हरियाणा की ये बर्बादी अगर मुसलमानों के नाम होती तो…

Afroz Alam Sahil, TwoCircles.net

पिछले दिनों हरियाणा में जाट आन्दोलन के नाम पर जो कुछ हुआ. उसे निश्चित तौर पर आन्दोलन तो क़तई नहीं कहा जा सकता. सड़कों पर जो नंगा नाच चल रहा था, उसे हमला बताना भी शायद समझदारी की बात नहीं होगी. ये विशुद्ध रूप से एक सुनियोजित दंगा था, जिसे दिल्ली की केन्द्र सरकार व राज्य सरकार आंख मूंद कर देख रही थीं.


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ज़रा याद कीजिए कि यहां किस प्रकार स्कूल जलाये गये? कैसे इन जाट दंगाईयों ने अस्पताल को फूंक डाला? मॉल को ख़ाक कर दिया? मार्केट और दुकानें लूट ली गयीं? न जाने कितने हज़ार वाहन और दुकानें फूंक डाली गयीं? कैसे घरों में घुसकर लूटपाट, आगजनी और हत्याएं की गईं? कैसे मंत्रियों के घरों पर भी हमले हुए? बस्तियों को जला दिया गया?

यदि आंकड़ों की बात करें तो आरक्षण की मांग को लेकर 9 दिन चले इस आंदोलन के दौरान कुल 19 लोगों की मौत हुई, जबकि सैकड़ों घायल हुए. एसोचैम के एक रिपोर्ट के मुताबिक 21 फ़रवरी तक ही क़रीब 20,000 करोड़ का नुक़सान हो चुका था. यही नहीं, नॉर्दन रेलवे को 200 करोड़ से ज़्यादा का नुक़सान हुआ. करीब 10 लाख रेल यात्री इस आंदोलन के चलते परेशान हुए और 1000 से ज़्यादा ट्रेनें प्रभावित हुईं.

यानी इन जाट दंगाइयों ने लाखों करोड़ रुपये का नुक़सान कर दिया. लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी छीन ली. हज़ारों व्यापारियों की ज़िन्दगी भर की कमाई को चुटकी बजाकर स्वाहा कर दिया. लेकिन खट्टर सरकार व उनके आका मोदी सरकार और इन दोनों के ‘बाप’ यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इसमें कोई ‘राष्ट्रद्रोह’ नहीं दिखता. मीडिया को भी यह दंगाई ‘राष्ट्रद्रोही’ नज़र नहीं आते. हद तो यह हो गई कि नंगी आंखों से दिखने वाला इस दंगे के सच को नज़रअंदाज़ करके ज़्यादातर मीडिया चैनल लोगों को जेएनयू के कन्हैया कुमार व उमर खालिद के चेहरे दिखाकर मुल्क को ‘देशभक्ति’ का पाठ पढ़ाते रहें.

ख़ैर हरियाणा में जाट रिजर्वेशन के नाम पर जो कुछ हुआ, उसने इस देश के ज़िम्मेदार नागरिकों के समक्ष एक भयावह तस्वीर खींच दी है. लेकिन सवाल यह है कि अगर यह आन्दोलन जाटों की जगह कुछ मुसलमानों ने किया होता तो प्रतिक्रिया का आलम क्या होता? क्या ये मुमकिन नहीं था कि एक बड़ा तबक़ा उन्हें देशद्रोही और ग़द्दार बताकर समाज के लिए ‘कैंसर’ साबित करने में जुट जाता, जैसा कि हाल में ही पश्चिम बंगाल राज्य के मालदा शहर में हुआ था.

जी हां! अब ज़रा याद कीजिए बीते महीने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से 1700 किलोमीटर दूर मालदा में घटित होने वाली घटना को. याद कीजिए कि कैसे कुछ मुसलमानों ने कानून को अपने हाथ में लिया था तो मेनस्ट्रीम मीडिया में कोहराम मच गया. कैसे टीवी चैनलों की डिबेट चीख़-पुकार में बदल गई. कैसे सोशल मीडिया पर ‘इंटरनेट हिंदूओं’ ने सिर पर आसमान को उठा लिया. हर तरफ़ से मुसलमानों के उन्मादी, अतिवादी, चरमपंथी और आतंकवादी होने के सर्टिफिकेट बांटे गए. कैसे हर जगह इसकी गूंज सुनाई पड़ी. कैसे पीएम मोदी की पार्टी यानी बीजेपी ने इस इस घटना पर राजनीति की. किस क़दर राजनीतिक बावेला खड़ा किया गया?

लेकिन ज़रा ग़ौर करिए कि दिल्ली से महज़ चंद किलोमीटर की दूरी पर जाट आरक्षण के नाम पर हुए आंदोलन में जमकर लूट, मारपीट, आगज़नी और जमकर तोड़फोड़ हुई. गाड़ियों और बसों से मांओं, बहनों और बेटियों को जबरन उतारा गया, खेत में ले जाया गया, गैंगरेप किया गया. लेकिन मीडिया में बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया. एक-दो चैनलों को छोड़कर किसी भी चैनल ने इस पर डिबेट करना मुनासिब नहीं समझा. प्राईम टाईम में चिल्लाने वाले एंकर खामोश ही नज़र आएं. सोशल मीडिया के ‘इंटरनेट हिंदू’ भी राष्ट्रवाद की गोली लेकर खामोश ही रहें. अब सवाल है कि आख़िर देश में ये दोहरा रवैया क्यों है?
सच तो यह है कि जब ये दो घटनाएं एक साथ ज़ेहन से टकराती हैं और कई सवाल खड़े कर जाती हैं. और ये सवाल देश के मेनस्ट्रीम मीडिया की साख से जुड़ा है, जो एक ही तरह की मिलती-जुलती ख़बरों के चयन और उसे प्राथमिकता देने के दोहरे पैमाने की चुगली करता है.

सवाल है कि हरियाणा का यह आंदोलन किसी मुसलमान ने किया होता तो क्या मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया का रवैया वही होता, जो आज जाट आंदोलन को लेकर है. मैं तो ये सोचकर सहम जाता हूं कि अगर ऐसा मुसलमानों ने किया होता तो उनके हाथ काट दिए जाते, पैर तोड़ दिए जाते, जुबान खामोश कर दी जाती है. उनकी ज़मीन तंग कर दी जाती. वही आर्मी, जिन्हें हरियाणा भेजा गया था, वो हरकत में नज़र आती.

सवाल यह भी है कि आख़िर एक ही जैसे गुनाह के लिए इंसाफ़ के दो अलग-अलग तराजू क्यों है? क्या ये इस बात की ओर इशारा नहीं करता कि समानता की बात करने वाले हमारे सामाजिक ढांचे में ऐसा भेदभाव क्यों?

दरअसल, मीडिया व सरकार का यही रवैया क़ौम की सियासत करने वालों को मौक़ा देती हैं. देश-वासियों के दिलों में नफ़रत भरती हैं. लोगों के दिल से क़ानून का डर निकाल देती हैं. बल्कि सच तो यह है कि इन हालातों का फ़ायदा क़ौम के बाहर ही नहीं, क़ौम के भीतर भी उठाया जाता है. क़ौम के भीतर के कुछ तथाकथित रहनुमा ऐसे ही मुद्दों को अपनी भड़काऊ सियासत का हथियार बना लेते हैं. मगर यह भी है कि भावनाओं के इस जंग में जो पिसता है, वो आम मुसलमान है. जिसकी बुनियादी समस्याओं की चिंता किसी को नहीं है. मगर उसके नाम पर मढ़ने के लिए तोहमतों का पूरा का पूरा ज़ख़ीरा मौजूद रहता है.

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