शाह आलम : साइकिल से ढूंढी चम्बल में आज़ादी की कहानी

अफ़रोज़ आलम साहिल, TwoCircles.net

बस्ती/दिल्ली: एक शख़्स बीहड़ में आज़ादी के निशान तलाशने निकला था. सफ़र साइकिल से पूरा किया जाना था और वह पूरा हुआ. इस 2000 किलोमीटर के खोजी सफ़र को पूरा करने में लगे 56 दिन.

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के नकहा गांव में जन्मे 34 साल के शाह आलम उस इतिहास को खंगाल रहे थे, जिसे हम भूल चुके हैं. काकोरी कांड सभी को याद है, जिसमें चार क्रांतिवीरों की शहादत हुई थी. लेकिन उससे पहले काकोरी एक्शन करने वाले साथियों के 35 साथी चम्बल घाटी में शहीद हो गये थे. सरेआम इन क्रातिवीरों को ज़हर देकर मार दिया गया, नहीं तो आज़ादी का इतिहास कुछ और होता.


Shah Alam
अपनी साइकिल के साथ यात्रा पर शाह आलम

हैरानी की बात यह है कि इतिहास में इनका ज़िक्र बड़ी मुश्किल से मिलता है. शाह आलम ने इस मुश्किल इतिहास को ढ़ूंढ़ निकालने का इरादा किया और ज़रिया बनी उनकी पुरानी साईकिल. अपनी साइकिल लेकर शाह आलम निकल पड़े बीहड़ों में आज़ादी के इन खो चुके निशानों को फिर से तलाशने.

बकौल शाह आलम, अभी उत्तर भारत के अपने दौर में सबसे बड़े गुप्त क्रांतिकारी दल ‘मातृवेदी’ का शताब्दी वर्ष चल रहा है, जिसके संस्थापक जंग-ए-आज़ादी के महानायक गेंदालाल दीक्षित थे. गेंदालाल ने चम्बल और यमुना पट्टी के बीहड़ों में रह रहे डाकुओं को अपने साथ जोड़ा था. उनका मक़सद था कि एक साथ संयुक्त प्रांत का तख्ता-पलट कर दिया जाए, लेकिन इसकी भनक अंग्रेज़ी सल्तनत को मिल गई और उसने भेदिए के मार्फ़त इन क्रांतिकारियों के खाने में ज़हर मिलवा दिया और उसी दौरान हमला बोल दिया गया, जिससे 35 क्रांतिकारी शहीद हो गए और बाकी बचे क्रांतिकारियों को घायल अवस्था में गिरफ़्तार कर लिया गया. यह घटना भिंड जिले के मेहौना के बीहड़ों की है. इतनी बड़ी तादाद में शहादत के बाद भी ‘मातृवेदी’ के क्रांतिकारियों की याद को संरक्षित नहीं किया गया.

शाह आलम ‘मातृवेदी’ के इन्हीं क्रांतिकारियों की यादों को सहेजकर एक फिल्म व किताब की शक्ल देने की कोशिश में जुटे हुए हैं.

शाह आलम चम्बल के बीहड़ों में अपनी इस साइकिल यात्रा के दौरान मौजूदा स्थिति से भी रूबरू हुए. हमसे बातचीत में उन्होंने बताया, ‘मेरी यह यात्रा शुरू तो ‘मातृवेदी’ के क्रांतिकारियों की यादों को सहेजने को लेकर थी लेकिन इस खोज के दौरान मैं चम्बल में 1857 के नायकों के दस्तावेज़ों से भी रूबरू हुआ. दरअसल, 1857 की जंग-ए-आज़ादी में जब पूरे देश में क्रांति के केन्द्र अंग्रेज़ों द्वारा ध्वस्त कर दिए गए थे, तब हमारे पुरखे बीहड़ों से जंग-ए-आज़ादी की मुहिम को लगातार संचालित करते रहे. इसमें खासतौर पर ताज खान मेवाती, मुराद अली खान, शेर अली नुरानी, बापू बाबा भंगी, जंगली मंगली वाल्मिकी, चौधरी राम प्रसाद आदि के नाम लिए जा सकते हैं.’

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अपनी इस यात्रा के दौरान जब शाह आलम राम प्रसाद बिस्मिल के पुश्तैनी गांव मुरैना जिले के बरबाई पहुंचे तो राम प्रसाद बिस्मिल के परिवार के विजेन्द्र सिंह तोमर ने बताया कि उनके परिवार को सरकार ने जो 37 बीघा ज़मीन दी थी, उस पर अब दबंगों का क़ब्ज़ा है. जिलाधिकारी से लेकर मुख्यमंत्री तक सबसे वे गुहार लगा चुके हैं, लेकिन आज तक हुआ कुछ नहीं. हैरानी की बात यह राम बिस्मिल के नाम पर 25 साल पूर्व बनी लाईब्रेरी में आज तक एक भी किताब नहीं पहुंच सकी है. लाईब्रेरी अब खंडहर में तब्दील हो चुकी है. उसकी छत गिर चुकी है.

लेकिन शाह आलम को इस बात की खुशी है कि उनके ही ज़रिए ही यह बात सामने आने के बाद लोग फिर से जागरूक हुए हैं और अब वह लाईब्रेरी फिर से बनने जा रही है. इसके लिए इस बार शासन-प्रशासन ने खुद चंदा किया है, जिसमें सांसद ने 10 लाख रूपये, विधायक ने दो लाख दिए है. इस लाईब्रेरी की कुल लागत 24 लाख रूपये आने की संभावना है.

शाह आलम यह भी बताते हैं कि प्रशासन बस बिल्डिंग का निर्माण कराएगा. बाक़ी किताबों, जेल डायरी, उस समय के तार, मुकदमों की कार्रवाई, साथी क्रांतिकारियों की तस्वीरें, दस्तावेज़ी फिल्में आदि लाईब्रेरी में पहुंचाने का काम खुद शाह आलम करेंगे.

शाह आलम इस यात्रा के दौरान बीहड़ के गांवों से रूबरू हुए. वे बताते हैं कि गांव में लोग आज भी आदिम युग में जी रहे हैं. बेहाल सड़कें और बदहाल लोग आपको बीहड़ में हर तरफ़ देखने को मिल जाएंगे. इन गांवों में आज भी बिजली के खंभे भी नहीं पहुंच सके हैं. कई ऐसे गांव मिले, जिसके पूरे गांव में एक भी शौचालय नहीं है. अधिकतर गांवों में स्कूल भी नहीं है. बच्चे स्कूल और शिक्षा क्या होता है, इससे भी अनजान हैं. कई गांवों में पानी की सुविधा भी नहीं है. यहां के लोग चम्बल नदी का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं. हालात ऐसे हैं कि इन बीहड़ों से लाखों परिवार पलायन कर चुके हैं, लेकिन इस पलायन पर कहीं कोई चर्चा नहीं है.

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दरअसल, शाह आलम 1999 से सामाजिक सरोकारी कार्यों में सक्रिय हैं. पिछले एक दशक से ‘आवाम का सिनेमा’ के मार्फ़त देश के अलग-अलग हिस्सों में भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन से नई पीढ़ी को परिचित करा रहे हैं. शाह आलम बताते हैं कि जन्म भले बस्ती में हुआ लेकिन रहना उनका हमेशा अयोध्या स्थित राम जानकी मंदिर में हुआ है. फिलहाल शाह आलम आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले, लेकिन गुमनामी के अंधेरे में खो हो चुके पुरखा लड़ाकों को खोज-खोज कर अवाम के सामने लाने का काम कर रहे हैं.

शाह आलम बताते हैं कि इस साईकिल यात्रा के बाद अब वे इन दिनों एक किताब लिखने में व्यस्त हैं, जिसमें वे पूरी दुनिया को बीहड़ के ज़मीनी हक़ीक़त से परिचित कराएंगे. इसके अलावा उनकी योजना चम्बल के अलग-अलग मुद्दों पर वीडियो दस्तावेज बनाने की भी है.


Chambal
राबिया

शाह आलम की उपलब्धि बस यह नहीं कि वे आजादी के इतिहास में एक नए अध्याय की खोज कर रहे हैं. उनकी यात्रा से कई लोगों ने शाह आलम से मदद भी पायी है. मूलतः रमजान के दिनों में की गयी इस यात्रा के दौरान शाह आलम जिन गरीब लोगों से मिले, उन लोगों के बारे में दुनिया ने सोशल मीडिया के माध्यम से जाना. कई लोग ऐसे लोगों की मदद में सामने आए. इस सन्दर्भ में राबिया का उदाहरण महत्त्वपूर्ण है, जिनके घर में न सहरी के लिए कुछ था और न इफ्तार के लिए. लेकिन शाह आलम ने जब उनके बारे में लोगों को परिचित कराया तो राबिया की भी मदद हुई. [पढ़ें – चम्बल डायरी: ‘घर में न सहरी के लिए कुछ है, न इफ़्तार के लिए’]

शाह आलम का यह हौसला क़ाबिले-तारीफ़ है. वो जिस काम में जुटे थे, उसमें यक़ीनन उन्हें दुनियावी तौर पर कोई फ़ायदा नहीं होने जा रहा है. यह लड़ाई तो दरअसल सिर्फ़ एक गुमनाम इतिहास को सम्मानजनक जगह दिलाने की है. शाह आलम का यह हौसला ही है कि वो बिना सरकारी या गैर-सरकारी मदद के बीहड़ के खाक छानने निकल पड़े थे. उम्मीद की जानी चाहिए कि इस मिशन की कामयाबी के साथ इसी राह से होकर गुज़रने वाली कुछ नई मंज़िलें उनका इंतज़ार कर रही होंगी.

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