क्या चंद्रशेखर आज़ाद यूपी के अगले चुनाव में मुख्यमंत्री के दावेदार हों सकते है?

आस मोहम्मद कैफ  , TwoCircles.net

सहारनपुर। उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर करवट ले रही है। पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तिकड़ी के सामने अखिलेश यादव और मायावती का जलवा फीका पड़ चुका है। कांग्रेस प्रदेश की राजनीति के हाशिए से भी बाहर है। ऐसे में भीम आर्मी के चंद्रशेखर एक नई उम्मीद के रूप में उभर रहे हैं। नागरिकता संशोधन कानून, एनपीआर और एलआरसी के खिलाफ जिस तरह वो देश भर में घूम-घूम का प्रचार कर रहे हैं उससे लगता है कि वो प्रदेश के अगले विधानसभा चुनाव में ख़ुद को बतौर मुख्यमंत्री का उम्मीदवार प्रोजेक्ट कर सकते हैं।


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कुँवर देवेन्द्र सिंह अब 50 साल के हो चुके हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सक्रिय गुर्जर संगठन के अध्यक्ष है। उनके छोटे भाई केंद्र सरकार में गृह सचिव है। बड़े भाई प्रोफेसर हैंं। पिता को उत्तर प्रदेश सरकार सूबे के सर्वश्रेष्ठ किसान के ओहदे से सम्मनित कर चुकी है ।देवेंद्र सिंह के पूर्वज हैं। हंसापुर (हस्तिनापुर) राज्य के राजा रह चुके हैं।लगभग सभी बड़े गुर्जर घरानों में इनकी रिश्तेदारी है। कुँवर देवेंद्र सिंह समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। आजकल भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आज़ाद के साथ साये की तरह दिखाई देते हैं।अक्सर ‘जय जय जय भीम’ का ज़ोरदार नारा लगाते हैं।। चंद्रशेखर आज़ाद की ओबीसी जातियों को एकजुट करने की योजना के अगुआ है।

बिजनौर जनपद से कई बार विधायक रहे मोहम्मद गाज़ी, मोदीनगर के पूर्व विधायक निज़ाम चौधरी जैसे पुराने बसपाई बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के साथ रहे कुछ विश्वासपात्र नेता, पूर्व विद्यायक, पूर्व मंत्री भी अब अपनी अपनी भूमिका में चंद्रशेखर के बग़लगीर है। देश विदेश के बहुत से अम्बेडकरवादी अब चंद्रशेखर में रुचि रखते हैं। उसकी हिमायत में खड़े है।

कुँवर देवेंद्र सिंह कहते है, ‘मुझ समेत इनमे से कोई भी किसी राजनीतिक ख़्वाहिश नही पाल रहा है।अब विद्यायक, सांसद बनने की इच्छा नही है। यह राजनीतिक भविष्य का प्रश्न नही है। यह शोषितों, दबे कुचले, पिछडो और अल्पसंख्यकों को उनका हक़ दिलाने की लडाई है। हम सत्ता नहींं चाहते मगर हर एक सत्ता वो करना होगा जो हम चाहते हैं। हम समाज मे किसी भी प्रकार की ग़ैरबराबरी अथवा जातीय, धार्मिक अथवा आर्थिक आधार पर हो रहे किसी भी तरह के भेदभाव के पूर्णतया विरोधी हैंं।हम सबको समान अधिकार चाहते हैं। यह एक मिशनरी लड़ाई है। जिसमे हमारे नेता चंद्रशेखर आज़ाद है।’

पिछले महीने जेल से बाहर आने के बाद चंद्रशेखर आज़ाद दिनभर में कई सभाओं को संबोधित कर रहे हैं। इस दौरान वो दिल्ली, केरल, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और पंजाब में नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ बोल चुके हैं। इनमें कई सभाओं में लाखों लोग भी जुटे हैं।दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर 20 दिसंबर को संविधान सीने से लगाकर पहुंचना अब तक लोगो के दिलों में बसा हुआ है। एक ‘पैर’ जेल में रखने वाले चंद्रशेखर आज़ाद (पिछले 3 सालों में उनका आधा वक़्त जेल में ही गुज़रा है।) आजकल दलितों आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण में भविष्यगामी ख़तरे को देखते हुए बड़ी तैयारी में जुटे हैं। देश की सूप्रीम अदालत के एक फ़ैसले से असंतुष्ट होकर उन्होंने 23 फरवरी को भारत बंद करने का ऐलान किया है।

“योगी जब जब डरता है पुलिस को आगे करता है” और “जय जय जय भीम”जैसे नारे अब भीम आर्मी की पहचान बन चुके हैं। फ़िलहाल चंद्रशेखर आज़ाद के भाई को पुलिस मारपीट के एक मामले में जेल भेज चुकी है। सहारनपुर में भीम आर्मी  के राष्ट्रीय महासचिव कमल वालिया और प्रवक्ता मंजीत नोटियाल हाल ही कुछ महीने जेल में बिताकर लौटे हैंं। सिर्फ सहारनपुर में भीम आर्मी के सैकड़ों कार्यकर्ता जेल यात्रा कर चुके हैं। भीम आर्मी के राष्ट्रीय महासचिव कमल सिंह वालिया कहते हैं, ‘जेल तो क्रांतिकारियों के लिए शोभा यात्रा जैसी है। अब हम जेल जाने से नहींं डरते। प्रशासन तो सरकार की कठपुतली बनकर काम कर रहा है।’

देश-विदेश में चर्चा की वज़ह बन चुके चंद्रशेखर आज़ाद से सबसे ज्यादा नींद उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रहींं मायावती की हराम हुई हैं।मायावती अक्सर चंद्रशेखर पर भाजपा का एजेंट होने का आरोप लगाती रही है। जैसे बसपा से जुड़े गौरव भारती कहते हैं, ‘चंद्रशेखर ने कई बार बहनजी के नज़दीक जाने की कोशिश की। उन्हें बुआ जी कहा और अपना खून का रिश्ता तक बताया। मगर बहन जी का दिल नही पसीजा।बहनजी ने बहुत मेहनत से अपनी राजनीतिक ज़मीन खड़ी की है वो उसे ऐसे ही किसी ट्रांसफर नही होने देंग।’

चंद्रशेखर की सक्रियता के बाद मायावती में बहुत सारे परिवर्तन आएं है। जैसे मायावती अब सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय हैंं। उनके रोज़मर्रा के हिसाब से ट्वीट आ रहे हैं। वो अपने निष्क्रिय नेताओं को धड़ाधड़ संस्पेंड कर रही हैंं। पहले वो अड़ियल रवैया के लिए जानी जाती थी। अब उनके लहजे में विनम्रता आ गई है। सहारनपुर के पुराने पत्रकार अहमद रज़ा कहते हैं, ‘अब मायावती को अपने पैरों के नीचे की ज़मीन खिसकती दिखाई दे रही है। उन्हें पता चल रहा है कि चंद्रशेखर की लोकप्रियता बढ़ गई है वो दलितों का नया युवराज है।’

हालांकि चंद्रशेखर ख़ुद खुले मंच से कई बार अपनी  राजनीतिक महत्वकांक्ष से इंकार कर चुके हैं। उनके क़रीबी मानते हैं कि उनमें कांशीराम 2.0 बनने का जुनून है। मायावती की राजनीति को उनसे कोई ख़तरा नही है। वो भी मायावती को नेता मानते हैं मगर फिलहाल वो मायावती के नजदीक बढ़ते ब्राह्मण वर्चस्व से नाराज़ है।

चन्द्रशेखर के संगठन भीम आर्मी अब राजनीतिक पार्टी का रूप ले चुका है। इसकी बहुत संभावना है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में उनके दल की सक्रिय भूमिका रहेगी। कल तक सहारनपुर के नेता जिसे ‘लौंडा’कहते थे आज वो उनकी नकेल हो चुका है।अब वो बातचीत में उसे ‘चंद्रशेखर भाई’ कहते हैं। हालांकि भीम आर्मी तमाम कार्यकर्ता उन्हें सिर्फ ‘भाई’ ही कहते हैं।

 

भीम आर्मी के एक स्थानीय कार्यकर्ता कालीचरण कहते है, ‘कुछ स्थानीय नेतागणों ने बड़े नेताओं के सामने चंद्रशेखर भाई को अपना ‘चेला’बताना का गुनाह किया था। उन्हें वक़्त-ए-ज़रूरत पर उनकी औक़ात बता दी गई। जब बात औक़ात की ही है तो तीन साल में सहारनपुर में ‘भाई’ से बड़ा अब कोई नेता नहींं। वो जब चाहे जहां चाहे लाखों की भीड़ इकट्ठी कर सकते हैं। वो निडर हैंं। समाज का युवा उनकी एक आवाज़ पर कुछ भी कर देगा।

 

सहारनपुर के लोग मानते हैं यह वाला चंद्रशेखर 20 अप्रैल 2017 को अस्तित्व में आया था। इस दिन चंद्रशेखर पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर हुए थे।

इस दिन सड़क दुधली गांव में अंबेडकर शोभायात्रा के दौरान हिन्दू संगठनों और मुस्लिम बहुल सड़क दुधली गांव के लोगो के बीच सँघर्ष हो गया था। प्रदेश भर में दलितों और मुस्लिमोंं के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी। चंद्रशेखर आज़ाद ने हालात की गंभीरता को समझा और सोशल मीडिया पर इसे हिन्दू संगठनों की साजिश बताते हुए दलित युवाओं से षड्यंत्र में न आने की अपील की।चंदशेखर की अपील का युवाओं पर असर हुआ और दलित मुस्लिम संघर्ष की नींव में मट्ठा डल गया। इस दिन दलित मुस्लिम सँघर्ष तो नहींं हो पाया मगर चंदशेखर हिन्दू संगठनों की आंख में खटकने लगा। यही कारण था कि 9 मई को सहारनपुर बंद के दौरान बड़े पैमाने पर हुई हिंसा में चंद्रशेखर आज़ाद को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जबकि वो खुद प्रशासनिक अमले के साथ भीड़ को समझाने पर लगा था। बाद में चंद्रशेखर पर रासुका लगा दी गई और उसे लगभग एक साल जेल में रहना पड़ा।

जेल से आने के बाद से चंद्रशेखर ने अपनी सक्रियता देशभर में फैला दी और राजनीतिक तौर पर उन्हें जबरदस्त लोकप्रियता उस दिन मिली जब प्रियंका गांधी मेरठ अस्पताल उनसे मिलने पहुंच गई। चंदशेखर के क़रीबी बॉबी प्रधान बताते हैं, ‘इसके बाद तीन दिन तक तमाम बड़े नेताओं का यहां जमावड़ा लगा रहा। कल तक चंद्रशेखर भाई को ‘लौंडा’बताने वाले भी उनसे टिकट की सिफ़ारिश की जुगत में लग गए।’

रामराज के रहने वाले बीएसपी में पिछले 22 साल से जुड़े रहे राजनीतिक जानकर शमीम अहमद कहते हैं, ‘चंद्रशेखर ने बिजली की तेजी से तरक़्क़ी की है। वो निश्चित तौर पर प्रदेश में दलित मुस्लिम समीकरण साधने में कामयाब हुए हैं। दलितों को मुस्लिमों के नजदीक लाने के उनके प्रयासों का निश्चित तौर पर बड़ा राजनीतिक मतलब है। उनके समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव से अच्छे संबंध है। मगर इसकी संभावना ज्यादा है कि वो कांग्रेस के साथ रहेंगे।यह भी हो सकता है तीनों गठजोड़ बनाकर चुनाव लड़ेंं। चूंकि अखिलेश यादव अकेले चुनाव लड़ने की बात कह रहे है तो कांग्रेस चंदशेखर पर दांव खेल सकती है। ऐसी स्थिति में भीम आर्मी को कांग्रेस का साथ मिल सकता है और उत्तर प्रदेश को एक दलित मुख्यमंत्री मिल सकता है।’

उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी की सक्रियता और मेहनत से इतर चंद्रशेखर के साथ उनकी कैमेस्ट्री भविष्यगामी राजनीति के कुछेक संकेत तो देती है जैसे पिछले सप्ताह वाराणसी में रविदास मंदिर पर सड़क किनारे खड़े चंदशेखर को प्रियंका गांधी ने हाथ हिलाकर बुलाया और उसके बाद अपने साथ-साथ रखा।

लखनऊ के तारिक़ सिद्दीकी इस सबसे बेहद उत्साहित है। वो कहते हैं, ‘कांग्रेस से उनकी ताक़त मुसलमान और दलित क्रमश: सपा और बसपा की तरफ चला गया। अगर ऐसा हो जाता है तो कांग्रेस की

दलित और मुसलमान दोनों लौट सकते हैं। ख़ासकर मुसलमानों में चंद्रशेखर के सँघर्ष से पहचान मजबूत हुई है। लेकिन सिर्फ दलित और मुसलमानों से ज्यादा कुछ होने वाला नही है। मगर चंदशेखर का युवा चेहरा का काफी फ़ायदा होगा’

यह सब चंद्रशेखर भी समझ गए है आजकल वो सारा ज़ोर दूसरी पिछड़ी जातियों को एकजुट करने पर दे रहे हैं। वो बताते हैं कि केंद्र सरकार को चलाने वाले 85 सचिवों में से एक भी ओबीसी नही है। वो ओबीसी को आरक्षण देने की मांग भी उठा रहे हैं।फिलहाल चंद्रशेखर 23 फरवरी को होने वाले भारत बंद के लिए समर्थन मांग रहे हैं।यह भारत बंद उनके कद को भी राष्ट्रीय स्तर पर परिभाषित करेगा।

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