‘जब तक अपनी बात सिस्टम में आकर नहीं कहोगे, कभी नहीं सुनी जाएगी…’

अफ़रोज़ आलम साहिल, TwoCircles.net

मंज़िल की जुस्तजू में क्यों फिर रहा है राही


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इतना अज़ीम बन जा कि मंज़िल तुझे पुकारे

शायद यही सपना लिए रात को फ़ुरक़ान सोते थे और सुबह उठते ही अपने इस सपने को साकार करने की कोशिश में लग जाते थे. हालांकि इनके लिए ये सब इतना आसान नहीं था. लेकिन इनकी मेहनत रंग लाई और तीसरी कोशिश में इस बार यूपीएससी के सिविल सर्विसेज़ परीक्षा में 444वीं रैंक के साथ कामयाब हुए हैं.

उत्तर प्रदेश के संत कबीर ज़िले के बिगरा अव्वल गांव में जन्मे 29 साल के फ़ुरक़ान अख़्तर एक किसान परिवार से आते हैं. इनके पिता मुश्ताक अहमद गांव में ही रहकर खेती करते हैं. मां घर का काम संभालती हैं. 8 भाई-बहनों में फ़ुरक़ान का नंबर चौथा है.

फ़ुरक़ान बताते हैं कि, हमारे इलाक़े में जब भी डीएम या कोई बड़ा अधिकारी आता, तो उनकी बड़ी इज़्ज़त होती थी. लोग उन्हें बहुत इज़्ज़त के नज़र से देखते थे. मुझे लगता था कि काश मैं भी ऐसा ही बन पाता.

वो यह भी बताते थे कि बचपन में मुझे सवाल पूछने की बहुत आदत थी. जूनियर हाई स्कूल में मैं अपने टीचरों से सवाल खूब पूछता था. तो टीचर बोलते थे कि तुम कलेक्टर बनोगे क्या. पापा भी यही कहते थे. बस मेरा भी सपना बन गया कि अब तो कलेक्टर ही बनूंगा.

फ़ुरक़ान कहते हैं कि, ख़्वाब तो अभी भी आईएएस ही बनने का है. जो कि इस बार तो इस रैंक पर नहीं मिलने वाला. लेकिन अगली बार फिर से अपने इस ख़्वाब को पूरा करने की कोशिश ज़रूर करूंगा. इंशा अल्लाह अगली बार अच्छी रैंक आएगी.

फ़ुरक़ान ने पांचवी क्लास तक की पढ़ाई अपने गांव के एक मदरसा मज़हरुल उलूम बिगरामीर के मकतब से की है. बल्कि इसी गांव के नेशनल इंटर कालेज मुंडा डीहा बेग से हाई स्कूल और खैर इंटर कॉलेज, बस्ती से 12वीं क्लास तक की पढ़ाई की है. ग्रेजुएशन के लिए एएमयू गए और यहां से केमिस्ट्री ऑनर्स में बीएससी और एमसीए की डिग्री हासिल की. फिर इसके बाद दिल्ली के टीसीएस में साढ़े पांच साल से  नौकरी कर रहे हैं. इनकी सबसे ख़ास बात यही है कि इन्होंने नौकरी करते हुए ये कामयाबी हासिल की है.

फ़ुरक़ान बताते हैं कि, 2016 से मैंने तैयारी शुरू की. कहीं कोई कोचिंग ज्वाईन नहीं किया. सारी तैयारी जॉब के साथ ही हुई.

दिल्ली की भागदौड़ की ज़िन्दगी में 8-9 घंटे की जॉब, फिर दो घंटे आने-जाने में निकल जाता है. फिर थके-हारे पढ़ाई करना हर किसी के बस की बात नहीं होती. लेकिन ये कारनामा फ़ुरक़ान ही कर सकते थे.

वो बताते हैं कि, मेरे लिए नौकरी करना बहुत ज़रूरी था. लेकिन कलेक्टर बनने का ख़्वाब भी मैं कैसे मरने देता. ऐसे में मेरे पास एक ही रास्ता था कि जॉब के साथ ही मैं अपनी तैयारी करूं, जो मैंने की. मैं दिल्ली के जामिया नगर इलाक़े में रहता था. शुरू में मुझे नौकरी के लिए गुड़गांव जाना पड़ता था. अब नोएडा जाना होता है. तैयारी के नाम पर मैंने खुद से ही बचे हुए वक़्त में पढ़ाई की. बस मॉक इंटरव्यू के लिए जामिया हमदर्द और जामिया मिल्लिया इस्लामिया ज़रूर गया था.

अपनी कामयाबी के लिए फ़ुरक़ान सारा क्रेडिट अपनी मां को देना चाहते हैं. वो कहते हैं कि मेरे लिए मेरी रोल मॉडल मेरी मां हैं. मैंने पूरी ज़िन्दगी अपनी मां को कभी खाली बैठे नहीं देखा है. वो वक़्त की बहुत पाबंद हैं. उन्होंने कभी पैसे को वैल्यू नहीं दिया, उनकी नज़र में सिर्फ़ अच्छे इंसानों की क़द्र है. अम्मी की कोशिश से ही हम सब पढ़-लिख पाएं. हम भाई-बहनों की पढ़ाई में मां का रोल सबसे अहम है.

फ़ुरक़ान ने बतौर सब्जेक्ट भूगोल को लिया था. वो बताते हैं कि, ये एक ऐसा सब्जेक्ट है, जिससे आपको जेनरल स्टडीज़ के पेपर में काफ़ी फ़ायदा मिलता है. उसका अच्छा-ख़ासा सेलेबस कवर हो जाता है. और वैसे भी मैं साइंस बैकग्राउंड का स्टूडेन्ट रहा हूं तो ये मुझे अच्छे से समझ में आती थी. इसे कवर करने में कम वक़्त लगा.

फ़ुरक़ान का मानना है कि टेक्नोलॉजी को ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की ज़रूरत है, ताकि अधिकारियों का कनेक्टिवीटी लोगों से बढ़ जाए. इससे सिस्टम भी पारदर्शी होगा. यही नहीं, इससे सरकारी स्कीमों को भी ग्राउंड तक बहुत अच्छे से पहुंचाया जा सकता है. लोगों का विश्वास भी सरकार में बढ़ेगा.

वो कहते हैं कि, टेक्नोलॉजी देश के आईएएस और आईपीएस को नहीं जोड़ पा रही है. अभी भी इनके ज़्यादातर काम मैन्यूली ही हो रहे हैं. हालांकि बहुत सारी चीज़ें टेक्नोलॉजी से जुड़ गई हैं और इसका लाभ देश को मिल रहा है.

दूसरी तरफ़ वो यह भी मानते हैं कि, हमारे देश में थोड़ा वक़्त ज़रूर लगेगा, क्योंकि यहां के लोग डिजीटल रूप से बहुत अशिक्षित हैं. लेकिन मुझे उम्मीद है कि डीजिटल इंडिया का आने वाले 8-10 सालों में असर दिखेगा. वहीं सरकार नेशनल ऑप्टिकल फाईबर नेटवर्क प्रोग्राम भी चला रही है. इसमें भी सरकार काफ़ी अच्छा कर रही है. आगे आने वाले कुछ सालों में हम बहुत इम्प्रूवमेंट देखेंगे.

यूपीएससी की तैयारी करने वालों से फ़ुरक़ान कहते हैं कि, आप कहां रहते हैं, क्या करते हैं. ये बातें कोई मायने नहीं रखतीं. तमाम मैटेरियल ऑनलाईन मौजूद है. सारे टॉपर्स के लेक्चर ऑनलाईन पड़े हैं. यहां आप हर तरह की गाईडेंस पा सकते हैं. और हां, कोचिंग का भ्रम अपने दिमाग़ से निकाल दीजिए. इससे थोड़ा-बहुत फ़ायदा ज़रूर मिल सकता है, लेकिन इसके भरोसे रहकर आप आईएएस या आईपीएस नहीं बन सकते. टाईम मैनेजमेंट बेहद अहम है. ज़रूरी नहीं है कि आप पूरे दिन पढ़ें. आप कुछ ही घंटे ही पढ़ें, लेकिन वो दिल से पढ़ें. आपकी वो पढ़ाई दिखावे के लिए न हो.

फ़ुरक़ान को क्रिकेट खेलना और शायरी सुनना पसंद है. अल्लामा इक़बाल इन्हें बहुत पसंद हैं. कभी-कभी फिल्म भी देख लेते हैं. आख़िरी फिल्म ‘दंगल’ देखी थी. इस फिल्म से इन्हें प्रेरणा मिली. बल्कि उनका कहना है कि ये फिल्म मेरे मेन्स में भी काम आया. एक सवाल के जवाब में इस फिल्म के हवाले से अपनी बात रखी थी.

मुस्लिम क़ौम के नौजवानों से फ़ुरक़ान का कहना है कि, एजुकेशन को रोज़गार से जोड़कर देखना अब आप बंद कीजिए. एजुकेशन के अपने फ़ायदे हैं. एजुकेशन आपकी शख़्सियत को रिप्रेजेन्ट करता है. आप जहां भी जाएंगे, एक ऐतबार से देखे जाएंगे. पढ़-लिखकर इधर-उधर भटकने से अच्छा है कि आप सरकारी नौकरी में जाने की सोचें. आपका इस देश के सिस्टम में आना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि सिस्टम में रहकर ही आप अपने हक़, देश और लोगों के लिए काम कर पाएंगे. आप जब तक अपनी बात सिस्टम में आकर नहीं कहोगे, कभी नहीं सुनी जाएगी.

वो यह भी कहते हैं कि, पहली बात तो यह है कि मुस्लिम नौजवान किसी भी कम्पीटिशन में फ़ॉर्म ही नहीं भरतें. पहले कम से कम आप फॉर्म तो भरिए. अपना कुछ हौसला तो दिखाईए. याद रखिए कि अगर आपके अंदर अपना ख़्वाब पूरा करने का जूनून है, तो दुनिया की कोई भी ताक़त आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती है. अल्लाह आपके लिए तमाम मुश्किलों को आसान बना देगा…

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