दलित-मुस्लिम महिलाओं के हक के लिए लड़ती कनीज़ फातिमा

फहमिना हुसैन, TwoCircles.net

आजमगढ़(उत्तर प्रदेश): हमारे समाज में आज भी जब औरतें आजीविका के लिए घर से बाहर कदम रखती हैं तो उन्हें कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन यदि उनमें जज्बा हो, तो वे समाज में अपने साथ-साथ दूसरों के जीने का भी एक आधार तैयार करती हैं. एक ऐसी ही कहानी आजमगढ़ के मुबारकपुर की रहने वाली कनीज़ फातिमा की है. कनीज़ ने बहुत ही कम उम्र में समाज की औरतों के हक़ की लड़ाई को शुरू किया. धीरे-धीरे उन्होंने अपने काम को आगे बढ़ाया और आगे चलकर ‘आली’ नामक संस्था के साथ जुड़कर समाज सेवा कर रही हैं.

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अपने क्षेत्र में कनीज़ ने बहुत-सी समस्याएं देखीं. वे कहती हैं, ‘घरेलू हिंसा, तलाक, यौन शोषण, साफ़-सफ़ाई, शिक्षा जैसी कितनी तरह की समस्याएं हैं जो समाज में औरतों को कहीं न कहीं पीछे रखती हैं. नई पीढ़ी की महिलाएं तो स्वयं को पुरुषों से बेहतर साबित करने का एक भी मौका गंवाना नहीं चाहती. लेकिन गांव और शहर की इस दूरी को मिटाना जरूरी है.’

कनीज़ बताती हैं, ‘मुबारकपुर में औरतों को लेकर जो सबसे ज्यादा मसलें हैं, वे पर्दें को लेकर हैं क्योंकि ये एक मुस्लिमबहुल क्षेत्र है. यहां अस्सी प्रतिशत मुस्लिम आबादी है. आधुनिकता सिर्फ हमारे पहनावे में आयी है लेकिन विचारों से हमारा समाज आज भी पिछड़ा हुआ है.’

सबसे पहले कनीज़ ने काम शुरू किया. बाद में ‘आली’ से जुड़ने के बाद कनीज़ को अपने लक्ष्य को पाने का और समाज के लिए कुछ करने का ज़ज़्बा भी मिल गया. कनीज़ बताती हैं, ‘शुरू-शुरू में घर से बाहर निकल कर जाना और लोगों को प्रोत्साहित करना बहुत मुश्किल था. कुछ साल पहले तक लोग अपनी लड़कियों को स्कूल तक नहीं भेजते थे. लेकिन मैं सभी आज सरकारी योजनाओं के बारे में घर-घर जाकर बताती हूं. इसके साथ ही मैंने अपनी पढाई के साथ अपने आसपास की लड़कियों को भी पढाई के लिए मोटिवेट किया, आज वे सभी कॉलेज जाती हैं.’

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वे बताती हैं, ‘मेरे इस काम की अगर कुछ लोगों ने सराहना की तो बहुत से लोग मेरे खिलाफ भी हुए क्योंकि कुछ लोगों का कहना था कि मैं उनकी बेटियों को बिगाड़ रही हूं. लेकिन फिर भी मैंने अपने काम को ज़ारी रखा.’

एक बार उनके गांव में रहने वाली ४२ साल की रहमत बीबी का राशन कार्ड दफ्तरकर्मियों ने निरस्त कर दिया था. जब दफ्तर जाकर उन्होंने वहां के कर्मचारियों से इसका कारण जानना चाहा तो कोई उनसे बात करने को तैयार नहीं था. उन्हें पता था कि कार्यालय के अधिकारियों ने गलत तरीके से राशन कार्ड को निरस्त किया है, तब इसकी शिकायत दर्ज करने में कनीज़ ने रहमत बीबी की मदद की.

ऐसी ही और बातों का ज़िक्र करते हुए कनीज़ बताती है, ‘एक ग़रीब परिवार की लड़की की शादी के लिए उस परिवार के पास इतना पैसा नहीं था कि वो शादी करा सके. इसके लिए कुछ अच्छे परिवारवालों से मदद की अपील की, लोगों ने अपील सुनी भी. ऐसी में उस लड़की की शादी अच्छे से हो गयी.

अपनी पढ़ाई के साथ-साथ कनीज़ घर पर छोटे बच्चों को उर्दू की तालीम भी देती हैं.

इतना ही नहीं अपनी संस्था के साथ मिलकर कनीज़ ने गांव के 123 बच्चों का ‘प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप’ के लिए आवेदन दाखिल कराया है. प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के अंतर्गत ग़रीब महिलाओं का आवेदन भी कराया ताकि उन्हें मुफ्त में गैस चूल्हा मिल सके. साथ ही वे गांव की अनपढ़ महिलाओं को चिन्हित कर साक्षर करने के कार्यक्रम में जुटी हुई हैं.

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कनीज़ महिलाओं को बचत कर घरेलू और स्वरोज़गार की भी शिक्षा देती हैं क्योंकि यहां के ज़्यादातर युवा शहर जाकर काम करते हैं या काम के लिए पलायन कर जाते हैं. ऐसे में कभी-कभी घरेलू खर्चों में दिक्कतें आती हैं, इस लिहाज़ से महिलाएं स्वनिर्भर हो सकें, वे इसकी शिक्षा महिलाओं को देती हैं.

वे कहती हैं. ‘शुरू में महिलाओं में झिझक थी पर अब वे एक-दूसरे को देख-देख हमसे जुड़ने लगी हैं.’ कानीज़ और उनकी साथियों की मुहिम से बहुत सारी महिलाएं जुडी हुई हैं. इनमें ज़्यादातर दलित और मुस्लिम समुदायों से ताल्लुक रखती हैं.

अपने काम की मुखालफत करने वालों के बारे में वे बताती हैं कि उन्हें और उनके परिवार वालों को जान से मारने तक की धमकी भी मिल चुकी है. कुछ महीने पहले का ज़िक्र करते हुए वे बताती हैं, ‘मेरे पास किडनैप करने के कॉल तक आये थे. इसके बाद मैंने थाने में शिकायत दर्ज करायी, जिसके बाद हमें पुलिस सुरक्षा भी मुहैया कराई गयी.’

कनीज़ ने अपनी पांचवी तक की पढ़ाई मदरसे से की और आगे इंटर तक की सरकारी स्कूल से. अभी कनीज़ लॉ की स्टूडेंट हैं. वो बताती है कि बचपन से ही उन्होंने अपने अब्बू को लोगों की मदद करते हुए देखा. तब से उन्हें ये ख्याल रहा कि उन्हें बड़े होकर अब्बू की तरह की कुछ करना है. उनके घर की ऐसी हालत नहीं थी कि वे अपनी पढाई किसी बड़े संस्थान से कर सकें इसलिए उन्होंने अपने सपने और लक्ष्य को जिन्दा रखते हुए गांव से ही पढाई जारी रखा.

समाज सेवा से जुड़ने के बाद उन्होंने देखा कि आजमगढ़ और आसपास में ऐसे वंचित और पिछड़े वर्ग के तबके हैं जिनके साथ काम करने की बहुत ज़रूरत है. उनमें दलित समुदाय या फिर अल्पसंख्यक समुदाय क्योंकि आजमगढ़ की पचास फीसदी जनसंख्या मुस्लिमबहुल है. वे कहती हैं, ‘बड़े शहरों और मेट्रो सिटी में रहने वाली महिलाएं शिक्षित, आर्थिक रुप से स्वतंत्र, नई सोच वाली, ऊंचे पदों पर काम करने वाली महिलाएं हैं, जो पुरुषों के अत्याचारों को किसी भी रूप में सहन नहीं करना चाहतीं. वहीं दूसरी ओर गांवों में रहने वाली महिलाएं हैं जो न तो अपने अधिकारों को जानती हैं और न ही उन्हें अपनाती हैं. वे अत्याचारों और सामाजिक बंधनों की इतनी आदी हो चुकी हैं की अब उन्हें वहां से निकलने में डर लगता है. वे उसी को अपनी किस्मत समझकर बैठ गई हैं. ऐसे में उन्हें इस सोच से निकलना एक बहुत बड़ी चुनौती का काम है.’

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