दिल्ली पहुंची कचरी की आवाज़, जांच समिति ने किया दमन का विरोध

By TCN News

इलाहाबाद, १६ अक्टूबर : यहाँ की करछना तहसील के कचरी गाँव में बीते महीने की 9 तारीख को हुए पुलिसिया दमन की जांच करने दिल्ली से आई पत्रकारों की एक स्वतंत्र जांच समिति ने जेल में बंद किसानों के परिवारों के साथ सहानुभूति जताते हुए उन्हें तत्काल बेशर्त रिहा करने की मांग उठाई है। गुरुवार और शुक्रवार को कचरी,कचरा, देहली भगेसर आदि गांवों का दौरा करने तथा जिलाधिकारी के साथ लंबी वार्ता करने के बाद जांच दल ने यहां स्थित कॉफी हाउस में पत्रकारों को संबोधित करते हुए अपनी जांच के निष्कर्ष संक्षेप में सामने रखे।


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सामाजिक कार्यकर्ता प्रिया पिल्लई, जितेंद्र चाहर और ऋचा पांडेय, पत्रकार राजेंद्र मिश्रा, संजय रावत, अजय प्रकाश, सिद्धांत मोहन और अभिषेक श्रीवास्तव, राजनीतिक कार्यकर्ता राघवेंद्र सिंह, राघवेंद्र प्रताप सिंह और अधिवक्ता रवींद्र सिंह उक्त जांच दल में शामिल थे। इन्होंने करछना पावर प्लांट से प्रभावित परिवारों की व्यथा सुनी और जेल में बंद महिलाओं व पुरूषों से मुलाकात के बाद बताया कि किस तरह किसानों के परिवारों को फर्जी मुकदमों में कैद किया गया है और एक महीने से ज्यादा समय से छोटे-छोटे बच्चों को अपराधियों के बीच रखकर उनके अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है।


पुलिस के आतंक के बाद कचरी गांव में पसरा सन् नाटा
पुलिस के आतंक के बाद कचरी गांव में पसरा सन्नाटा


जांच समिति ने कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं जो निम्न हैं-

• तीन लाख का मुआवजा वापस लेने के लिए कानूनी प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई जा रही
• विस्थापित किसानों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन का खाका अब तक क्यों नहीं बना है
• पूरे इलाके में अलग-अलग बहानों से पिछले दो महीने से धारा 144 क्यों लागू है
• जेल में बंद 42 लोगों में शामिल 8 बच्चों को बाल सुधार गृह में क्यों नहीं भेजा जा रहा है
• प्रशासनिक अधिकारियों के बयानों में 9 सितंबर की घटना को लेकर विरोधाभास क्यों है

सामाजिक कार्यकर्ता प्रिया पिल्लई ने कहा, ‘‘गिरफ्तार 42 किसानों को 36 घंटे तक कुछ खाने-पीने को नहीं दिया गया। एक महिला से यह कहा गया कि कुबूल करो कि तुम्हारे घर में बारूद बनता है। आखिर यह मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं तो और क्या है।’’ पत्रकार अजय प्रकाश ने 9 सितंबर की घटना के बारे में एस.पी. जमुना पार आशुतोष मिश्र की बताई कहानी को मनगंढ़त करार देते हुए सवाल उठाया कि ‘‘कचरी गांव के सिपाही लाल पटेल के घर के भीतर से अगर बम फेंका गया था तो घर के भीतर की दीवारें काली क्यों हैं और उसमें कोई आहत क्यों नहीं हुआ। जांच दल ने 9 सितंबर को गांव पर हुए हमले की कहानी में कई तकनीकि झोल गिनाते हुए साफ कहा कि यह कार्रवाई विकास के नाम पर किसानों से जमीन हड़पने के लिए जबरन की गई है।’’ ऋचा पांडेय ने पूछा, ‘‘एस.पी. के मुताबिक गांव में यदि एस.आई महिला थाना समेत आठ महिला सिपाही भेजी गई थीं तो गांव की युवतियां पुरूष सिपाहियों के बारे में शिकायत क्यों कर रही हैं। साफ है कि प्रशासन झूठ बोल रहा है।’’

दिल्ली से आए पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव ने करछना मामले की कनहर गोली कांड से तुलना करते हुए कहा कि ‘‘सरकारें कंपनियों के एजेंट का काम कर रही हैं और विकास का नाम लेकर संसाधनों को निजी हाथों में सौंप देना चाहती हैं। इसी वजह से उनकी कार्रवाई से असहमत जनता को कभी नक्सली तो कभी आतंकवादी करार दिया जा रहा है। करछना के मामले में उन्होंने इलाहाबाद के पंथ संस्थान में करवाए गए एक अध्ययन का हवाला दिया जिसमें मिर्जापुर से इलाहाबाद तक को नक्सली क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की गई थी।’’ उन्होंने पूरी घटना को इस पृष्ठभूमि में देखने का आग्रह किया।

संघर्ष संवाद के संपादक जितेंद्र चाहर ने बताया कि कचरी में हुए दमन का संज्ञान राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने ले लिया है और संभव है कि जल्द ही आयोग की एक टीम इसकी जांच करने के लिए मौके पर पहुंचेगी जिसकी गाज कुछ बड़े प्रशासनिक अधिकारियों पर गिर सकती है। राघवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि मुलायम सरकार चाहे कितना भी इस मामले को क्यों न दबा ले लेकिन करछना के किसानों की आवाज अब दिल्ली पहुंच चुकी है।

जांच समिति जल्द ही दिल्ली में एक बड़ा आयोजन करके अपनी जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करेगी और उसकी एक प्रति राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सौंपते हुए दोषी अधिकारियों को दंडित करने की मांग करेगी।

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