फेल होती सरकारी शिक्षा में तेज़ी से पनपता प्राइवेट स्कूलों का व्यापार

(Photo By: Fahmina Hussain)

फ़हमिना हुसैन, TwoCircles.net

शिक्षा को समाजसुधार का सब से बड़ा माध्यम माना जाता है. लेकिन सरकारी स्कूलों के शिक्षा का ढांचा सच माने तो कमज़ोर माना गया है. हालिया कुछ सालों में जहाँ एक तरफ सरकारी स्कूलों का स्तर गिरता गया वहीं प्राइवेट स्कूल बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए समाज की जरूरत बन गए.


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सरकारी एवं गैरसरकारी आंकड़ें यह सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि शिक्षा का अधिकार कानून, मिड डे मिल योजना, निशुल्क पुस्तकें, यूनिफार्म आदि योजनाओं के परिणामस्वरूप स्कूलों में दाखिला लेने वालों की संख्या तो बढ़ी हैं लेकिन छात्रों के सीखने का स्तर बेहद ही खराब रहा. ऐसे हाल में जहाँ सरकारी शिक्षा फेल होती नज़र आ रही है वहीँ गैरसरकारी स्कूल तेज़ी से इसका फायदा उठा रहे हैं.

सरकारी 2016-17 के आंकड़ों के मुताबिक सरकारी स्कूलों में तकरीबन 15 करोड़ बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं. इन बच्चों को स्कूल में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा क़ानून, 2009 के तहत सारी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं. लेकिन इतनी बड़ी संख्या के बाद भी यदि सरकारी स्कूल की पढाई के विषय में किसी सामान्य इन्सान से पूछने पर शायद चार-पांच बिंदुओं के बाद जवाब मिलने बंद हो जायगें.

वाराणसी के रहने वाली 42 वर्षीय सत्यनाराण चौधरी जो बैंक में कार्यरत हैं. उनका मानना है तमाम सरकारी अच्छी योजनाओ के बाद भी कोई अभिभावक सरकारी स्कूल में अपने बच्चे नहीं भेजना चाहता है. क्यूंकि सरकारी शिक्षक स्कूल में पढ़ाने के साथ साथ तमाम तरह के सरकारी योजनाओ में भी उनकी ड्यूटी लगी होती है. जैसे -वोटर आईडी में नाम सुधारना-जोड़ना-हटाना, BLO का काम यहाँ तक की शौचायल निर्माण निरिक्षर तक के कार्य में शामिल कर दिया जाता है. जिससे स्कूल में टीचरों की उपस्तिथि नदारत हो जाती है. ऐसे में बच्चों की पढाई का हर्ज होता है.”

औरंगाबाद के नारायण प्रखंड स्थित प्राथमिक विद्यालय की हालत बहुत ही दयनीय है. इस विधालय में लगभग 250 से अधिक बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन इतने बच्चों को पढ़ाने के लिए सिर्फ एक और दो शिक्षक ही उपलब्ध रहते हैं.

प्राथमिक विद्यालय में जब हम पहुंचे तो वहां केवल दो शिक्षक ही मौजूद थें जिसमे एक स्कूल के प्रिंसिपल थें. वही स्कूल के बच्चे अव्यवस्थित तरीके से बैठ कक्षा में शोरशराबा करने में मशगूल थें. बच्चों ने स्कूल से मिलने वाली मध्यान भोजन नियमित रूप से मिलने की बात बताई वही बच्चों ने शिक्षक की अनियमितता के बारे में भी जानकारी दी.

स्कूल में कई बच्चे ऐसे भी थें जिनको अभी तक सरकार की तरफ से मिलाने वाली पोशाक राशि नहीं मिली है.

स्कूल में पीने की पानी के लिए बना नल पिछले दो महीनो से ख़राब पड़ा है, बच्चे पानी के लिए पास के चापाकल से पानी पीते हैं. वहीँ एलेक्ट्रसिटी के नाम पर पुरे स्कूल में दो पंखे लगे हैं. इसके अलावा शौचायल की बात करें तो पूर्णरूप से इसका निर्माण नहीं हुआ है शौचालय में जहाँ पानी की कोई सुविधा नहीं वही इसका दरवाज़ा भी टुटा पड़ा है.

स्कूल की कक्षा 4 की रिंकी भारती बताती है कि लड़कियां शौचालय का इस्तेमाल यहाँ ना के बराबर ही करती हैं. दरवाज़ा टुटा होने से उन्हें काफी असुविधा होती है.

इसी विद्यालय के कर्मचारी ने बताया कि 4 शिक्षकों की नियुक्ति की है, पर दो महिला शिक्षक छः माह के अवकास पर हैं. वहीं जो शिक्षक आते हैं, वे अक्सर देर से आते हैं और समय से पहले ही चले जाते हैं. हालांकि शिक्षकों के इस रवैये से स्कूल के प्रधानाध्यापक भी परेशान हैं.

वहीं इस पूरे मामले पर प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी से बातचीत पर उन्होंने जांच के बाद जो दोषी पाए जाएंगे उनके खिलाफ कार्रवाई की बात कही. साथ ही उन्होंने बताया की पिछले आकड़ों के आधार पर सीखने की गुणवत्ता में आई गिरावट आई है. इसकी सबसे अहम् वजह उन्होंने शिक्षकों में योग्यता की कमी बताई.

उन्होंने आगे बताया कि कई शिक्षक अभी भी शिक्षण कार्य के अनुभव से कोसों दूर हैं. लेकिन यही निजी स्कूलों में उनके शिक्षकों को गुणवत्ता में अव्वल और छात्रों को परिणामों में आगे रखता है.

देख जाए तो निजी स्कूलों की शिक्षा को जहाँ अव्वल मान लिया गया है वही समाज में निजी स्कूलों का तेज़ी से बाजारीकरण हुआ है. एडमिशन, रि-एडमिशन या एनुअल फीस के नाम पर अभिभावकों से मोटी रकम वसूली जाती है.

इतना ही नहीं प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे के अभिभावक अमित सिंह बताते हैं, “नए सेसन की शुरुआत होते ही एडमिशन/रि-एडमिशन, किताब-कॉपी व यूनिफॉर्म आदि मिला कर एक बच्चे पर कम-से-कम 15 से 20 हजार रुपये तक खर्च आ जाता है. इसके अलावा स्कूल फीस व ट्यूशन फीस जोड़ कर हर महीने का खर्च माने तो 4-5 हजार रुपये एक बच्चे पर पड़ जाता है. ऐसे में बच्चे के अच्छे भविष्य के लिए अक्सर ही घर के बजट को सँभालने में काफी मशक्कत करनी पड़ जाती है.”

निजी स्कूलों की मंहगी शिक्षा व्यवस्था के बारे में बिहार के डालमियानगर के मॉडल स्कूल के प्रिंसिपल आर. पी. साही जी का कहना है, “किसी भी पब्लिक स्कूल को चलाने के लिए आर्थिक जरूरत होती है. ऐसे में उन जरूरतों को पूरा करने के लिए फीस पर ही निर्भर होना पड़ता है. आज से 20-25 साल पहले सबसे अधिक बच्चे सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ते थे लेकिन अब बेहतर शिक्षा के लिए लोग पब्लिक स्कूलों को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा है. ऐसे में बेहतर शिक्षा के साथ साथ पब्लिक स्कूल छात्रों को एक सुनियोजित एनवॉरमेंट भी देती है.”

वर्तमान समय में प्राइवेट स्कूलों में टीचरों और छात्रों को कंप्यूटर, लैपटौप और टैबेलेट जैसी सुविधाएं मुहैया कराई जाने लगी हैं साथ ही जहाँ साफ-सुथरी परिवेश के अलावा खेलखुद भी शामिल होता है. यही वजह है की तमाम सरकारी शिक्षा योजनाओं के बाद भी समाज में लोग तमाम दिक्क्तों के बाद भी मंहगे प्राइवेट स्कूलों को ज्यादा तव्जों देते हैं.

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