ये समय है कि हिन्दू समाज मुस्लिमों से सॉरी बोले, मैं एक हिन्दू हूं, इसलिए सॉरी… सॉरी… सॉरी…

कलीम सिद्दीक़ी

अहमदाबाद : ‘यह मेरा फ़र्ज़ था कि पीड़िता को न्याय मिले. बिलकीस हो या कोई और, उसका न्याय में भरोसा बना रहे, यह मेरी ज़िम्मेदारी है.’

ये बातें जन विकास मंच द्वारा अहमदाबाद मैनेजमेंट एसोसिएशन में आयोजित प्रेस वार्ता में मीडिया से बात करते हुए आर.के. शाह ने कहीं.

शाह ने न्याय प्रक्रिया के दौरान आई कठिनाइयों का ज़िक्र करते हुए बताया कि किस प्रकार से पुलिस का गैर-ज़िम्मेदाराना रोल रहा. पुलिस आरोपियों को पकड़ती नहीं थी और उसके बाद कोर्ट में आकर आसानी से कह देती थी कि आरोपी नहीं मिल रहे हैं.

आगे उन्होंने बताया कि, इस केस में पीड़ित महिला अनपढ़ और गांव की थी, जिसे गुजराती के सिवा दूसरी भाषा नहीं आती थी. मुंबई में ट्रायल चल रहा था. सीबीआई के ऑफिसर नॉन-गुजरती थे. पीड़िता एक गांव से भाग रही थी. एक ग्रुप से बिछड़ गई थी, जब ये घटना पेश आई थी.

आर.के. शाह ने कहा कि, ‘निर्भया हो या बिलक़ीस, सभी को न्याय मिलना चाहिए.’ साथ ही शाह ने कहा कि, पुलिस द्वारा जांच अच्छी हो इसके लिए उनकी ट्रेनिंग की ज़रूरत है और पब्लिक प्रासीक्यूटर भी अच्छा होना चाहिए.

पब्लिक प्रासीक्यूटर नयना भट्ट ने इस फ़ैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि, जिस प्रकार से गगन भाई, फ़रहा नक़वी एवं अन्य सिविल सोसाइटी के लोग न्याय के लिए कोशिश करते रहे, समाज के लोग साथ खड़े रहे, बिलक़ीस खड़ी रही और कोर्ट में सही से बयान दे पाई, इससे न्याय पाना आसान हुआ.

उन्होंने आगे कहा कि, यह फ़ैसला उनके लिए सबक़ है, जो किसी के इशारे पर फ़र्ज़ी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बना देते हैं. उन जांच अधिकारियों के लिए भी सबक़ है, जो आरोपियों को बचाने की कोशिश करते हैं. न्याय मिलना आसान नहीं, लेकिन नामुमकिन भी नहीं. इस केस में हमें भी बहुत सीखने को मिला.

बिलक़ीस बानो और निर्भया कांड की हो रही तुलना पर नयना भट्ट ने कहा कि, इन दोनों की तुलना नहीं की जा सकती. निर्भया घटना वासना को संतोष करने के लिए हुई थी, जबकि बिलक़ीस के साथ हुई घटना सांप्रदायिकता के कारण हुई थी. निर्भया पढ़ी-लिखी महिला थी. उस घटना का गवाह भी शहरी और पढ़ा लिखा था. पुलिस ने तुरंत कार्यवाही की थी. जबकि बिलक़ीस केस में जांचकर्ता अधिकारी ही आरोपियों को बचाने में लग गए थे. निर्भया केस में साइंटिफिक सुबूत थे, जबकि बिलक़ीस के मामले में ऐसा नहीं था. यह केस जांचकर्ता अधिकारियों के कारण गेहूं में पत्थर निकलने जैसा हो गया था.

मैग्सेसे अवार्ड विजेता संदीप पाण्डेय ने कहा कि, सत्ता में बैठे लोग सरकारी कर्मचारियों का उपयोग करते हैं, जैसा कि इस केस में हुआ. इस केस में दो डॉक्टर और पांच पुलिसकर्मी को सज़ा होने से एक सन्देश गया है कि सरकार द्वारा उपयोग होने पर भी बचना इतना आसान नहीं है.

नफ़ीसा बेन ने कहा कि, यह लड़ाई सिर्फ़ बिलक़ीस की नहीं थी, बल्कि उन सभी महिलाओं की थी, जिनको लिंग, जाति और धर्म के आधार पर निशाना बनाया जाता है. इनके साथ हुई दर्दनाक घटना को एक आम आदमी समझना तो दूर एहसास भी नहीं कर सकता.

जन विकास मंच के गगन शेट्टी ने कहा, ये समय है कि हिन्दू समाज मुस्लिमों से सॉरी बोलें. मैं एक हिन्दू हूं, ये मेरे लिए मौक़ा है कि मैं सॉरी बोलूं. सॉरी… सॉरी… सॉरी…

आगे उन्होंने कहा कि, ये हम सब की ज़िम्मेदारी है कि हम सब कोशिश करें कि हर नागरिक का भरोसा ‘स्टेट’ और नेशन में बना रहे. स्टेट को खुद सामने आना चाहिए. क्या हम सुप्रीम कोर्ट जायेंगे तब सरकार मुवाअजा देगी? बिलक़ीस कभी भी सरकार के आगे हाथ नहीं फैलाएगी. सरकार को फैसला करना है कि उसको क्या करना है.

हुमा बेन जो 15 वर्ष से बिलक़ीस के साथ खड़ी हैं, भावुक होते हुए कहा कि, इस देश में कुछ लोगों को जाति, धर्म और लिंग के आधार पर दूसरे-तीसरे दर्जे का नागरिक बना दिय गया है. इस फैसले से लोगों में न्यायपालिका पर भरोसा बढ़ा है.

फ़रहा नक़वी ने कहा, भले ही ये जघन्य अपराध गुजरात में हुआ हो, लेकिन इस लड़ाई में इसी सरज़मीन के दो बाशिंदे नयना भट्ट और आर.के. शाह ने अहम भूमिका निभाई. सलाम है इन्हें. हम सभी लोगों ने इस न्याय की उम्मीद में 15 साल काटे हैं.

इस प्रेस-वार्ता में बिलक़ीस बानो और उनके पति याक़ूब भाई भी मौजूद थे. साथ ही सिविल सोसाइटी के वो सारे लोग भी मौजूद थें, जो पिछले 15 सालों से बिलक़ीस बानो को न्याय दिलाने के लिए कोशिश कर रहे थे. इस प्रेस वार्ता से पहले जस्टिस आर.ए. मेहता के हाथों इस केस के स्पेशल पब्लिक प्रासीक्यूटर आर.के. शाह और नयना भट्ट का सन्मान किया गया. शाह और भट्ट को बिलक़ीस व उसके पति के हाथों सम्मान-पत्र भी दिया गया.

बिलक़ीस बानो ने इस प्रेस-वार्ता में सिवल सोसाइटी, न्यायलय, वकील, सीबीआई सभी का आभार व्यक्त किया, जिन्होंने इस लड़ाई में साथ दिया.

बिलक़ीस ने कहा कि, मैं निर्णय से खुश हूं. डॉक्टर और पुलिस को भी सज़ा हुई. इससे और खुश हूं. न्याय पाने की इस लड़ाई में बहुत तकलीफ़ भी उठानी पड़ी. धमकियां मिलती थी. बार बार घर बदलने पड़े. सरकार ने न्याय दिलाने में किसी भी प्रकार से मदद नहीं की.

बिलक़ीस के पति याक़ूब भाई ने कहा कि, हम जहां पैदा हुए, बड़े हुए. वह राज्य छोड़ना पड़ा. हम अपने ही राज्य में सुरक्षित नहीं. न्याय के लिए मुंबई जाना पड़ा. हम सभी लोग इस फ़ैसले से खुश हैं.

मीडिया से सवाल-जवाब में बिलक़ीस ने मृत्युदंड के जवाब में कहा कि, मैं न्याय चाहती हूं, बदला नहीं. 

उनके पति ने बताया कि, वतन जाना चाहते हैं. लेकिन दिल गवारा नहीं करता. सरकार से सुरक्षा मांग चुके हैं, लेकिन अभी तक मिली नहीं. सुरक्षा कारणों से बार-बार घर बदलना पड़ता है.

बताते चलें कि 4 मई, 2017 को मुंबई हाईकोर्ट ने बिलक़ीस बानो केस में ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया. न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार पांच पुलिस और दो डॉक्टरों को सज़ा दी गई. इस मामले में हाईकोर्ट ने 11 दोषियों की सज़ा बरक़रार रखा, जबकि सीबीआई ने तीन मुख्य आरोपियों को फांसी की सज़ा की मांग की थी, जिसे अदालत ने मानने से इनकार कर दिया.

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