नोटबंदी : गरीबों को प्रभावित करने वाला फैसला अच्छा कैसे हो सकता है – प्रभात पटनायक से बातचीत

नोटबंदी : गरीबों को प्रभावित करने वाला फैसला अच्छा कैसे हो सकता है – प्रभात पटनायक से बातचीत

चेतना त्रिवेदी / रवि प्रकाश

आपके अनुसार काला धन क्या है और हमें इसको नियंत्रित करने की आवश्यकता क्यों है?

बुनियादी रूप से ‘काला धन’ शब्द गलत है. हमारी अर्थव्यवस्था में कुछ ऐसी गतिविधियां हैं, जो मिलकर एक ‘काली अर्थव्यवस्था’ (Black Economy) का निर्माण करती हैं. ये गतिविधियां अघोषित गतिविधियां हैं, इनके अघोषित होने के पीछे मूलतः दो कारण हैं. एक तो ये गैरक़ानूनी हैं और ये गैरक़ानूनी इसलिए हैं कि ये टैक्स देने से बचना चाहते हैं. इस तरह की गतिविधियां पर्याप्त मात्रा में चल रही हैं, जो आय और रोजगार पैदा करती हैं, जिसमें आमजन भी लगे हुए हैं. इन गतिवधियों का कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं है, इसलिए इन्हें काली अर्थव्यवस्था कहा जाता है. इस काली अर्थव्यवस्था में सफ़ेद अर्थव्यवस्था की तरह ही पैसा लगा हुआ है, जिसके बारे में अर्थशाश्त्री कहेंगे कि यह पैसा लेन-देन के लिए प्रयोग में लाया जाता है. यह जो पैसा लेन-देन की व्यावहारिक प्रक्रियाओं में इस्तेमाल में लाया जाता है, उसे सम्पत्ति की तरह देखा जाता है. अब यहां यह बात स्पष्ट है कि इस अर्थव्यवस्था में पैसे की मांग है और उसे पूरा करने के लिए जो पैसा रखा हुआ है, वह निश्चय ही इस ब्लैक इकॉनमी का हिस्सा है. बिल्कुल उसी तरह जैसे सफ़ेद अर्थव्यस्था में होता है. अब, ज्यादातर लोग यह सोचते हैं कि काली अर्थव्यवस्था ही काला धन है क्योंकि वहां पैसे का भण्डार है. काली अर्थव्यवस्था में जो गतिविधियां हैं और उससे जो आय होती है वह निरंतर गतिशील होती है. तो, जब हम इस काली अर्थव्यवस्था के बारे में बात करते हैं तो वास्तविक रूप से हम उस बहाव या गति के बारे में बात कर रहे होते हैं जो काली अर्थव्यवस्था की जीडीपी होती है. लेकिन जो गलती सरकार कर रही है और दूसरे भी करते चले आ रहे हैं, कि वे यह सोचते हैं कि काली अर्थव्यवस्था का मतलब, कहीं एक जगह पैसे का भण्डार होना है.

[Image Courtesy – Alchetron]

किसी देश को इस तरह के (विमुद्रीकरण) फैसले लेने की आवश्यकता क्यों पड़ती है, इसकी व्यावहारिक परिणतियाँ क्या हैं?

नहीं, देश को इस तरह का कोई भी निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं है. क्योंकि इस तरह के निर्णयों से वे हासिल तो कुछ नहीं कर रहे हैं बल्कि गरीबों को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं. मुद्रा के विमुद्रीकरण का विचार कि यह फैसला ब्लैक इकॉनमी को खत्म कर देगा, यह पूरी तरह से एक गलत धारणा है. मैं आपको इसका एक उदाहरण देता हूं. असल में सरकार यह सोच रही थी या उनका यह लक्ष्य था कि यदि वह मुद्रा बंद करेंगें तो जो नोट इस ब्लैक इकॉनमी में लगे हुए हैं, वे बैंकों में जमा नहीं किये जा सकेंगें. क्योंकि यह ब्लैक इकॉनमी एक तो गैरक़ानूनी है और दूसरा उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है. तो यदि आप उन नोटों को लेकर बैंकों में जाते हैं तो आपसे कोई भी पूछ सकता है कि आपको यह पैसा कहां से मिला? यह डर उन लोगों को उस मुद्रा के साथ बैंक आने से रोकेगा, इस वजह से उस मुद्रा की गतिशीलता खुद-ब-खुद नष्ट हो जायेगी. नष्ट हुई मुद्रा के बारे में ऐसा उनका सोचना था कि वह साढ़े तीन लाख करोड़ होगी. मानिये वे अपने अनुमान में सही हैं. इस काली अर्थव्यवस्था का कुल आकार जिसके बारे में विश्व बैंक सबसे कंजरवेटिव अनुमान लगाता है, उसके अनुसार यह सफेद अर्थव्यवस्था का एक चौथाई है जो पैतीस लाख करोड़ होगी. अब अनुमान कीजिये कि इससे आने वाला मुनाफा – जो एक कंजर्वेटिव अनुमान ही है – साढ़े सत्रह लाख करोड़ है जो सीधे आधा है. इसका मतलब यह हुआ कि आप काली अर्थव्यवस्था के सालाना मुनाफे का 20 प्रतिशत हिस्सा ही गतिहीन बना रहे हैं. अगर दूसरे शब्दों में कहें तो आप इस ब्लैक इकॉनमी के सालाना मुनाफे में मात्र 20 प्रतिशत की कमी कर रहे हैं. इसका मतलब यह हुआ कि एक साल में आपके मुनाफे की दर में कमी आती है जो 30 प्रतिशत से गिरकर 24 प्रतिशत रह जाती है. बाजवूद इसके यह एक मुनाफे की गतिविधि बनी रहती है. यदि यह एक मुनाफे की गतिविधि बनी रहती तो यह चलती रहेगी, जिसपर नोटबंदी का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. यदि आप साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये को गतिहीन करते हैं तो भी. और यदि ये काली अर्थव्यवस्था चल रही है, गतिशील है तो उसमें नोटों की कमी होगी, जिसकी क्षतिपूर्ति वह सफेद अर्थव्यवस्थासे नोट लेकर मार्जिनल सेक्टर, इनफॉर्मल सेक्टर और वल्नरेबल सेक्टर आदि की कीमत पर करेगी. (थोडा हंसकर) तो काली अर्थव्यवस्था में इन नोटों को बंद करके गतिहीन बनने का आपका विचार दरअसल पूरी तरह गलत है. असल में ज्यादातर इस तरह की घटनाओं में होता क्या है और क्या हुआ है, वो यह कि लोग पुराने नोटों को नए नोटों में बदलने के तरीके निकाल लेते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे पास हवाला टाइप के नोट हैं. उदाहरण के लिए दिल्ली में हज़ार रूपये के पुराने नोटों को सात सौ रुपये के नए नोटों से बदला गया. विशेष रूप से यदि कहा जाए तो ब्लैक इकॉनमी को अक्षम बनाना तो दूर, अब हमारे पास कुछ आंकड़े यह दिखाने के लिए हैं कि असल में जो पैसा बैंकों में आ रहा है और जो कुल राशि विमुद्रित की गई है, उसमें ज्यादा अंतर नहीं है. इसका मतलब यह हुआ कि काली अर्थव्यवस्था में जो नकद राशि है वो अभी नष्ट नहीं हुई है जो कोई चौकाने वाली बात नहीं है. लेकिन इस प्रक्रिया में वास्तविक रूप से जो हुआ है, वो यह है कि भारी मात्रा में काली अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ है. क्योंकि अब हमारे पास ब्लैक इकॉनमी की गतिविधियों में एक और गतिविधि शामिल हो गई है, जिसका काम है पुराने नोटों को नए नोटों से बदलना. तो यह फैसला दरअसल पूरी स्थिति का गलत आकलन है.

लोगों को इतनी दिक्कतों का सामना क्यों करना पड रहा है? ? यदि हम जाति, वर्ग, लिंग और क्षेत्र की बात करें तो वो कौन से तबके हैं जो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं?

इसकी सबसे ज्यादा मार असंगठित क्षेत्र पर पड़ी है. असंगठित क्षेत्र हमारे देश की कुल जीडीपी का आधा है और 80 प्रतिशत रोजगार देने वाला है. तो देखो, जिनपर यह मार पड़ी है, वह बहुत बड़ी संख्या में हैं. श्रमिकों पर यह मार पड़ी है क्योंकि उनको मेहनताना नहीं मिल रहा है और श्रमिक ज्यादातर दलित जाति से आते हैं. अब आप यहां अपने को एक ऐसी स्थिति में पाते हैं, जहां आप यह कह सकते हैं कि गरीबों पर मार पड़ी है. क्योंकि, वे उन लोगों में नहीं है जो क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं. वे न तो क्रेडिट कार्ड से भुगतान करते हैं और न ही उनको क्रेडिट कार्ड आदि से भुगतान किया जाता है. तो जो गरीब हैं, दलित हैं, हाशिये के तबके हैं और जो असंगठित क्षेत्र में कार्यरत सबसे गरीब तबकों के मजदूर हैं, उनपर मार पड़ी है. लेकिन इसका असर इससे कहीं ज्यादा है. वनिस्पत इसे केवल दलित, आदिवासी आदि के रूप में देखा जाए. इसका असर इतना ज्यादा है, क्योंकि 80 प्रतिशत रोजगार इसी क्षेत्र से आता है जो कि बहुत मायने रखता है.

सरकार द्वारा जो कम नोट लाये गए हैं उसके परिणाम क्या होंगें, जैसा कि हम कह रहे हैं कि नोटों की कमी है?

जहां तक मैं समझ पा रहा हूँ कि जैसा जेटली ने पिछले दिनों कहा था और उससे पहले मुकुल रोहतगी ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा था कि जिन नोटों को वापस लिया गया है उसके मुकाबले वे नए नोटों को पर्याप्त मात्रा में छापने नहीं जा रहे हैं. जिससे मुझे ये लगता है कि नोटों की यह कमी ख़त्म नहीं होने वाली है. ऐसा वे इसलिए कर रहे हैं कि वह लोगों को नकदरहित (cashless) और ई-पेमेंट की तरफ धकेल सकें. अब यह कई प्रश्नों को जन्म देता है, एक तो यह गैरकानूनी है क्योंकि यदि आप नोट पर देखें तो उस पर रिजर्व बैंक द्वारा दिया हुआ एक वचन है जो यह कहता है कि ‘मैं धारक को 500 रुपये देने का वचन देता हूं.’ अब अगर वे यह कहते हैं कि मैं आपको ये पैसे नहीं दूंगा तो वे इस अनुबंध और वचन का उल्लंघन कर रहे हैं और हमारे अधिकारों पर हमला कर रहे हैं. ये उसी तरह है जैसे कोई किरायेदार आपके घर में किराया देकर रहने की शर्त पर आये और किसी समय जाकर वह आपको यह कहते हुए किराया देने से इनकार कर दे कि अब वह आपको किराया नहीं देगा, लेकिन यहीं रहेगा. वास्तविक रूप से यह अनुबंध का उल्लंघन है जो पूरी तरह गैरकानूनी है. इस तरह के गैरकानूनी कामों, जिसका निर्णय एकतरफा तरीके से बिना किसी संसदीय बहस या बिना कानून बनाये लिया गया, अपने आपमें असंसदीय कार्य है. अब जरा इसके नैतिक पक्ष पर सोचें तो आप लोगों पर नकदरहित होने के लिए दबाव डाल रहे हैं. कोई और होता कौन है हमारे ऊपर ये दबाव बनाने वाला. नकदरहित सिस्टम अपने आप में महंगा है, जबकि नकदी लेन-देन में ऐसा नहीं है. मूलतः पेटीएम इस्तेमाल करने के लिए दबाव बनाना पूरी तरह से अनैतिक है.

जैसे कि आपको नकदरहित लेन-देन में 4-5 रुपये अतिरिक्त देना पड़ रहा है?

एकदम, क्योंकि सारी कम्पनियाँ इसमें शामिल हैं. क्योंकि वह कोई चैरिटी नहीं कर रही हैं, उनका काम मुनाफा बनाना है जो वह लोगों की कीमत पर बना रही हैं. और आप लोगों पर यह दबाव कैसे बना सकते हैं कि वह इन कंपनियों के पास जाये? ये पूरी तरह अनैतिक है.

यह समस्या कितने समय तक बनी रहेगी और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लौटने में कितना समय लगेगा?

अर्थव्यवस्था कभी पटरी पर नहीं आएगी. मतलब दूसरे शब्दों में कोई ये कह सकता है कि असल में यह तो संक्रमणकालीन समस्या है लेकिन याद रखिये कई बार यह दीर्घकालीन होती है. उदाहरण के तौर पर मैं एक ठेले पर सब्जी बेचनेवाले से सब्जी खरीदता हूं और फिर एक मॉल में क्रेडिट कार्ड से सब्जी खरीदता हूं, जब मैं एकबार वहां क्रेडिट कार्ड से सब्जी खरीदने का आदी हो जाऊंगा तो अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के बावजूद मैं उस ठेले पर सब्जी बेचने वाले के पास से सब्जी खरीदने नहीं जाऊंगा. तो जो संक्रमणकालीन उपाय किये गए हैं वो स्थायी रूप से प्रभावी हो जायेंगें. अब हमें ये कहा जा रहा है कि असल में नोटों की कमी हमेशा बनी रहने जा रही है क्योंकि वे आपके ऊपर ई-भुगतान के लिए दबाव बना रहे हैं. यदि यह मामला है तो हां, बहुत बड़ी संख्या में असंगठित क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को स्थायी रूप से नुकसान होने जा रहा है क्योंकि उनमें से सभी नकदरहित अर्थव्यवस्था के साथ सामजस्य बैठा पाएं, यह जरुरी नहीं. तो प्रभावी रूप से होने क्या जा रहा है कि पेटीएम टाईप की वित्तीय कंपनियों को आप पर्याप्त मात्रा में फायदा पहुंचाने जा रहे हैं. आप मॉल के साथ-साथ, संगठित क्षेत्र और बड़े उद्यमियों को पर्याप्त मात्रा में फायदा पहुंचाने जा रहे हैं जो असल में असंगठित क्षेत्र के एक हिस्से पर कब्ज़ा जमाएगा. तो इन अर्थों में अर्थव्यवस्था कभी उस स्थिति में नहीं लौटेगी.

ज्यादातर राजनीतिक दल जो विपक्ष में हैं, वे किसी ना किसी तरह इसका विरोध कर रहे हैं. बावजूद इसके कोई बड़ी जन-गोलबंदी अभी तक देखने को नहीं मिली है, आप इसके पीछे क्या कारण देखते हैं?

यह एक मुश्किल सवाल है, (हंसते हुए) जहाँ तक मैं सोचता हूँ, इसके पीछे तीन-चार कारण हैं. पहला कारण जो मैं मानता हूँ कि राजनीतिक दलों द्वारा इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया गया. जिसका कारण मैं इस मुद्दे का टेकनिकल होना मानता हूं. दूसरे शब्दों में कहें तो निश्चय ही एक एकजुटता तो दिखती है. जैसा तुमने कहा कि उन्होंने इसपर अच्छा विरोध दर्ज कराया है, जिसे मैं एक बेहतरीन पोजीशन मानता हूँ. लेकिन ठीक उसी समय जो मैं सोचता हूँ कि इसकी जो वास्तविक गंभीरता है शायद उसका अनुमान उन्हें अभी तक नहीं है. जैसे कि नीतिश कुमार, नवीन पटनायक आदि सोचते हैं कि ऐसा तो चलता रहता है, मैं ये नहीं कहता कि वो दक्ष लोग नहीं है लेकिन उनका ये रवैया बताता है कि उनकी समझदारी में कोई कमी है जिससे वो यह नहीं समझ पा रहे हैं कि चल क्या रहा है? जैसा कि नवीन पटनायक ने कहा ‘हमें जीवन को आसान बनाना चाहिए.’ इसका क्या मतलब है कि आप ऑमलेट बनाना चाहते हैं और अंडा नहीं तोड़ना चाहते. दूसरे नम्बर पर, जो कि मैं सोचता हूँ कि बहुत सारे लोग 30 दिसम्बर का इंतज़ार कर रहे हैं, लोगों के भीतर यह भावना बनी हुई है कि 30 दिसंबर के आते ही स्थितियां फिर से सामान्य हो जायेंगी. तीसरे, यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ आप लोगों पर असीमित दबाव डालते हैं, और लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं. जहाँ कोई यह विश्वास नहीं कर पाता कि आपने यह कदम अनावश्यक रूप से लिया है और फिर सबको यह लगने लगता है कि इसके पीछे आपका कोई बड़ा उद्देश्य है. यह कुछ ऐसा है जो सबसे ज्यादा प्रभावित लोगों के भीतर भी पैठ जाता है. फिर भी मैं यह सोचता हूँ कि यह समय के साथ ख़त्म हो जायेगा. यह कुछ ऐसी चीजें हैं जिन्हें बनने में समय लगता है. मैं यह कल्पना कर सकता हूँ कि 30 दिसंबर के बाद पर्याप्त मात्रा में विरोध देखने को मिल सकता है, तात्पर्य यह है कि लोगों के भीतर अभी ही रोष दिख रहा है जो कि बढ़ने जा रहा है क्योंकि लोग अभी तक यह सोच रहे हैं कि कुछ अच्छा होने जा रहा है.

क्या हम नकदरहित अर्थव्यवस्था को कालेधन की समस्या के समाधान की तरह देख सकते हैं?

नहीं, क्योंकि नकदरहित अर्थव्यवस्था, अर्थव्यवस्था को दूसरे प्रकार के अपराधों की तरफ ले जाती है जैसे कि ‘साईबर अपराध’. कुछ ऐसी अर्थव्यवस्थाएं हैं जैसे कि कीनिया. मुझे बताया गया है कि कीनिया एक नकदरहित अर्थव्यवस्था है, लेकिन कोई यह नहीं कहेगा कि कीनिया में किसी प्रकार का आर्थिक अपराध नहीं होता है. दरअसल, यह दूसरे प्रकार के अपराध होंगे. जहाँ एक तरफ सम्भवतः टैक्स चोरी मुश्किल हो जाएगी वहीँ दूसरी तरफ कुछ लोगों के लिए आपके कंप्यूटर को हैक करके आपका पैसा चुराना आसान हो जायेगा और जो यह चोरी करेगा वह निश्चय ही टैक्स नहीं देता होगा. तो मुझे यह नहीं पता है कि आखिर लोगों को यह विश्वास क्यों है कि यह होने से सभी लोग टैक्स देना शुरू कर देंगें. मेरा मतलब यह है कि यह कदम अर्थव्यवस्था को दूसरे तरह के अपराधों की तरफ ले जा रही है. ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट नहीं है कि यहाँ एक बेहतर कर प्रणाली सुनिश्चित हो पायेगी या नहीं?

फर्ज कीजिये यदि कोई सरकार काली गतिविधि ही रोकने की इच्छुक है तो उसे क्या कदम उठाने चाहियें?

काली गतिविधियां कानून का उल्लंघन हैं, तो बुनियादी उपाय यह है कि आप कानून लागू कर दीजिये. दूसरे शब्दों में कहें तो यदि बहुत कड़ाई से कानून लागू किया जाए तो जो लोग इसका उल्लंघन कर रहे हैं वे दण्डित होंगें. ऐसी स्थिति में काली गतिविधियों में कमी आएगी. भारत में कानून दरअसल अपने विरोधियों को दण्डित करने के लिए लागू किया जाता है. वहीँ दूसरी तरफ जो लोग टैक्स चोरी में लगे हुए हैं उन पर कानून कभी लागू नहीं हुआ. उदाहरण के लिए जब प्रणव मुखर्जी वित्तमंत्री हुआ करते थे तब उन्होंने मॉरिशस रूट के जरिये होने वाली टैक्स चोरी पर रोक लगाने की कोशिश की थी, लेकिन उसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में तत्काल वापस ले लिया गया. और मोदी सरकार ने तो इस तरह का कुछ किया भी नहीं तो वे किस बारे में बात कर रहे हैं? यदि वह ‘मेक इन इंडिया’ के तहत विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं तो मुझे इस बात में संदेह है कि सपने में भी मॉरिशस रूट को बन्द करना चाहेंगे. मेरा मतलब है, ज्यादातर काला धन जहां पैदा होता है (फिर हँसते हुए), काले धन से मेरा मतलब है कि वह धन जो अर्थव्यवस्था के भीतर आयात और निर्यात पर अघोषित रूप से वसूला जाता है और फिर उस पैसे को स्विस बैक में जमा करा दिया जाता है.

जब नकदरहित अर्थव्यवस्था पूरी तरह से काम करने लगेगी तो इसमें लेन-देन का अतिरिक्त भार किसके ऊपर आयेगा?

यदि यह पूरी तरह से काम करने लगेगी तो उम्मीद करता हूं कि यह काम नहीं करेगी. क्योंकि उससे पहले मैं इस सरकार को आने वाले चुनाव में वोट देकर बाहर कर देना चाहूंगा. लेकिन, यदि अगर यह पूरी तरह से काम करने लगी तो इसके लेन-देन की कुछ कीमत होगी जो गरीबों के ऊपर पड़ेगी, यह उन लोगों के ऊपर भी पड़ेगी जो अभी तक नकदी अर्थव्यवस्था में थे और निःशुल्क(Costless) लेन-देन कर रहे थे. तो अचानक यदि लेन-देन की कीमत बढ़ जाए तो वे जो अब तक निःशुल्क लेन-देन कर रहे थे उनके ऊपर सबसे ज्यादा मार पड़ेगी.

लोग विमुद्रीकरण के कारण उपभोग कम कर, पैसे की बचत कर रहे हैं. इस प्रकार के कम खपत/खर्च के क्या निहितार्थ हैं?

दरअसल, अर्थव्यवस्था के अन्दर बहुत ही गंभीर मंदी जगह लेने जा रही है. जो पूरी तरह से मनुष्य निर्मित है. कहने का मतलब यह है कि पूरी तरह से जानबूझकर निर्मित की गई मंदी, बाजार की शक्तिओं द्वारा नहीं, जैसे बाजार अराजक ढंग से काम करके अपने आप को मंदी में धकेलता है, वैसे नहीं. यह पूरी तरह से घोषित रूप में जानबूझकर तैयार की गई मंदी है. मेरा मतलब है कि यदि आप लोगों की क्रय-शक्ति को ख़त्म करते हैं तो उसका मतलब यह हुआ कि बुनियादी रूप से मांग में कमी है, इसका मतलब यह भी है कि पूर्ति भी कम होगी. पूर्ति कम होगी क्योंकि मांग कम है या पूर्ति कम होगी इसलिए क्योंकि पर्याप्त मात्रा में नकदी नहीं है. उदाहरण के लिए किसानों को खरीफ की फसल बेचने में दिक्कत हो रही है और आगे भी होने जा रही है. इस सारे धंधे में उन्हें रबी की फसल के उत्त्पादन में दिक्कत आ रही है जबकि सरकार का यह कहना है कि रबी की फसल में कोई दिक्कत नहीं आ रही है. मेरे लिए इस बात का कोई मतलब नहीं है क्योंकि तथ्यात्मक रूप से वे इसकी तुलना पिछले साल से कर रहे हैं जबकि पिछला साल ‘सूखा वर्ष’ था जिसमें बहुत ही कम क्षेत्रों में बारिश हुई थी. यह साल अच्छा था जिसमें लोग रबी की अच्छी फसल की उम्मीद कर रहे थे और आपने इसे ध्वस्त कर दिया. अब आप यहाँ ये देख सकते हैं कि उधार पर, जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था अभी तक चल रही है. उदाहरण के लिए मैं उस दुकान पर जाता हूँ, जिसे मैं जानता हूँ, जो मुझे उधार में सामान देता है. वहीँ दूसरी तरफ उस दुकानदार के पास माल की पूर्ति नहीं हो पा रही है जिसके लिए उसे भी भुगतान करना होता है, तो वो कब तक मुझे उधार में सामान देता रहेगा? तो एक जगह जाकर यह सारी व्यवस्था एक बहुत बड़ी मंदी में प्रवेश कर जाएगी.

बहुत से लोग ये कह रहे हैं कि यह एक अच्छा कदम है लेकिन इसे गलत तरीके से लागू किया गया है?

यह एक बुरा कदम है. क्योंकि वह व्यक्ति, जो यह कह रहा है कि यह एक अच्छा कदम है, मैं उससे जानना चाहूँगा कि जिस कदम से बहुत बड़ी संख्या में गरीब बुरी तरह प्रभावित हों और वह भी काले धन पर बिना कोई प्रभाव डाले, ऐसे कदम पर कोई कैसे कह सकता है कि यह एक अच्छा कदम है? मैं कहूँगा यह एक बुरा कदम है और बुरी तरह लागू किया गया है. दूसरे शब्दों में अगर कहें इसको लागू करने का तरीका ही इसे एकदम घटिया बना देता है.

सरकार का यह कदम क्या सिर्फ यह दिखाने के लिए है कि ये सरकार बहुत मजबूत है जो कोई भी कड़ा निर्णय ले सकती है या इसके पीछे कुछ दूसरे कारण हैं जैसे कि कालेधन की जमाखोरी?

नहीं. लोग कई तरह के कारणों के बारे में बात कर रहे हैं जैसे उत्तर-प्रदेश में चुनाव आदि. अब दिल्ली में चल रही इस तरह के गप्पों से मेरा कोई मतलब नहीं है. लेकिन आप जो कह रहे हैं वह एक महत्वपूर्ण बात है कि हम एक निरंकुश सरकार देख रहे हैं और यह सरकार बहुत तेजी से तानाशाही की तरफ बढ़ रही है, जिसमें पर्याप्त अतार्किकता है. जब फोकस जनता से हटकर नेता की तरफ चला जाता है तो इस स्थिति में, नेता अपने को महान दिखाने के लिए दिमाग चकरा देने वाले काम करते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो वह जो तथाकथित महान नायकत्व वाले काम करता है वह पर्याप्त अतार्किक होते हैं. आप देखिये, इससे लोगों को नुकसान तो हो रहा है, लेकिन यही नुकसान एक नेता के मजबूत होने की पहचान बन गई है, जिसे देखकर लोग यह कह रहे हैं कि बहुत कड़ा फैसला लिया है, इस तरह का फैसला लेने की हिम्मत और किसी में नहीं थी जो इस आदमी के पास है. यह एक बहुत खतरनाक बहस है जिसके बारे मैं सोचता हूँ कि यह पीड़ित या सबसे ज्यादा प्रभावित लोगों के भीतर भी कुछ सीमा तक घुस गया है और उनके भीतर तो घर कर ही गया है जो लोग इस तरह की बात चला रहे हैं. यह बुनियादी रूप से तानाशाही है.

इसी तरह का एक कदम हमने वेनेजुएला में भी देखा, जहाँ विमुद्रीकरण किया गया लेकिन वहां बहुत अराजकता फ़ैल गयी, लोगों की मृत्यु भी हुई जिसके बाद इस फैसले को वापस ले लिया गया. लेकिन भारत में हमने बहुत बड़ी संख्या में लोगों को मरते देखा फिर भी कुछ नहीं हुआ?

निर्णय में अतार्किकता तानाशाही का एक लक्षण है और यह अतार्किकता यहां तक चली जाती है कि वह निर्णय को वापस नहीं लेगा. अगर तर्क यह है कि इस आदमी की हिम्मत देखो जो यह निर्णय ले सकता है, जिसका असर लोगों पर बुरी तरह पड़ा हो और उसने खुद ही कहा कि ‘जो निर्णय इंदिरा गांधी नहीं ले पायीं वो निर्णय मैंने लेकर दिखाया.’ तो इस निर्णय को वापस लेने का सवाल ही पैदा नहीं होता. अगर यह निर्णय आपने वापस लिया तो यह बात सिद्ध हो जाएगी कि आपमें पहले से ही हिम्मत की कमी थी तो आपने एक ऐसा रास्ता चुन लिया है जो बहुत ही खतरनाक है.

जैसा कि हम देख रहे हैं की बहुत सारे लोगों को परेशानी हो रही है और इससे जूझ रहे ज्यादातर गरीब हैं. बावजूद इसके एक तबका ऐसा है जिसे ये लगता है कि इस फैसले से कुछ अच्छा निकलकर आएगा और वो 30 दिसंबर के बाद तक भी यही मानते रहेंगे. यदि कुछ निकलकर नहीं आया तब भी. लोगों के भीतर संवेदना की इतनी कमी क्यों हैं?

जाति व्यवस्था. इस दुनिया में ऐसा कोई भी समाज नहीं है जिसका मध्यवर्ग गरीबों के प्रति इतना असंवेदशील हो, जैसा कि हमारे भारतीय समाज में. और मैं सोचता हूँ कि यह जाति व्यवस्था के कारण है. दूसरे शब्दों में कहें तो हर जगह वर्ग के भीतर में आपको बैर, द्वेष शत्रुता तो देखने को मिलेगी ही. लेकिन हमारे यहाँ जाति व्यवस्था के कारण इसमें और बढ़ोतरी हो जाती है. वह यह विश्वास नहीं करना चाहता कि कोई ऐसा समय भी आये जब मेरे बेटे और दलित के बेटे को समान अवसर मिले. मैं अपने हाव-भाव में कितना भी आधुनिक होऊं लेकिन जब इस सच्चाई से सामना होता है तो उस दिन को आने से रोकने में लग जाऊंगा.

जाति और वर्ग दोनों मिलकर इसे और भी घातक बना देते है

बिल्कुल, वर्ग हर जगह है लेकिन दूसरी तरफ हमारे यहाँ गरीबों के प्रति एक विशेष प्रकार का विद्वेष है.

[प्रभात पटनायक भारत के चर्चित आर्थिक जानकार, मार्क्सवादी चिन्तक और राजनीतिक विचारक हैं. साक्षात्कारकर्ता चेतना त्रिवेदी और रवि प्रकाश जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र हैं. यह साक्षात्कार ‘अदहन’ पत्रिका में शीघ्र प्रकाश्य.]

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