जेएनयू छात्रसंघ चुनाव : विचारों की लड़ाई के बीच महिला दावेदारी का पेंच

फहमिना हुसैन, TwoCircles.net
 
नई दिल्ली : जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इस बार छात्रसंघ का चुनाव कई लिहाज से बहुत खास होने जा रहा है. जेएनयू छात्रसंघ के लिए इस बार 8 सितंबर को वोट डाले जाएंगे.
 
जेएनयू में इस बार अध्यक्ष पद के लिए सात उम्मीदवार मैदान में हैं. इस बार ये चुनाव इसलिए ख़ास माना जा रहा है क्योंकि छात्रसंघ के चुनाव 2017 में कोई छात्रा ही अध्यक्ष बनेगी. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि सात उम्मीदवारों में से इस बार पांच उम्मीदवार महिलाएं ही हैं. 
 
9 फरवरी, 2016 को हुए एक कार्यक्रम के दौरान ‘देशविरोधी नारे लगाने’ और ‘देशद्रोह’ का आरोप तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार, महासचिव रामा नागा और जेएनयू के ही एक अन्य छात्र उमर खालिद व अनिर्बन भट्टाचार्य समेत कई छात्रों पर लगा. इस घटना के बाद 2016 में हुए छात्रसंघ चुनाव में लेफ्ट पैनल के मोहित पाण्डेय छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए. 
 
2016 के छात्रसंघ चुनाव की दूसरी सबसे खास बात थी ‘बापसा’ का उभार. बापसा यानी बिरसा अम्बेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन. दलित-बहुजन और अम्बेडकरवादी राजनीति को आधार बनाकर पिछले चुनावों में यह बापसा कैंपस की छात्र राजनीति में दूसरी बड़ी ताकत के रूप में उभरा था. 2016 के चुनावों के नतीजों के बारे में यह चर्चा आम हो गयी थी कि यदि कैम्पस में वामपंथी दलों का एक साझा पैनल न बना होता, तो लेफ्ट पार्टियों को बापसा के हाथों नुकसान झेलना पड़ सकता था. 
 
इस बार बापसा से अध्यक्ष पद पर शबाना अली अपनी दावेदारी पेश कर रही हैं. मूलतः बंगाल से ताल्लुक रखने वाली शबाना का बचपन बनारस में बीता है और जेएनयू के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स से पीएचडी कर रही हैं.
 
हमसे बातचीत में शबाना अली ने अपनी पार्टी के मुख्य एजेंडे के विषय में बताया. बकौल शबाना, बापसा के एजेंडे में अल्पसंख्यक के अंक सुनिश्चित करना, सच्चर समिति की सिफारिशें लागू करना, प्राथमिकता के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिला, धार्मिक और यौन अल्पसंख्यक छात्रों के लिए छात्रावास आवास की सुविधा, फैलोशिप का शीघ्र वितरण, आदि मुद्दे शामिल हैं. 
 
शबाना कहती हैं, ‘समाज में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है. चाहे वो सामाजिक हो या राजनीतिक, उन्होंने हर जगह खुद को साबित किया है. हालांकि इससे पहले जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में कम ही संख्या में छात्राएं अध्यक्ष पद के लिए नामांकित हुई हैं. लेकिन इस बार के छात्रसंघ चुनाव में छात्राएं अध्यक्ष पद के लिए सुनिश्चित की गई हैं. इसे ही महिला सशक्तिकरण कहा जा सकता है, हालांकि इस बार इस मुद्दे को हाथोंहाथ लिया गया है.’ 
 
शबाना कहती हैं कि जातीय हिंसा-उत्पीड़न पर उत्पीड़न की जीत दूसरे पर एक वर्ग की जीत नहीं है, बल्कि यह उत्पीड़न पर मुक्ति की जीत है. इसलिए हमें भौतिक, राजनीतिक और नैतिक हथियारों को गले लगाने की बहुत ज़रुरत है. 
 
जेएनयू में बीती रात हुए प्रेसिडेंशियल डिबेट में शबाना ने अपनी पार्टी के सभी मुद्दों को सभी के सामने रखा है, लेकिन किस पार्टी का पलड़ा कितना भारी है, इस बारे में कहना अभी मुश्किल है. 
 
इस बार चुनाव में सीपीआई के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद डी राजा की बेटी अपराजिता राजा AISF की तरफ अध्यक्ष पद पर चुनाव लड़ रही हैं. अपराजिता जेएनयू में सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज में पीएचडी की स्टूडेंट हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव लड़ चुकी हैं. जेएनयू छात्रसंघ चुनावों में भी वो 2 बार काउंसिलर पद के लिए चुनाव लड़ चुकी हैं.
 
कांग्रेस के छात्र दल भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन की तरफ से अध्यक्ष पद पर वृष्णिका सिंह हैं, वहीं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की ओर से निधि त्रिपाठी अध्यक्ष पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रही हैं. 
 
संगठित लेफ्ट पैनल की तरफ से आइसा की गीता कुमारी अध्यक्ष पर अपनी दावेदारी पेश कर रही हैं. गीता जेएनयू से फ्रेंच भाषा में बीए करने बाद फिलहाल जेएनयू के ही सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज से एमफिल कर रही हैं. वो दो बार स्कूल ऑफ लैंग्वेज से काउंसिलर भी रह चुकी हैं. इसके साथ ही गीता जेएनयू में यौन उत्पीड़न की घटनाओं की जांच करने वाले जीएसकैश के लिए भी चुनाव जीत चुकी हैं.
 
सभी पार्टियों और उम्मीदवारों ने अपने-अपने घोषणापत्र को जारी कर दिया है. साथ ही इस बार के चुनावों में छात्र नजीब और सीटों में कटौती का मुद्दा मुख्य जहां खास है, वहीं हॉस्टल और छात्रों के अन्य मुद्दों के साथ-साथ विचारधारा की लड़ाई सबसे अहम होने वाली है.
 
हाल ही में नरेंद्र मोदी द्वारा जेएनयू की ही छात्रा निर्मला सीतारमण को देश का रक्षामंत्री नियुक्त किए जाने के फैसले को महिला वोटों के एबीवीपी की ओर जुटाने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है. लेकिन यदि लेफ्ट पैनल किसी रूप में कमज़ोर पड़ता है, तो जेएनयू में सीधी लड़ाई एबीवीपी और बापसा के बीच देखने को मिल सकती है.

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