखर जाएंगे.

इसलिए हमारी सियासत जो कि ‘न्यूक्लियस’ की तरह काम करती है. इसका काम लोगों को जोड़ने का होना चाहिए न कि तोड़ने का. इसलिए हमें ‘सामाजिक एटम बम’ को फटने से रोकना होगा. नहीं तो हमारा समाज बिखर जाएगा. जो समाज एक बार बिखर गया, फिर उसको समेटना बहुत मुश्किल है. इसलिए हमें अपनी सोच का दायरा बढ़ाना होगा, तभी समाज एक खुशनुमा रंग पा सकेगा.

(लेखिका जामिया मिल्लिया इस्लामिया के सेन्टर फॉर वूमेन स्टडीज़ में कार्यरत हैं.)

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