आख़िर एक ही वार्ड में आने वाले पटवा टोला और मियां टोली में इतना फ़र्क़ क्यों?

फ़हमिना हुसैन, TwoCircles.net

गया (बिहार) : बिहार के गया ज़िले के पटवा टोला से पटवा समाज और उसकी बढ़ती शैक्षणिक योग्यताओं को लेकर अक्सर मीडिया में ख़बरें आती रही हैं. ये वही पटवा टोला है, जो हर साल 15-20 आईआईटी इंजीनियरों को पैदा करती है.


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बिहार से होने के कारण मन में ये जिज्ञासा हुई कि देश के लिए मिसाल बन चुके पटवा टोला को एक बार जाकर देखा जाए कि आख़िर इस साल दर साल होने वाली कामयाबी का मूलमन्त्र क्या है.

अब हम पटवा टोला के पेचीदा दलीलों सी गलियों में थे. इन तंग गलियों में पावरलूम के ठक-ठक का शोर हमारी खुद की आवाज़ गुम करने के लिए काफी थी. यहां क़रीब ढ़ाई हज़ार बुनकर परिवार बमुश्किल आधा किलोमीटर के दायरे में रहते हैं.

कहा जाता है नब्बे के दशक तक यहां बच्चों को पढ़ाने का रिवाज नहीं था. बाल विवाह का प्रचलन अधिक था. लेकिन इसी दौरान आई मंदी के बाद बुनकर परिवार अपने बच्चे को पढ़ाने पर भी ध्यान देने लगा. ‘श्री दुर्गाजी पटवा जातीय सुधार समिति’ के सभापति गोपाल पटवा के मुताबिक़ यह सिलसिला 1992 में शुरु हुआ था.

वो बताते हैं कि, अब पटवा समाज में बाल विवाह पर पूरी तरह रोक लग गई है. दहेज़ पर भी पूरी तरह पाबन्दी है. लड़कों के साथ-साथ अब लड़कियों की शिक्षा पर भी ज़्यादा तवज्जो दी जा रही है, ताकि वो इस समाज का नाम रौशन करें.

स्थानीय लोगों के मुताबिक़ यहां आज भी इस समाज में पंचायत के ज़रिए ही फैसले किए जाते हैं. क़ानून का बहुत ही कम सहारा लिया जाता है. मामला चाहे ज़मीन-जायदाद का हो या फिर आपसी विवाद, सभी के लिए इस समाज में अपने पंचायत हैं. जिसे बहुत ही कड़े नियमों के तहत चलाया जाता है.

बताते चलें कि इस पटवा टोला से अब तक क़रीब 400 छात्र आईआईटी के लिए चुने जा चुके हैं. अब ये इंजीनियर्स दुनिया के अलग-अलग देशों में काम कर रहे हैं.

इसी पटवा टोला के बग़ल का मुहल्ला ‘मियां टोली’ है. ये बुनकरों का मुस्लिम बहुल मुहल्ला है. यहां टूटी सड़कें,  गन्दी बहती नालियां, सफ़ाई ने नाम पर जगह-जगह कूड़े का अंबार यहां के हालात को बख़ूबी बयान कर रहे थे. सच पूछे तो यह मुहल्ला अपने मूलभूत सुविधाओं से दूर है.

मेरे लिए ये बात हैरान करने वाली थी कि जिस पटवा टोला की तंग से तंग गली भी सफ़ाई के मामले में चकाचक दिख रही थी, वहीं मियां टोली में इतनी गंदगी? जबकि ये मियां टोली भी इसी वार्ड में पड़ता है. आख़िर एक ही वार्ड में आने वाले दो मुहल्लों में इतना फ़र्क़ क्यों?

इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए जब यहां के लोगों से बात की तो उनका स्पष्ट तौर पर कहना था कि सफ़ाई कर्मचारी यहां कम ही आते हैं. हालांकि ज़्यादातर लोगों ने वार्ड सदस्य के बारे में बात करने से परहेज़ ही किया, क्योंकि उनका कहना था कि मियां टोली के सभी लोगों का काम पटवा टोला से ही चलता है, इसलिए उनके बारे में कुछ कहा तो रोज़ी पर आफ़त आ जाएगी.

यहां यह भी स्पष्ट रहे कि पटवा जाति का इस पूरे इलाक़े में काफ़ी दबदबा है जिससे आज इस टोले में रहने वाली अगड़ी जाति के अभिभावक भी अपने बच्चों के भविष्य को लेकर इन्हीं के पास राय-मशविरा करने आते हैं. हालांकि यहां के ज़्यादातर लोगों ने मियां टोली के बारे में बात करने से परहेज़ किया. पटवा टोला के स्थानीय लोग बताते हैं कि, मियां टोली मुहल्ले में हम जाना पसंद नहीं करते.

मियां टोली में लूम चलाने वाले जाबिर अंसारी बताते हैं कि बिहार सरकार द्वारा औधोगिक क्षेत्र में बिजली दर बढ़ने के कारण लूम का काम मियां टोली में तेज़ी से मंदा होने लगी है, बल्कि आज की तारीख़ में सिर्फ़ 5-6 घर में ही लूम चलता है. सबलोग वेंडर के रूप में काम करते हैं. उन्होंने बताया कि उनके पुरे दिन की मेहनत से चार से पांच सौ रूपये तक की कमाई हो जाती है.

पढ़ाई के विषय में बात करने पर वो बताते हैं कि यहां ज़्यादातर मुस्लिम बच्चे सरकरी स्कूल में अपनी पढ़ाई मुकम्मल करते हैं. आगे की पढ़ाई और आर्थिक हालत ठीक नहीं होने के कारण बीच में अपनी पढ़ाई छोड़कर कहीं काम के सिलसिले में निकल जाते हैं.

नाम न बताने की शर्त पर मियां टोला के रहने वाले एक शख्स ने बताया कि पटवा जाति के बच्चे ग्रुप स्टडी करते हैं, जिनमें सिर्फ़ पटवा के बच्चे ही शामिल होते हैं. यहां तक कि गया और मानपुर में पटवा जाति द्वारा चलाए जा रहे कोचिंग सेन्टर में भी पटवा जाति के बच्चों को ही ज़्यादा सुविधाएं दी जाती हैं. जैसे स्कॉलरशिप के साथ-साथ आईआईटी और मेडिकल के लिए तारीख़ पहले बताई जाती है और फॉर्म भी सेन्टर वाले खुद भरते हैं, लेकिन मुस्लिम बच्चों या और किसी भी जाति वालों को तारीख़ ही बताई नहीं जाती. फॉर्म भरने में भी कोई मदद नहीं की जाती है. कई बार बच्चे खुद भरते हैं और ग़लत फॉर्म भरने से उनका फॉर्म ही रिजेक्ट हो जाता है.

इस बात को एक अन्य युवा ने नाम न उजागर करने की बात पर बताया कि पटवा लोग एक स्कूल में पढ़ने के बाद भी दूसरे जाति या मुस्लिम लोगों से दोस्ती नहीं रखते हैं.

इस इलाक़े में रहने वाले याक़ूब अंसारी ने बताया कि अगर 1990 से लेकर अब तक सिर्फ़ तीन मुस्लिम बच्चे ही मियां टोली से आईआईटी में दाखिला पा सके हैं. आज वो अच्छे पोस्ट पर नौकरी कर रहे हैं. यही कारण है कि उनके परिवार वाले अब यहां से जा चुके हैं.

वो आगे बताते हैं कि, ये बहुत दुर्भाग्य की बात है कि मुस्लिम समाज में आज भी एक दूसरे की मदद की भावना कम है. ये बात पटवा जाति में नहीं है. वो आगे इसलिए हैं क्योंकि जो भी युवा यहां से अच्छे संस्थान में जा रहे हैं, वो अपने जाति के दूसरे बच्चों को भी खींच रहे हैं. हमें पटवा जाति से इस सहयोग वाली भावना को सीखने की ज़रूरत है.

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