मौलाना अशरफ अली थानवी की मज़ार पर चंदे की सियासत

आस मोहम्मद कैफ, TwoCircles.net

थानाभवन (शामली): यहां के मशहूर और बेहद सम्मानित इस्लामिक स्कॉलर और मुसलमानों के घर-घर पढ़ी जाने वाली किताब ‘बेहिश्त जेवर’ के लेखक मौलाना अशरफ अली थानवी के नाम पर चंदेबाजी की लड़ाई ने क़ौम को शर्मिंदा कर दिया है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वलियो की माटी कहलायी जाने वाली देवबंद बेल्ट में आए दिन एक नई बात सुनने को मिल रही है. अब ताजा मामला थानाभवन का है, जहां मरहूम मौलाना अशरफ अली थानवी की कब्र पर मुसलमानों के ही दो गुटो में सियासत की जा रही है और इसकी वजह उनके नाम पर मिलने वाली चंदे की रकम है.

मौलाना अशरफ अली थानवी

इस्लामिक विद्वान मौलाना अशरफ अली थानवी को उनके इंतक़ाल के बाद थानाभवन में ही दफन किया गया था. उनके अपने शागिर्द मौलाना जहूर हसन को दी शिक्षा के अनुसार उनकी कब्र को आमजन जैसी सामान्य रखा गया है. इस पर कोई मज़ार इमारत की तामीर नही है. मरहूम मौलाना का रुतबा पूरी दुनिया जानती है इसलिए पूरी दुनिया से यहां जायरीन उनकी कब्र पर फातिहा पढ़ने आते हैं. मौलाना की कब्र व खानकाह की देखभाल की जिम्मेदारी उनके शिष्य मौलाना जहूर हसन के बेटे मौलाना नजमुल हसन निभा रहे हैं, वो खानकाह के अकेले इंतजामिया हैं. खानकाह के प्रवेश के ठीक सामने एक स्थानीय मौलाना इस्माइल ने एक मदरसे की स्थापना कर दी. मदरसे का रास्ता खानकाह के ठीक सामने पड़ता है और खानकाह आने वाले लोग मदरसे में जाकर चंदा देने लगे. स्थानीय लोगों के मुताबिक मौलाना अशरफ अली थानवी साहब ने जिंदगी में अपने नाम पर चंदाउगाही की सख्त मनाही की थी. कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यह लोग बाहर जाकर उनके नाम पर चंदा लेने लगे. यह सबकुछ खानकाह के मुतवल्ली मौलाना नजम को पसंद नही आया और उन्होंने खानकाह के मदरसे की तरफ खुलने वाला दरवाजा बंदकर दूसरी तरफ इमारत बनाने की शुरुआत कर दी. बस यहीं से दोनों गुटों मे टकराव हो गया.

मौलाना अशरफ अली थानवी

दोनों एक दूसरे के खिलाफ अदालत और वक़्फ़ बोर्ड में चले गए. दोनों ने अपने-अपने इल्ज़ाम लगाये. चंदे के झगडे को सियासी रंग देने की कवायद की. पुलिस का दखल भी बढ़ा और कई बार आपस में तनातनी हुई. दरवाजे पर अदालत ने स्टे दे दिया तो दूसरे पक्ष ने इमारत के निर्माण पर रोक लगवा दी. अब कानून व्यवस्था का हवाला देकर पुलिस कुछ करने नहीं दे रही. उक्त प्रकरण को लेकर बहुत बदनामी हो रही है और समाज मे यह संदेश जा रहा है जिस इंसान ने सारी जिंदगी दौलत को ठोकर पर रखा हो, उसी के रास्ते पर चलने का दावा करने वाले लोग दौलत के लिए एक दूसरे को ठोकर पर रख रहे हैं.

कौन थे मौलाना अशरफ अली थानवी

दुनिया भर के मुस्लिमों में दीनी तालीम की अलख जगाने वाले थानाभवन की माटी में जन्मे मौलाना अशरफ अली थानवी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. उन्होंने 900 से अधिक किताबें लिखीं. मुस्लिमों को इल्म से जोड़ा. मदरसों में पढ़ाई जाने वाली उनकी लिखी पुस्तकों का कोई तोड़ नहीं.

मौलाना, कस्बे के शेख फारूखी अब्दुल हक के परिवार में साल 1863 में पैदा हुए थे. इनके दो बेटे हुए. एक अशरफ अली व दूसरे का नाम अकबर अली था. अशरफ अली ने दीनी तालीम हासिल की, जबकि अकबर अली ने अंग्रेजी की तालीम ली. अशरफ अली ने मेरठ में रहते हुए कुरान-ए-करीम की पढ़ाई की और उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए देवबंद चले गए. देवबंद में मदरसा दारुल उलूम कायम होने के बाद कोर्स पूरा करने वाले तालिब-ए-इल्म की पहली जमात में मौलाना अशरफ अली थानवी भी एक थे. देवबंद से मौलवी की पढ़ाई पूरी करने के बाद कानपुर के एक मदरसे में बच्चों को तालीम देने चले गए. बताते हैं कि अशरफ अली को बचपन से ही किताबें लिखने का शौक था. उन्होंने पढ़ते-पढ़ते कई किताबें भी लिख डालीं. उन्होंने अपनी पहली दीनी किताब 18 वर्ष की उम्र में ही लिख दी थी.

मौलाना ने वैसे तो 900 के करीब दीनी किताबें लिखीं. लेकिन वहिश्ती जेवर, कुरान की तफतीश और हयातुल मुस्लिमीन सहित कई किताबें दुनिया भर के मदरसों में पढ़ाई जाती हैं और समाज को दीनी राह दिखाती हैं. कस्बे के बच्चों को बेहतर तालीम देने के लिए मौलाना ने अपने उस्ताद हाजी इमदादुल्ला के नाम से मदरसा इमदादिया उलूम की स्थापना 1301 हिजरी में की थी, जो आज खानख्वाह के नाम से मशहूर है. इनमें बच्चों के लिए तालिब-ए-इल्म की व्यवस्था है. मौलाना ने अपनी सारी जमीन इस मदरसे के नाम कर दी थी. इसकी आमदनी से ही मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों का खर्च चलता है. मौत से पहले मौलाना ने अपनी मजार कच्ची रखने की इच्छा की थी, जो आज भी कच्ची ही है. मौलाना थानवी की मृत्यु 1943 में हुई. मौलाना थानवी द्वारा स्थापित मदरसे के संचालक मौलवी नज्म बताते हैं कि मौलाना थानवी ने मुस्लिम समाज को शिक्षित करने की दिशा में अहम प्रयास किए. उनके प्रयासों का असर पूरे विश्व पर देखने को मिल रहा है. मौलवी लियाकत बताते हैं कि मौलाना थानवी न केवल दीनी बल्कि दुनियावी तालीम के भी पैरोकार थे.

उनके द्वारा लिखी गई हयातुल्ला मुस्लिमीन, बहिस्ती जेवर व कुरान की तफ्तीर दुनिया की सभी जबानों में अनूदित हैं. उनकी किताबों पर पांच सौ से अधिक शोध हो चुके हैं.

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