राहुल-अखिलेश, मोदी मुसलमानों को साध रहे थे, तब कैसी थी मायावती की रैली

सिद्धांत मोहन, TwoCircles.net

वाराणसी : रोहनिया में जगतपुर इंटर कॉलेज है. जो शहर से लगभग दस किलोमीटर दूर है. यहां जाते-जाते सारे रास्तों पर छोटे-छोटे ऑटोरिक्शे दिखते हैं, कुछ बसें दिखती हैं और उसमें भारत के कई ऐसे लोग दिखते हैं, जो अन्य किसी रैली में नहीं दिखते हैं. इनके हाथों में नीले झंडे हैं. और हम पहली बार किसी राजनीतिक रैली में आम महिलाओं को जोश के साथ नारेबाजी करते हुए देखते हैं.

रैली में प्रेस दीर्घा को बहुत विशिष्ट स्थान नहीं दिया गया है. इसकी कोई ज़रुरत भी नहीं क्योंकि यहां मीडिया संस्थान और मीडियाकर्मी इतने ही पहुंचते हैं, जितनी वाराणसी में विधानसभा सीटें हैं. यानी आठ. इनमें से छः स्थानीय मीडिया के हैं, एक राष्ट्रीय निजी चैनल का कैमरामैन है, लेकिन उसका कोई रिपोर्टर कोई नहीं है. वह बताता है कि उसके साथ कुल तीन रिपोर्टर बनारस आए हैं लेकिन तीनों मोदी और राहुल-अखिलेश का रोड-शो और रैली कवर करने गए हैं और उस कैमरामैन को इस रैली का वीडियो रिकार्ड करके भेजना है.

आम जनता के बीच घूमने पर बीड़ी के देसी तम्बाकू, गांजे और देसी दारू की महक गाहे-बगाहे मिलती घुलती रहती है. साथ में थोडा कड़वा तेल भी महकता रहता है. यह महक किसी और रैली में नहीं मिलती है. यह महक बुरी नहीं है, यह कई वर्गों और समुदायों के नाक में चुभने वाली महक है. यह महक बहुजन समाज पार्टी की रैली में मिलती है. यह मायावती की रैली है.

मायावती की रैली के बारे में एक बात साफ़ है, यहां मायावती के कोर वोटर जुटते हैं. कल दिन में जब मैदागिन चौराहे पर सीतापुर डिपो, इलाहाबाद डिपो, लखनऊ, कानपुर और बाराबंकी की बसें नरेंद्र मोदी की रैली में आई हुई दिख रही थीं, वहीं मायावती की रैली में आए हुए लगभग सभी वाहनों के नंबर प्लेट एक ही जगह के थे – UP 65, यानी बनारस. ऐसे में यह कयास लगाना आम है कि मायावती की रैली में शायद बाहर से लोगों को जुटाने की कोई ख़ास व्यवस्था नहीं करनी पड़ी. आने-जाने वाले छोटे वाहन मार्क नहीं किए गए थे और वे सभी वाहन सवारियों को जगतपुर इंटर कॉलेज के सामने उतारकर वापिस सवारियां बिठाने चले जा रहे थे.

मायावती की रैली में अभिजात्य वर्ग नहीं दिखता है. बड़ी संख्या में दलित दिखते हैं और कुछ संख्या में मुस्लिम भी अब दिखने शुरू हो चुके हैं. महिलाओं की संख्या बहुत बड़ी होती है. कल के ही दिन जहां डिम्पल यादव को छोड़ दें तो मोदी और अखिलेश-राहुल के रोडशो में महिलाएं नदारद थीं तो वहीं दूसरी ओर मायावती की रैली में कम से कम 15000 की संख्या अकेले महिलाओं की थी.

चूंकि हम एक तुलनात्मक रूप से बात कर रहे हैं तो मोदी और राहुल-अखिलेश के जन का भी अंतर साफ़ होना चाहिए. राहुल-अखिलेश का रोड-शो ठीक उस जगह से शुरू हुआ जहां आज से सात महीने पहले सोनिया गांधी ने अधूरा रोड-शो किया था. कचहरी चौराहे के पास मौजूद अम्बेडकर प्रतिमा से. इसके बाद राहुल गांधी और अखिलेश यादव उस फैक्टर की ओर अपने रोड-शो को मोड़ देते हैं, जो फैक्टर उन्हें लाभ पहुंचा सकता है. वह फैक्टर है मुसलमान. राहुल-अखिलेश का रोड-शो चौकाघाट, आदमपुर, चौक, नीचीबाग से होते हुए गिरजाघर चौराहे पर पहुंचता है. इस पूरे रास्ते का चुनने का मक़सद है मुस्लिम वोटबैंक को साधना. बनारस का बच्चा-बच्चा जानता है कि इन इलाकों में जुलाहों, बुनकरों, कसाईयों से लेकर एलीट क्लास के मुस्लिम तक रहते हैं. आम भाषा में बोलें तो नवाबी मुसलमान भी यहीं और कबाड़ी भी यहीं. राहुल-अखिलेश का पूरा ध्येय इस वोट को साधने का रहा और वे इस चीज़ में कितने सफल हुए यह कहना मुश्किल है.

अब बात नरेंद्र मोदी पर आती है. नरेंद्र मोदी का रोड-शो अघोषित था. इसके लिए कोई अनुमति नहीं ली गयी थी. अब नरेंद्र मोदी के रोड-शो में शामिल लोगों को देखने से पहले एक तथ्य जान लें. मदनपुरा और रेवड़ी तालाब बनारस के मुस्लिमबहुल मोहल्ले हैं. इसमें जंगमबाड़ी और सोनारपुरा को भी शामिल किया जा सकता है. जब आप इस इलाके से गुजरेंगे तो आपको सभी मकानों के आगे बड़ी-बड़ी जालियां लगी दिखाई देंगी. घर बख्तरबंद सरीखे लगेंगे. इसके पीछे कारण है. बनारस में साल 1992 में दंगे हुए. इस दौरान कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. इस बात को बनारस का हर भाजपाई पूरे जोश के साथ बताता है कि कल्याण सिंह ने उस साल दंगे में मुसलमानों को ‘कचरवाने’ में कोई कसार नहीं छोड़ी, शायद कल्याण सिंह की इस वीरता का ही सबब था कि इस इलाके के मुस्लिम समुदाय के लोगों के घर खौफ़ के कारण बख्तरबंद हैं. पूछने पर लोग बन्दर का बहाना कर देते हैं, लेकिन असल कारण यही है.

तो मोदी का अवैध रोड-शो भी इस इलाके से गुजरा और वह क्यों गुजरा यह भी साफ़ हो ही रहा होगा? नहीं हो रहा तो बता दें कि नरेन्द्र मोदी ने अघोषित तौर पर रमज़ान और कब्रिस्तान वाले ध्रुवीकरण के अध्याय को एक चरण आगे ले जाने की कोशिश की. पार्टी से जुड़े एक नेता बताते हैं, ‘इस रोड-शो को जबरदस्ती करवाने से ही समझ लीजिए कि हम लोग क्या हासिल करना चाह रहे थे? उस इलाके में एसपीजी को थोड़ा शक़ था लेकिन फिर भी मोदी जी वहां से क्यों गुजरे? क्योंकि वो हिन्दू वोटों को बिखरने से रोकना चाह रहे हैं.’ इसका स्पष्टीकरण एक अतिउत्साही भाजपा समर्थक से बात करने पर मिल जाता है, अजय कुमार सिंह नाम का 23 साल का मोदी समर्थक हमसे बताता है, ‘मोदी जी इन सालों को औकात दिखा दिए. अब मोदी को वोट नहीं देना है तो मत दो, राज तो तुम्हारे पर हिन्दू ताकत ही करने वाली है. मोदी जी ने हिन्दुओं को ज़िंदा किया है.’

अब इन सबके परिप्रेक्ष्य में मायावती की रैली को देखें. मायावती की रैली में बसपा के कोर वोटर आ रहे हैं, ऐसा लम्बे समय से चला आ रहा है. मायावती अपनी बनारस की रैली में दो घन्टे देर से पहुंचीं. जब यह देर हो रही थी तो हमने रैली में मौजूद कुछ लोगों से बात की. सुखदेवी शिवपुर में रहती हैं और लगभग 56 साल की हैं. वे बताती हैं, ‘हमको भी पता है और आपको भी पता है कि वोट किसको देंगे. बस मैडम जी को देखने आए हैं. कम से कम हम लोगों में थोड़ा ताकत आ जाता है. दस ग्राम खून तो उनको देखकर ही बढ़ जाता है.’ सुखदेवी के ‘हम लोगों’ में बहुत बड़ा जनसमूह शामिल है जो मायावती की रैली में केवल उन्हें देखने ही आता है. उन्हें पता है कि मायावती क्या और कैसी बात करेंगीं? अव्वल तो मायावती की रैली में मौजूद लोगों को – जिनमें से मुसलमानों को छोड़ दें – तो लगभग किसी को भी यह फर्क नहीं पड़ता है कि मायावती विरोधी दलों के लिए क्या बोलती हैं? मुस्लिमों पर ऐसा फर्क पड़ता है, अमूमन ऐसा देखा गया है. तभी मोहम्मद इकराम कहते हैं, ‘सपा न हिन्दुओं की है, न मुसलमानों की. इसलिए मेरा भरोसा बसपा पर ज्यादा है.’

मायावती की रैली एक लक्खी मेले की तरह है. मैदान के एक किनारे पर मायावती, कांशीराम, ज्योतिबा फुले, अम्बेडकर और कभी-कभी शाहूजी महाराज पर पतली-पतली किताबें मिलती हैं, अमूमन पचास पेज की. इनके पोस्टर भी मिलते हैं. लोग इन्हें खरीदते हैं. ऐसा सस्ता साहित्य किसी रोड-शो में कल नहीं बंटा. रोड-शो के बारे में वाट्सऐप मैसेज आते रहे, लेकिन मायावती की रैली तो पत्रकारों के वाट्सऐप ग्रुप से भी गायब रही.

मायावती की रैली के बाहर मूंगफली बिक रही थी. पूर्वांचल में मायावती की यह मेरी दूसरी रैली थी. इस रैली के बाहर भी आइसक्रीम के ऐसे ब्रांड ही बिक रहे थे जिन्हें अमूमन अभिजात्य वर्ग नहीं खरीदता है. पूजा, मधु, प्रिंस और कारनेट कंपनियों के आइसक्रीम कौन खाता-खरीदता है? लेकिन मायावती की रैली के बाहर इन कंपनियों के एक-एक रूपए के आइसक्रीम बिकते हैं. खूब बिकते हैं.

‘बहुजन वालंटियर फ़ोर्स’ या ‘भीम सेना’, यह एक ऐसे समूह का नाम है, जिसने उत्तर प्रदेश के पुलिस प्रशासन का काम कम किया है. उन्हें थोड़ा आराम करने दिया है. मायावती की रैली में भीम सेना के लोग मिलते हैं. टोपी लगाए, हाथ में लाठी लिए, महिलाएं हैं तो नीली साड़ी पहने और पुरुष हैं तो नीली पैंट और सफ़ेद शर्ट पहने. टोपी पर एक बिल्ला है – जिस पर लिखा है बीवीएफ़. पुलिसकर्मी को मुसीबत होती है तो वह भीम सेना के लोगों के पास जाता है और आग्रह करता है कि वे लोगों की भीड़ को सम्हालें. इस काम को भीम सेना के लोग सम्हालते भी हैं. गणेशपुर के रहने वाले संतोष कुमार जब बीस वर्ष के थे, तब से वे मौके-बेमौके बहुजन वालंटियर फ़ोर्स में अपनी भूमिका की अदायगी करते हैं. इस समय वे 35 साल के हैं. वे कहते हैं, ‘मुझे मायावती को आगे देखना है. कवन चमार इतना आगे गया है? यदि मेरे खून से भी मायावती मजबूत होती हैं, तो भी हम ऐसा करेंगे.’ भीम सेना के स्वयंसेवियों को बताया जाता है कि रैली कब है? फिर वे उसके पहले अपनी वर्दी धो-पोंछकर रैली में पहुंच जाते हैं. कुछ की वर्दी उधड़ी हुई है, कुछ की इतनी मैली की धोने से भी साफ़ नहीं होगी. कुछ कहते हैं कि एक दिन रैली में सौ रुपया मिल जाता है और कुछ बताते हैं कि पैसा नहीं मिलता है.

मायावती की रैली में महिलाएं अपने कुनबे के साथ पहुंचती हैं और रैली में बैठकर पूरी पंचायत कर डालती हैं. ऐसा सुशीला देवी खुद बताती हैं, ‘हम केहू और की रैली में नाही जाईत. इहां बहुरिया और बेटी को लेके आईत हई, बैठी और मैडम को देख के वापिस जाईत.’ बसपा से जुड़े एक नेता बताते हैं, ‘मायावती की रैली दरअसल छोटे लोगों की रैली है. महिलाएं आती हैं और इसे अपना घर मानती हैं, यहां महिलाएं अपनी मर्जी से आती हैं और वोट भी देने अपनी मर्जी से जाती हैं. बड़े लोगों की तरह नहीं कि बाप-पति जहां कह दिया, वहां वोट दे दिए लेकिन नेता का मुंह तक नहीं देखे.’

मायावती की रैली में ‘बसपा’ या ‘बहुजन समाज पार्टी’ शब्द नहीं सुनाई पड़ता है. ‘मायावती’, ‘अम्बेडकर’ और ‘हाथी’ पर ही सारी बात कह ली जाती है.

सुशीला देवी मायावती का भाषण शुरू होने के पहले बताती हैं, ‘आप अभी देखिएगा. मायावती मोदी की तरह चिल्लायेंगी नहीं या आने पर अखिलेश जी की तरह मजाकबाजी नहीं करेंगीं. आने दीजिए. लोग उनको देखने आए हैं. हम लोग के लिए उनका दर्शन ही बहुत बड़ी चीज है.’ ऐसा होता भी है. कागज़ पढ़कर भाषण देने वाली मायावती आक्रामक नहीं होती हैं या प्रहसन नहीं रचती हैं. कुछ लोग पंद्रह मिनट बाद निकल जाते हैं. उनके लिए हेलीकाप्टर से उड़ता एक जाटव गर्व करने की बहुत बड़ी चीज है.

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