बनारस के बुनकर : न खाते हैं, न बुनते हैं, न पढ़ते हैं और कमाते हैं बेहद मुश्किल से

 

Bajardiha, Banaras
 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सिद्धांत मोहन, TwoCircles.net

वाराणसी: हिन्दी के कथाकार अनिल यादव की एक कहानी बहुत प्रचलित है. कहानी का शीर्षक है ‘दंगा भेजियो मौला’. बनारस की बुनकर बस्ती बजरडीहा की त्रासदी इस कहानी में एक ज़रूरी दस्तावेज़ के रूप में सामने आती है. इस कहानी में ज़िक्र है कि जब बजरडीहा के हथकरघों में सीवर का पानी भर जाता है, सीवर का उफनाया पानी जब घरों को टापू में तब्दील कर देता है तो इस मोहल्ले के लोग मदद के लिए दंगों का इंतज़ार करते हैं.

बजरडीहा अब थोड़ा बदल रहा है. यहां पानी तो वैसे नहीं जमता है, लेकिन ताना-बाना ज़रूर जाम हो गया है. हम पहुंचे थे यह जानने कि आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र यह इलाका क्या झेल रहा है? लेकिन हमें मालूम हुआ कि इस इलाके में चुनाव कोई मसला नहीं है, इस इलाके में चुनाव को लेकर उदासीनता भी है, इस इलाके में मुद्दा है कि उनकी समस्या ख़त्म हो. इस इलाके में यह जानना आपकी प्राथमिकता है कि समस्या क्या है? अनिल यादव की कहानी का ज़िक्र ही नहीं आता यदि हमसे मोहम्मद आजम नहीं कहते कि ‘भाई! अब दंगा तो होता नहीं है. होता तो कोई देखता. अब चुनाव आया है तो आप आए हैं.’

Bajardiha, Banarasग़नीमत है कि मकान बस ईंट के जोड़ से बने पड़े हैं
बस्ती में भीतर घुसने पर एक कुआं है. कुंएं के आसपास धूप तापते पांच बुनकर बैठे हैं. मैं पूछता हूं कि बात हो सकती है, तो मोहम्मद आजम कहते हैं, ‘क्यों नहीं हो सकती है? नोटबंदी के बाद से हम सब आपस में बात ही ज्यादा कर रहे हैं. आप भी कर लो.’ इन सभी के घरों में बीते डेढ़ महीनों से सिर्फ एक समय ही खाना बन रहा है. शुरू के दो-तीन दिन बिना खाने के बीते, अब लेकिन बन रहा है. लेकिन बस एक बार.

यहीं पर जब नोटबंदी के हालिया फैसले को लेकर आ जाएं तो रोज़ की कमाई पर खाने वाला बुनकर समुदाय माथा पकड़ कर बैठ जाता है. मोहम्मद इलियास भी बुनकर हैं. इलियास भी उसी कुएं पर खलिहर बैठे मिलते हैं. कहते हैं, ‘हम कल एक साड़ी पूरी करके व्यापारी को भेज दिए. अक्सर ऐसा होता था कि पैसा हमको उसी दिन या एक दिन बाद मिल जाता था. लेकिन कल साड़ी देने के बाद भी व्यापारी ने कहा कि तीन दिन बाद आना. अब न हमारे पास तीन दिन काम है और न तीन दिन पैसा.’

8 नवम्बर 2016 के बाद से यहां के बुनकर काम और पैसों दोनों से बेज़ार हैं. एक साड़ी पूरी करने में कम से कम दस दिन लगते हैं. और हथकरघा और साड़ी का कच्चा माल लाने की पूरी कवायद को भी जोड़ दें तो पूरा वक़्त कम से कम एक महीने का हो जाता है. एक साड़ी तैयार करने में भी एक बुनकर नहीं काम करता. काम समय से पूरा हो और साड़ी को तयशुदा समय पर गद्दी(साड़ी के व्यापारी) तक पहुंचाया जा सके, इसके लिए बुनकर खुद ही काम नहीं करते, बल्कि उनके बेटे तक इस काम में लगते हैं. जब एक साड़ी पूरी होती है तो बुनकर को दो हज़ार रूपए नकद मिलते हैं. मिलजुल कर यदि एक बुनकर महीने में पांच से छः साड़ियां भी पूरी कर लेता है तो उसे दस हज़ार रूपए मिलते हैं. इन दस हज़ार रुपयों में उसका पूरा परिवार खाता है, ओढ़ता, बिछाता और पहनता है.

‘मजदूर को उसकी मजदूरी पसीना सूखने के पहले दो’

यह वाक्य पता नहीं किस ज़रिए से लेकिन इस इलाके के कारीगरों की ज़ुबान पर मौजूद है. मोहम्मद सलीम कहते हैं, ‘ये बात हम लोग सुने हैं, और ऊपर का व्यापारी तो इस पर अमल भी करता है. लेकिन बीते दो महीने में मेरा परिवार कुल मिलाकर चार साड़ी बना पाया है. और वो भी दिसंबर के अंतिम दिन में काम मिला. अब उन चारों साड़ी का पैसा भी पूरा नहीं मिला है.’

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बुनकारी का ताना-बाना
बुनकरों की हालत यह है कि नोटबंदी के फैसले के बाद गद्दीदारों और व्यापारियों ने रखे हुए 500-1000 के नोट इन बुनकरों को थमा दिए. मरता क्या न करता वाली स्थिति में ये बुनकर उन पैसों को लेकर बैंकों की लाइन में लग गए. कुछ को मुश्किलों से पैसा मिला. लेकिन अधिकतर बुनकरों को व्यापारियों ने चेक थमाना शुरू कर दिया. मोहम्मद इलियास कहते हैं, ‘हमको रोज कमाना है, रोज खाना है. चेक खाते में जाने में पांच दिन लग जाता है. कैश भी मिलता तो उसको लेकर बैंक की लाइन में लग जाना था. इतना सब करने के पहले सोचना था न?’

इस रिपोर्ट को लिखते वक़्त दिमाग में यह नहीं चल रहा कि नोटबंदी की त्रासदी को और विस्तार दिया जाए, जबकि बात यह है कि नोटबंदी ने अपनी ही व्यवस्था के तहत चल रहे बनारसी साड़ी के असंगठित कारोबार को मिट्टी में मिला दिया है.

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बजरडीहा में जापान से करार के बाद मंगवाई गयी सफ़ेद लाइटें लग गयी हैं. गलियां भी थोड़ी साफ़-सुथरी स्थिति में हैं और माहौल भी शांत है. निवासी कहते हैं कि मोदी ने लाईट तो दी और गली भी ठीक हो गयी है, लेकिन आखिर में पेट पर लात मारने की क्या ज़रुरत थी?

बजरडीहा में शिक्षा का स्तर बेहद कमज़ोर और जर्जर है. मोहम्मद आज़म के दो बेटे अभी हथकरघे पर बैठे हुए हैं और उनके उठते ही तीसरा बेटा – जो मुश्किल से 12 साल का है – करघे पर बैठकर कढ़ाई करने लगेगा. न मोहम्मद आज़म ने पढ़ाई की. न उनके बाप-दादा ने, न ही उनकी आने वाली पीढ़ी ही पढ़ाई कर रही है. मोहम्मद आजम कहते हैं, ‘हम मदरसे में या स्कूल में कितना पैसा देंगे? या तो पहले ज़िंदा रह लें या तो पढ़ाई ही कर लें?’

यही कहानी शम्सुद्दीन जमां की भी है. बच्चे हैं, नोटबंदी के पहले तक दो वक़्त की रोटी मिल जाती थी, लेकिन उनके यहां भी सन्नाटा पसरा हुआ है. वे कहते हैं, ‘हम लोग घर की अलमारी में दस से बीस हज़ार रखते हैं कि कभी शादी-ब्याह या किसी काम के सिलसिले में खर्च के समय इस्तेमाल हो सके. लेकिन इस बार हम लोग तो वही पैसा खा गए. कमाने को कुछ था नहीं. बाद में हज़ार-पांच सौ रुपयों का उधार भी लेना पड़ा.’

इस आबादी में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने कई माध्यमों से नोटबंदी के बाद दस हज़ार से बीस हज़ार रुपए उधार लिए हैं. मोहम्मद सलीम कहते हैं, ‘उनको तो चुकाने में भी साल लग जाएगा.’

यह क्षेत्र बनारस के कैंट विधानसभा क्षेत्र में आता है. बजरडीहा में वोटरों की संख्या बीस हज़ार के आसपास है. यहां गली में समाजवादी पार्टी की लगभग तय प्रत्याशी रीबु श्रीवास्तव के पोस्टर दिख जाते हैं. उन्हें ही इस क्षेत्र में थोड़ा वैचारिक समर्थन भी प्राप्त है. वे साल में एक बार इस इलाके में आ भी जाती हैं. लोगों की समस्याएं सुनती हैं और आश्वासन देती हैं. लेकिन उनके दावों में कहीं भी उचित शिक्षा और विकास की उचित दिशा के वादे नहीं शामिल हैं. लोग कहते हैं कि सीवर, नलका या हैंडपंप पर वो बात करती हैं लेकिन न इलाके के एकाकी विकास के लिए न वो कुछ बोलती हैं न यहां के लोग ही कुछ बोलते हैं.

दरअसल इस इलाके में विकास के लिए इस इलाके की मांगों पर काम किया जाता रहा है या ऐसा दिखाने की कोशिश की जाती रही है. लेकिन आसपास के लोग बताते हैं कि इस इलाके को थोड़ा समझकर अन्य फलकों पर भी विकास के रास्ते पर ले जाना होगा.

सरकार और योजनाओं का हाल

वाराणसी से चुनार जाने वाली सड़क पर करसड़ा गांव में केंद्र सरकार द्वारा 1993-94 में बुनकर कॉलोनी और ट्रेनिंग सेंटर की नींव रखी गयी थी. यह योजना तब अधूरी रह गयी और आने वाले वक़्त में भी अधूरी ही रही. लगभग ढाई सालों पहले सत्ता में आई भाजपा सरकार ने भी इस ओर कोई ध्यान देना ज़रूरी नहीं समझा. और यह पूरा सेंटर अभी भी लगभग अधूरी स्थिति में है. यहां कई बुनकरों ने पावरलूम लगा लिए हैं, कईयों ने ऑटोरिक्शा और टैक्सी चलाना शुरू कर दिया है. शहर से दूरी ज्यादा होने के कारण न यहां ज़्यादा ऑर्डर आते हैं न ही उतना पैसा. शहर में बसे आधे से ज्यादा बुनकरों को बाकायदे मालूम भी नहीं कि ऐसा कोई केंद्र भी चल रहा है. वहीँ कुछ दिनों पहले नरेंद्र मोदी द्वारा क्राफ्ट ट्रेड फेसिलिटेशन सेंटर की नींव भी रखी गयी, लेकिन यहां क्या होगा उसका अंदाज़ इस बात से लग जाता है कि चौकाघाट और बजरडीहा के बुनकरों इसकी ज्यादा जानकारी ही नहीं है. शहर के मदनपुरा इलाके – जिसमें हैंडलूम के बजाय पावरलूम ज़्यादा चलती है – के इक्का-दुक्का व्यापारी इस केंद्र के बनने के बारे में जानते हैं.

ऐसे में आने वाले वक़्त में यह देखना होगा कि क्या इस क्षेत्र का विधायक और आने वाली प्रदेश सरकार क्या इस बड़े तबके और व्यवसाय को थोड़ा मजबूती के साथ स्थापित कर सकेगी? यह भी प्रश्न बड़ा है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भयानक रूप से पिछड़ते जा रहे इस तबके में इन्हीं क्षेत्रों में बढ़ावे के लिए कोई योजना लागू की जाएगी? या इन्हें वक़्त-बेवक्त बस त्रासदी का थर्मामीटर बनाकर चलता कर दिया जाएगा.

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