बीस साल के लड़के का सत्याग्रह

सिद्धांत मोहन, TwoCircles.net

वाराणसी: दिन भर पीठ पर एक बैकपैक टांगे, पुराने मैले कपड़े पहने, एक साइकिल के सहारे बनारस के मंडलीय अस्पतालों के चक्कर काटते अमन को बनारस में कम लोग ही जानते हैं. अमन यादव, यही नाम है बनारस में रहने वाले इस शख्स का.

उम्र बीस साल और समाजशास्त्र से बी.ए. में सेकण्ड ईयर का छात्र अमन एक बड़ी मुहिम पर निकला है. पहले की बात और थी लेकिन अब सड़क पर कोई भी गरीब, घायल, चोटिल या बीमार यूं ही लावारिस पड़ा नहीं दिखता है. जिसके पास पैसे नहीं हैं, अब उसे भी इलाज मुहैया होने लगा है. उन्हें इलाज मुहैया कराते हैं, अमन यादव.

Aman Profile for Lead and Feature

अमन यादव

सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का अपना ही एक हाल है. वे सस्ती हैं लेकिन फिर भी आमजन की पहुंच से काफी दूर हैं. सरकारी स्वास्थ्य कर्मचारियों के रवैये और उनकी कार्यप्रणाली किसी मरीज के मन में और भी रोष भर देती है. महात्मा गांधी ने भले ही छुआछूत के उन्मूलन और जातीय बराबरी के लिए लड़ाई लड़ी थी, लेकिन इसे मानने में हरगिज़ संदेह नहीं करना होगा कि यह अभी भी अपने समाज में बने हुए हैं. ऐसे में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से दूर जो अछूत मरीज हैं, जिन्हें अस्पतालों में बिस्तर तक नहीं मिलता, अमन उनकी देखभाल करता है.

अमन अपनी कहानी खुद बताते हुए कहते हैं, ‘अब मुझे यह काम करते-करते चार साल से ऊपर हो गए हैं. जब बनारस में कचहरी में आतंकी बम विस्फोट हुआ था उस समय मेरे इस काम की नींव पड़ी. धमाके के बाद घायलों को इधर-उधर ले जाया जा रहा था. मंडलीय अस्पताल में भी घायल आए, लेकिन मैंने देखा कि अस्पताल में काम करने वाले कंपाउंडर तक मानव अंगों को उठाने में उबका रहे थे. वकीलों को छोड़ दें तो उस धमाके में घायल हुए चाय वालों और फेरी वालों की ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा था. वे अलग पड़े कराह रहे थे. मैंने उनकी मदद की. मरीजों के गिरे-पड़े अंग उठाए. उस दिन यह सब काम करने के लिए घर पर बहुत मार पड़ी थी, लेकिन तब तक यह सफ़र शुरू हो चुका था.’

लावारिस रोगियों की मदद के लिए महज़ 20 साल के लड़के का जुनून देखना बड़ी बात है. अमन यादव अभी भी एक किशोर ही है. उसे अपनी राह बनाने में जितना संघर्ष करना पड़ रहा है, वह संघर्ष काफी ज्यादा है. उस संघर्ष के बरअक्स अमन की उपलब्धि काफी ज्यादा है. बकौल अमन, यह काम शुरू करने के बाद उसे घर में बहुत बार मार पड़ी थी. एक दफा उसके पिता ने लगभग 25 दिनों तक उसके पैर में जंजीर बांधकर उसे घर में कैद रखा था, यह सोचकर कि शायद इसी तरीके से अमन का दिमाग पढ़ाई की ओर लौट आए. लेकिन अमन का दिमाग नहीं लौटना था तो नहीं लौटा. 25 दिनों बाद बेड़ियां खुलते ही अमन यादव फिर से फरार हो गया. ऐसे में अमन यादव के पिता का भी कोई दोष नहीं है. अमन एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से आता है. ऐसे परिवारों में यदि रोज़ पैसे न मिलें तो एक वक़्त का चूल्हा न जलने तक की नौबत आ जाती है. अमन के पिता को मुंह का कैंसर है. अमन कहते हैं, ‘पापा का कहना भी सही है. घर में बहुत सारी चीजें हैं, बातें हैं.

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मुझे पढ़ाई के साथ-साथ थोड़ा बहुत कमाने के बारे में सोचना चाहिए. लेकिन अब मुझे खुद इसका उत्तर नहीं पता कि मैं इतना बेहाथ क्यों हूं? एक दिन भी किसी मरीज की सेवा करने का अवसर नहीं मिलता तो मैं परेशान हो जाता हूं. मुझे लगता कुछ दिमागी है.’

अमन की पहचान सिर्फ इतनी नहीं है कि वे कम उम्र लेकिन बड़े कद के समाजसेवक हैं, अमन को ‘गंगा-पुत्र’ या ‘गंगा सेवक’ के नाम से भी जाना जाता है. तीन साल पहले शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के मार्गदर्शन में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गंगा को लेकर एक मुहिम चलाई थी. उद्देश्य था कि गंगा के नाम पर योजनाएं चलाने वाली केंद्र सरकार को गंगा के यथार्थ से परिचित कराना. बड़ी संख्या में जनता ने भी इस मुहिम को समर्थन दिया था. इसी वक़्त अमन यादव स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के सम्पर्क में आया. गंगा अभियान में अमन की भागीदारी से खुश होकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अमन को एक साइकिल दिलाई, एक दफ़ा साइकिल चोरी हो जाने के बाद अमन को फिर से साइकिल मिली. अविमुक्तेश्वरानंद के साथ अमन ने बनारस से दिल्ली के जंतर-मंतर व राजघाट तक की यात्रा की. गंगा के मसलों को समझने में श्रम किया और गंगा अभियान से जुड़ गया.

अमन बताते हैं, ‘मुझे गरीब लोगों की सेवा करने वाले की तरह बेहद कम लोग जानते हैं. अधिकतर लोग अभी भी मुझे गंगा सेवक ही मानते हैं. स्वामीजी के साथ रहता हूं तो लोगों को भ्रम होता है कि मैं किसी पार्टी का आदमी हूं. लेकिन अपने काम में मैं राजनीति के दखल से बिलकुल दूर रहता हूं.’

अब रोजनामचा ही इन रोगियों के लिए ही नहीं, लगभग अपना पूरा समय इस मुहिम में अमन ने दे दिया है. कुछ ही दिनों पहले बीते अपने जन्मदिन के दिन अमन ने कुछेक लोगों को अस्पताल में बुलाकर उनसे मरीजों में बिस्कुट, कपड़े व दूसरे ज़रूरी सामान बंटवाए. नगर के तमाम रंगकर्मियों को बुलाकर स्वतंत्रता दिवस के दिन अमन ने मरीजों के बीच मिठाईयां बंटवाई.

अमन के पिट्ठू बैग में एक बेटाडीन की बोतल, सर्जिकल रूई, बैंडेज पट्टी, मास्क, दस्ताने, डिटौल और ऐसी कई सारी ज़रूरी चीज़ें पड़ी रहती हैं. अमन कहते हैं, ‘बस पिछले चार सालों के दौरान मैंने इतने तरीके के घाव देख लिए हैं, मुझे नहीं लगता कि किसी डॉक्टर ने भी देखा होगा. क्योंकि ऐसे गरीब और गंभीर मरीज अस्पतालों में नहीं आ पाते.’ बनारस में दवा व्यवसायी जितेन्द्र तिवारी कहते हैं, ‘हमने अमन को ऐसे मरीजों का इलाज करते हुए देखा है, जिन्हें डॉक्टर भी छूने से बचता है. जिन्हें अस्पतालों के अन्दर तक नहीं लिया जाता, वे अमन के भरोसे हैं.’

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यह काम करने की अपनी दिक्कतें हैं. दवाइयां और सर्जरी के मामूली सामान खास तौर पर महंगे होते हैं. यह खर्च उठाना एक 20 साल के बेरोजगार लड़के के लिए मुश्किल है. अमन कहते हैं, ‘जब पहले स्वामीजी से महीने में कुछ दो-तीन हजार रूपए मिल जाते थे. उससे कुछ खर्च निकल आता था. फिर इस काम के कारण मैंने स्वामीजी के यहां समय देना कम कर दिया. अब भी मैं स्वामीजी के यहां जाता हूं लेकिन अब उनसे पैसे नहीं लेता क्योंकि अभी मेरा योगदान उतना नहीं है.’ अमन आगे कहते हैं, ‘शुरू में दिक्कत होती थी. लेकिन यह काम करते-करते अधिकतर दवा व्यवसाइयों को दोस्त बना लिया. पैसे तो नहीं ही लेता हूं लेकिन व्यवसायी रूई, कॉटन और दूसरी जरूरी चीजों का बण्डल बिना पैसे के दे देते हैं, उनसे काम चल जाता है. कुछ लोग हैं जो दूसरे जरूरी सामान – जैसे बिस्कुट, नमकीन, ग्लूकोज़ – दे देते हैं. लोगों से उनके पुराने कपड़े मांग लेता हूं. वह भी मरीजों के बीच बांटने में इस्तेमाल हो जाता है. लेकिन इधर-उधर से इंतजाम करके कोशिश करता हूं कि मेरी गाड़ी न रुके.’

इस ख़ास मुहिम को कहीं समर्थन नहीं मिलता है. मंडलीय अस्पताल के निरीह मरीजों के लिए यदि अमन कोई फ़रिश्ता हैं तो अस्पताल के कर्मचारियों और डॉक्टरों के आंखों में अमन चुभता है. हो भी क्यों न, अस्पतालों के अहातों से लेकर सड़क के किनारों तक अमन एक पैरलल स्वास्थ्य सेवा मुहैया करा रहा है, वह भी निःशुल्क. कई बार चीफ मेडिकल सुपरीटेंडेंट से लेकर नर्स व वार्ड ब्वाय तक से अमन मरीजों के अधिकारों के लिए भीड़ चुका है. इस बारे में बात करते हुए अमन कहते हैं, ‘अस्पताल के गलियारे में कोई मरीज पड़ा है तो नर्स के लिए उसका कोई महत्त्व नहीं है. उसकी मरहम-पट्टी करने या ड्रिप बदलने के लिए जब मैं उन्हें टोक देता हूं तो कई बार वे मेरे ऊपर भड़क जाते हैं. नर्सें मुझसे पूछती हैं कि क्या मैंने इन मरीजों का ठेका लेकर रखा है? मैं कई बार ‘हां’ कहना चाहता हूं.’

स्थानीय स्तर पर अमन का राजनीतिक इस्तेमाल करने की भयानक कोशिशें हो रही हैं. भाजपा, सपा, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने अमन का प्रचार के रूप इस्तेमाल करने की कोई कसर नहीं छोड़ी है. अमन एक घटना का ज़िक्र करते हैं, ‘एक बार छात्र नेताओं पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया था. उन्हें देखने के लिए भाजपा के तत्कालीन नगर अध्यक्ष और महानगर अध्यक्ष आए थे. मैं उन्हें अन्य रोगियों के वार्ड में स्थिति दिखाने ले गया और कहा कि साहब, कुछ करिए कि इनकी व्यवस्था में सुधार हो. उन्हें उलटी आने लगी. बाहर आए और कहा कि कुछ करते हैं. साल भर हो गया है लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया. सभी यही करते हैं, मेरे साथ दौरे करते हैं. फोटो खिंचाते हैं और आश्वासन देकर अपने-अपने रास्तों की ओर निकल जाते हैं.’

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मुलाक़ात के बीच एक दिन अमन ने हंसते हुए कहा, ‘आज पापा हमको घर से निकाल दिए हैं. रात में वापस ले लेंगे. यह रोज़ का हो गया है.’ अमन यादव बचपन में ही पोलियो का शिकार हो गया था. आज भी उसकी चाल में थोड़ा पोलियो बचा हुआ है. अमन की ज़िद ने उसका बचपन काफी पहले ही यौवन में बदल दिया है नहीं तो बीस साल की उम्र में बड़े घरों के बच्चे टीवी सेट के सामने बैठकर प्ले-स्टेशन सरीखी आरामतलबी किया करते हैं. अमन से जब हमने पूछा कि उनके इस काम का भविष्य क्या है? अमन ने परेशान होते हुए कहा, ‘भविष्य के बारे में तो कभी सोचा नहीं. लेकिन शायद जब हर तबके के लोग सरकारी अस्पताल में मुफ्त इलाज पा सकेंगे, यही भविष्य होगा.’

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