हाइकोर्ट का यह फैसला तबलीग़ के जख्मों पर मरहम जैसा है !

आसमोहम्मद कैफ़ । Twocircles.net
 

“मैं उन दिनों की तक़लीफ़ को आपसे बयां नही कर सकता हूँ। मैं उन जमातियों में शामिल था,जिन्हें मरकज़ से ले जाकर क्वारींटीन किया गया था। मेरे बच्चें कई दिन तक यह जानने के लिए बेताब थे मैं कहाँ हूँ। दिल्ली के किस अस्पताल में हमें रखा गया था इसकी कोई जानकारी उन्हें नही थी। मेरी बीवी भी मेरे साथ जमात में ही थी मगर उन्हें अलग अस्पताल में रखा गया था। हर कोई हमें बुरी नज़र से देख रहा था। लोगों की निगाहों में हमारे लिए नफ़रत थी। हम तहज्जुद (आधी रात के बाद की नमाज़ ) में रोते थे और अल्लाह से दुआ करते थे कि अल्लाह हमें इस तोहमत(आरोप) से बचा लें। हम ठीक ही थे और 19 दिन बाद घर लौट आये वो बहुत मुश्किल वक़्त था। अस्पताल में हमारे साथ कोई भेदभाव नही हुआ था। जो भी कुछ था वो सड़कों पर था। निगाहें हमें चीरती थी। हमनें सब्र किया और हमें यक़ीन था,एक दिन वक़्त बदलेगा। हम घर लौट आएं। अल्लाह से दुआ करते हैं कि यह महामारी हमारे मुल्क और दुनिया से जल्द से जल्द ख़त्म हो जाएं ” रउफ कहते हैं।

58 साल के रउफ अली अब झिंझाना लौट आए हैं। वो निजामुद्दीन मरकज़ में मार्च में हुए जलसे में शामिल हुए थे। उनके साथ उनकी पत्नी भी थी। वो चालीस दिन की जमात के लिए घर से निकले थे। मरकज़ में कोरोना के शुरुवाती बवाल के बीच तबलीग़ जमात को जबरदस्त आलोचना का सामना करना पड़ा था। तमाम तरह के मीडिया ट्रायल के बाद गैर जिम्मेदार संगठन की बनाई जा रही थी। रउफ बताते हैं कि उनके साथ सैकड़ो जमातियों को अलग अलग अस्पतालों में कवारींटीन किया गया था। कुछ पॉजिटिव भी पाएं गए थे। तबलीग के बारे में पहली बार हमने लोगों में बदलाव तब देखा जब हम प्लाज़्मा देने गए। मैं वहां नही था मगर मुझे एक साथी ने बताया कि वहां डाक्टर आपस मे बात कर रहे थे कि ये अच्छे लोग है।


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48 साल के हाजी महबूब की पत्नी केथोड़ा की प्रधान है। वो  शादियों की शान कहे जाने वाले यूपी के मशहूर पापुलर बैंड के मालिक है। पिछले 10  साल से उन्होंने संगीत से नाता तोड़ लिया और पूरी तरह तबलीग को समर्पित हो गए। महबूब आलम अब विदेश जमात में जाने वाले वाले थे। बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के बाद से वो बात करते हुए रो पड़ते है। उनकी आवाज़ भारी हो जाती है और आंख भीग जाती है। महबूब कहते हैं कि मैंने तबलीग को जिया है। मैं उसके बारे में बहुत बेहतर समझता हूँ। मैं गायक था और लोग मुझे चाहते थे। तबलीग के नज़दीक आने के बाद मैंने सब छोड़ दिया। हालात मुश्किल थे। जिस तरह की भी खबरें थी वो सब झूठी थी। तबलीग़ को हम जानते हैं,हम लोग सड़क पर नज़र उठाकर नही चलते है और हम पर बोहतान(झूठा इल्जाम) लगाया गया कि तबलीग़ के लोग महिला नर्सों के सामने नंगे घूम रहे हैं। थूक रहे हैं। खांस रहे हैं। ऐसा माहौल बना दिया गया था। जैसा कोरोना सिर्फ तबलीग के लोगो के ही माध्यम से फैलाया जा रहा हो। महबूब कहते हैं कि सबसे बड़ी तक़लीफ़ विदेशी जमातियों को लेकर थी। इनके खिलाफ मुक़दमे दर्ज हुए। मेरी हर दुआ में इनके लिए आंसू थे। यह मेहमान थे। आज बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले पर बहुत अधिक तसल्ली हुई।

22 अगस्त को बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बैंच ने 29 विदेशी जमातियों के सदस्यों समेत कई व्यक्तियों के ख़िलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी। कोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा कि तबलीग़ के विदेशी जमातियों को बलि का बकरा बनाया गया। तबलीग जमात को कोरोना वायरस संक्रमण का जिम्मेदार बताकर प्रोपगेंडा चलाया गया। जस्टिस नलावड़े और जस्टिस एमजी सेवलिकर की डिविजन बैंच ने बेनिन, इंडोनेशिया, आइवरी कोस्ट ,घाना, तंजानिया के निवासियों की याचिका पर सुनवाई की थी।हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि भारत में संक्रमण के ताजे आंकड़े दिखाते है कि याचिकाकर्ताओ के ख़िलाफ ऐसे फैसले नही लिए जाने चाहिए थे और प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इनके ख़िलाफ़ प्रोपगेंडा फैलाया गया।”

सांसद असदुद्दीन ओवेशी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि मीडिया ने तबलीग़ जमात को बलि का बकरा बनाया ताकि बीजीपी की आलोचना से बचा जा सके, इस प्रोपेगेंडा की वज़ह से देशभर में मुस्लिमों को नफ़रत और हिंसा का शिकार होना पड़ा।

मुजफ्फरनगर के मंसूरपुर के एक युवक मुस्तक़ीम बताते हैं कि वो उन दिनों अपने खेत से लौट रहे थे और उन्होंने अपने पड़ोसियों को बात करते हुए सुना था कि “इन लोगो’ से दूर रहना ये कोरोना फैला रहे हैं। मुस्तकीम कहते हैं कि ‘इन लोगो ‘ से उनका क्या मतलब था मैं अच्छी तरह समझ रहा था।

मेरठ के पूर्व मंत्री कुलदीप उज्जवल के साथ उस दौरान एक अजीब घटना हुई थी एक व्यक्ति को उन्होंने मुहँ पर कपड़ा लगाने के लिए कहा था उसने जवाब दिया था कि “मैं तो हिन्दू हूँ ,मुसलमान नही”। कुलदीप कहते हैं अब शायद उन्हें भी जवाब मिल गया होगा। देश भर में कोरोना के मामले बताते हैं कि इसका किसी धर्म से कोई संबंध नही है। यह महामारी है। समस्या से ध्यान हटाने के लिए एक कहानी बनाई गई थी जो अब एक्सपोज हो गई है। समय अपने आप सारे प्रश्नों के उत्तर दे देता है। बीमारी हिन्दू मुसलमान नही होती है।

मार्च में दिल्ली के निज़ामुद्दीन मरकज़ में एक इज्तिमा के बाद चर्चा में आएं मरकज़ पर चौतरफ़ा बदनामी का षड्यंत्र फैलाया गया था। इसके बाद देश भर लगभग 916 विदेशी जमाती पकड़ लिए गए और इन्हें जेल भेज दिया गया। उत्तर प्रदेश में ही ऐसे जमातियों की संख्या 300 से ज्यादा थी। जिनमे से 57 सिर्फ सहारनपुर में थे। अब यह 57 जमाती भी रिहा हो चुके हैं। इससे पहले नूह हरियाणा की अदालत से भी 22 विदेशी जमातियों को रिहा किया गया।सहारनपुर के विदेशी जमातियों का केस लड़ने वाले जानिसार एडवोकेट कहते हैं” जाहिर है इस सबके बाद वो लौटकर इस कार्रवाई के बारे में सकारात्मक विचार नही रखेंगे,लेकिन न्याय प्रकिया के प्रति निश्चित होंगे अदालत ने उनके साथ इंसाफ किया”।

इन जमातियों में मलेशिया, फिलीपींस, किर्गिस्तान, नेपाल, सऊदी अरब ,सूडान ,थाईलैंड और इजराइल के भी जमाती थे। जाँनिसार कहते हैं निश्चित तौर पर इन सभी मुल्कों की सरकारों को इसकी जानकारी थीं और उनके राजदूत इनसे मिलने आते रहे थे। यह एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले है। एक समय उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने तो यहां तक कहा था कि जमातियों के विरुद्ध हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। जाहिर है बॉम्बे हाईकोर्ट के टिप्पणी के बाद ऐसी बहुत सी टिप्पणी अब नही आएगी।

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