‘शपथ ग्रहण समारोह के अंत में ‘‘भारत माता की जय’’ और ‘‘जय श्री राम’’ का नारा संविधान की सेक्यूलर भावना के विपरीत है’

TwoCircles.net News Desk

नई दिल्ली : ‘आज हमारे संविधान की आत्मा एवं व्यवहार, दोनों में उसके अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो गया है. भारत के राष्ट्रपति के रूप में प्रणव मुखर्जी के 24 जुलाई के राष्ट्र के नाम उनके आख़िरी सम्बोधन में भी इन ख़तरों की गूंज सुनाई देती है, जिसमें उन्होंने ‘बहुलतावाद’ तथा ‘सहिष्णुता’ पर ज़ोर दिया है. इन शब्दों का चयन आज के परिपेक्ष्य में बहुत महत्वपूर्ण है, जब अल्पसंख्यकों तथा दलितों की गौ-रक्षा तथा अन्य मामले को लेकर भीड़ द्वारा हत्या की जा रही है.’


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यह बातें आज ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के महासचिव डॉ. मो. मन्ज़ूर आलम ने कहा. वो आगामी 30 जुलाई को ताल-कटोरा इनडोर स्टेडियम में ‘संविधान बचाओ —देश बनाओ’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन से सम्बन्धित तैयारी बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे. बताते चलें कि ये राष्ट्रीय सम्मेलन ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल, ट्रुथ सीकर्स इन्टरनेशनल और अमीर खुसरो चैरिटेबल ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है.

आगे उन्होंने कहा कि, हम प्रणव मुखर्जी से पूरी तरह सहमत हैं कि भारत की आत्मा बहुलतावाद एवं सहिष्णुता में बसती है. ये हमारे संविधान की बुनियादें हैं. अगर सिद्धांत तथा व्यवहार में हम इन मूल्यों से हटते हैं तो यह वास्तव में संविधान की आत्मा के लिए ख़तरा होगा. यह संविधान की भावना ही है, जिस पर हमें गर्व है, जबकि दूसरे लोगों को ईष्र्या है.

उन्होंने कहा कि, मुझे कैण्टरबरी के 104वें आर्क बिशप रोआन विलियम्स के वे शब्द याद आते हैं जो उन्होंने 2010 में अपने भारत भ्रमण के दौरान कहे थे. उन्होंने कहा था: ‘‘भारत लगातार उस सेक्यूलरवाद को परिभाषित करने की कोशिश करता रहा है, जो तमाम धार्मिक समुदायों के ख़िलाफ़ नहीं है और उसका बहुलतावाद यूरोपीय देशों के लिए आदर्श बन सकता है जो इस समय धार्मिक शासन की कोशिशों तथा धर्म का पूरी तरह निजीकरण करने के प्रयासों में लगे हुए हैं.’’

डॉ. मन्ज़ूर आलम ने कहा कि, भारत के 14वें राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द, जिन्होंने 25 जुलाई को मुखर्जी का स्थान लिया है, ने भी देश की सफलता के लिए बहुलतावाद और ‘अनेकता में एकता’ को उसकी बुनियाद माना है. उन्होंने संविधान की रक्षा करने का भी संकल्प लिया है. लेकिन तमाम लोगों ने शपथ ग्रहण समारोह के अंत में ‘‘भारत माता की जय’’ और ‘‘जय श्री राम’’ के नारे लगाए जाने को संविधान की सेक्यूलर भावना के विपरीत माना है. इसी तरह राष्ट्रपति द्वारा अपने भाषण में राष्ट्रपिता के साथ-साथ भारतीय जन संघ के संस्थापकों का विशेष रूप से उल्लेख किये जाने को भी उसी प्रकाश में देखा गया है. हमें अपने मस्तिष्क में यह बात रखनी चाहिए कि आज लड़ाई भारत के संविधान तथा हमारे राज्य को पीछे ले जाने वाले तरीक़ों के बीच है. आज हमारे सामने न्याय, समानता, भाईचारा, बहुलतावाद, सहिष्णुता तथा आज़ादी को बचाए रखने की चुनौती है, जिसकी गारण्टी संविधान में दी गई है. कुछ ताक़तें उसके इस चरित्र को बदलने पर तुली हुई हैं. संविधान को बचाना आज राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है. इस उद्देश्य के लिए हमें राष्ट्रीय आंदोलन शुरू करना होगा. हमारे संविधान ने हमें ‘‘हम लोग’’ की पहचान भी दी है और यह पहचान तभी बची रहेगी जब हमारा संविधान सुरक्षित है. जो लोग संविधान का चरित्र बदलना चाहते हैं वे अल्पसंख्यकों, दलितों तथा समाज के अन्य तबक़े के लोगों को विकास के लाभ से वंचित रखना चाहते हैं.

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