जिनकी क़लम गांधी को चम्पारण खींच लाई…

अफ़रोज़ आलम साहिल, TwoCircles.net

आज से ठीक सौ साल पहले चम्पारण के किसानों का दर्द जान गांधी 1917 में पहला सत्याग्रह करने चले आए. सत्याग्रह के अनुभवों व परिणामों ने तो आज़ादी के लड़ाई का कलेवर ही बदल दिया. यह आज़ादी के दीवानों की पहली बड़ी कामयाबी थी. जब तक गांधी हैं, चम्पारण की हैसियत एक पाठशाला की है. यहां के बाशिन्दों में आज़ादी के लिए दीवानगी थी. इन्हीं दीवानों में एक शख़्स है जिसने अपना सारा जीवन देश की आज़ादी हासिल करने और उसके सामाजिक ताने-बाने को बचाने में लगा दिया. जिसके ज़िन्दगी का असल मक़सद देश में हिन्दू-मुस्लिम एकता क़ायम रखना था. जो सबकुछ त्याग कर भी गरीबों-किसानों के मुद्दों को आवाज़ देता रहा. जिसकी पत्रकारिता एक सामाजिक आंदोलन की वाहक बनी. उस सच्चे देशभक्त पत्रकार का नाम है —पीर मुहम्मद मूनिस 

दरअसल, ये मूनिस के क्रांतिकारी शब्द ही थे जो गांधी को चम्पारण खींच लाए और गांधी के सत्याग्रह के कारण चम्पारण की एक अलग पहचान बनी.  

ब्रितानी दस्तावेज़ों के मुताबिक़ –“पीर मुहम्मद मूनिस अपने संदेहास्पद साहित्य के ज़रिये चंपारण जैसे बिहार के पीड़ित क्षेत्र से देश दुनिया को अवगत कराने वाला और मिस्टर गांधी को चंपारण आने के लिए प्रेरित करने वाला ख़तरनाक और बदमाश पत्रकार था.

अंग्रेज़ों ने गांधी को मदद करने वाले 32 लोगों की एक सूची तैयार की, जिसमें दसवां नाम पीर मुहम्मद मूनिस का था. इसका ज़िक्र 12 सितम्बर 1917 को चम्पारण के सुप्रीटेन्डेंट ऑफ़ पुलिस सी.एम. मारशम द्वारा तिरहुत डीविज़न के कमिश्नर एल.एफ़. मॉरशेद को लिखे एक पत्र में मिलता है. इस पत्र में मूनिस के बारे में ये भी लिखा है कि, “बेतिया का पीर मुहम्मद मूनिस, जिसके पास कुछ नहीं है, जिसका कोई स्तर नहीं. वह एक ख़तरनाक व्यक्ति है, और व्यवहारतः बदमाश है.” 

एक और पत्र में पीर मुहम्मद मूनिस के बारे में अंग्रेज़ों ने लिखा है. “गांधी को मदद पहुंचाने में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है पीर मुहम्मद. जहां तक मैं समझता हूं, वो बेतिया राज स्कूल में शिक्षक था. उसे उसके पद से बर्खास्त किया गया, क्योंकि वह 1915 या उसके आस-पास स्थानीय प्रशासन के ख़िलाफ़ हमलावर लेख प्रकाशित कराता था. वो बेतिया में रहता है और लखनऊ के ‘प्रताप’ में संवाददाता के रूप में काम करता है. ‘प्रताप’ एक ऐसा अख़बार है, जो चम्पारण के प्रश्न पर पर उग्र विचार देता है… पीर मुहम्मद बेतिया के शिक्षित, अर्द्ध-शिक्षित रैयतों तथा रैयत नेताओं के बीच कड़ी का काम करता है.” ये पत्र बेतिया के सब-डिवीज़नल ऑफिसर डब्ल्यू.एच. लेविस ने तिरहुत डीविज़न के कमिश्नर को लिखा था. यहां यह स्पष्ट रहे कि डब्ल्यू.एच. लेविस को यह नहीं मालूम था कि प्रताप लखनऊ से नहीं, कानपुर से निकलता है. मूनिस बेतिया राज स्कूल के शिक्षक नहीं, बल्कि गुरू ट्रेनिंग स्कूल में शिक्षक थे. और मूनिस धर्म-परिवर्तन करके मुसलमान नहीं बने थे, बल्कि जन्म से ही मुसलमान थे. उनके पिता का नाम फतिंगन मियां था.   

दिलचस्प बात यह है कि गांधी जी भले ही चम्पारण अप्रैल, 1917 में आएं, लेकिन चम्पारण के देहात (वो इलाक़ा जो नील फैक्ट्री के आस-पास थे) में इसकी चर्चा 1915 के आख़िर से ही होनी शुरू हो गई थी. इसकी पुष्टि 4 मार्च 1916 को बिहार स्पेशल ब्रांच इंटेलीजेंस रिपोर्ट से होती है. इस रिपोर्ट में लिखा है – ‘देहातों में यह भी अफ़वाह है कि दक्षिण अफ़्रीक़ा में एक बार भारतीयों को जिस गांधी नामक व्यक्ति ने भड़काया था, वो भाषण देने आ रहा है. और यह चर्चा पीर मुहम्मद मूनिस के लिखे एक पर्चे के कारण ही हो रही थी

इस ख़ुफ़िया रिपोर्ट में ‘प्रताप’ प्रेस से प्रकाशित पर्चे का भी ज़िक्र है. यह काफ़ी हैरान कर देने वाली बात है कि गांधी को चम्पारण बुलाकर लाने वाले सारा श्रेय राजकुमार शुक्ल को जाता है. जबकि राजकुमार शुक्ल पीर मुहम्मद मूनिस के माध्यम से ही गांधी को जानते थे. तो फिर सवाल उठता है कि गांधी के आने की चर्चा 2015 के आख़िरी या 2016 के शुरू के महीनों में कैसे होने लगी? 

यहां यह भी बताते चलें कि लखनऊ अधिवेशन में राजकुमार शुक्ल अकेले नहीं गए थे, बल्कि पीर मुहम्मद मूनिस और इनके खास दोस्त हरिवंश सहाय भी साथ गए थे. इसका ज़िक्र भारत के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद अपनी पुस्तक में भी करते हैं. 

लखनऊ अधिवेशन से चम्पारण लौटने के बाद राजकुमार शुक्ल ने गांधी जी को 27 फ़रवरी, 1917 को पत्र लिखा. उस पत्र ने भी गांधी जी को काफ़ी प्रभावित किया और इसे पढ़ते ही गांधी जी का चम्पारण आने का मन और पक्का हुआ. दरअसल यह पत्र राजकुमार शुक्ल ने पीर मुहम्मद मूनिस से लिखवाया था. पटना कॉलेज के प्रिसिंपल व इतिहासकार डॉ. के.के. दत्ता को गांधी जी को लिखा यह पत्र मूनिस के घर से मिला था. 

पत्र में मूनिस ने गांधी को ‘मान्यवर महात्मा’ कहकर संबोधित किया था. पत्र में एक जगह मूनिस जी ने लिखा था –‘क़िस्सा सुनते हो रोज़ औरों के, आज मेरी भी दास्तान सुनो! आपने उस अनहोनी को प्रत्यक्ष कर कार्यरूप में परिणत कर दिखाया, जिसे टालस्टॉय जैसे महात्मा केवल विचार करते थे. इसी आशा और विश्वास से वशीभूत होकर हम आपके निकट अपनी राम-कहानी सुनाने को तैयार हैं. हमारी दुख भरी कथा उस दक्षिण अफ्रीका के अत्याचार से –जो आप और आपके अनुयायी वीर सत्याग्रही बहनों और भाईयों के साथ हुआ –कहीं अधिक है.’ 

पत्र के आखिर में उन्होंने लिखा है –‘चम्पारन की 19 लाख दुखी प्रजा श्रीमान के चरण-कमल के दर्शन के लिए टकटकी लगाए बैठी है और उन्हें आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि जिस प्रकार भगवान श्री रामचन्द्र जी के चरणस्पर्श से अहिल्या तर गईं, उसी प्रकार श्रीमान के चम्पारन में पैर रखते ही हम 19 लाख प्रजाओं का उद्धार हो जाएगा.’ 

‘इसके बाद एक दूसरा पत्र ख़ुद पीर मुहम्मद मूनिस ने गांधी जी को 22 मार्च 1917 को भेजा, जिसमें उन्होंने चम्पारण के संबंध में बहुत सी बातों और घटनाओं का उल्लेख किया. इसके उत्तर में गांधी ने 28 मार्च 1917 को यह पूछा कि वह मुज़फ़्फ़रपुर किस रास्ते से पहुंच सकते हैं? और यह भी जानना चाहा कि यदि वह तीन दिनों तक चम्पारण में ठहरें, तो जो कुछ देखने की आवश्यकता थी, वह सब देख सकेंगे या नहीं? यह पत्र अभी पहुंचा भी नहीं था कि 3 अप्रैल 1917 को उन्होंने शुक्ल जी को तार दिया कि मैं कलकत्ता जा रहा हूं, वहां श्रीयुत् भूपेन्द्रनाथ वसू के मकान पर ठहरूंगा, आकर वहीं मिलो. इस तार के मिलते ही फौरन राजकुमार शुक्ल कलकत्ता चले गए…’ 

गांधी जी जब पहली बार 22 अप्रैल 1917 को बेतिया पहुंचे तो हज़ारीमल धर्मशाला में थोड़ा रूक कर सीधे वो पीर मुहम्मद मुनिस के घर उनकी मां से मिलने पैदल चल पड़े. वहां मुनिस के हज़ारों मित्रों ने गांधी का अभिनन्दन किया.

मूनिस गांधी के लिए सबसे अधिक काम कर रहे थे, इसकी जानकारी अंग्रेज़ों को भी थी. तिरहुत डिवीज़न के कमिश्नर ने मई 1917 को सरकार को एक रिपोर्ट भेजी. इस रिपोर्ट में साफ तौर पर मूनिस के काम का उल्लेख था. 

सच पूछे तो मूनिस के लेखों के कारण ही चम्पारण के नील किसानों का मुद्दा आगे चलकर चलकर राष्ट्रीय मसला बना और गांधी चम्पारण आएं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने अपने संस्मरण में इसका ज़िक्र करते हुए एक जगह लिखते हैं –‘चम्पारण के लिए मूनिस जी ने कितना परिश्रम किया है उसकी सम्पूर्ण कथा सुनाने वाला अब कौन है? यह बात ध्यान देने योग्य है कि चम्पारन की दुख-गाथा सुनाने के लिए जितना कार्य मूनिस जी ने किया, उतना शायद ही किसी दूसरे लेखक ने किया होगा. इसके लिए उन्हें अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा था.’

(लेखक ने मूनिस पर शोध किया है और इन पर एक पुस्तक लिख चुके हैं.)

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