दलितों, आदिवासियों और मुस्लिमों को जेल ही दे पाया है हमारा लोकतंत्र – शिवमूर्ति

By TCN News,

लखनऊ : रिहाई मंच के तत्वावधान में ‘अवैध गिरफ्तारी विरोध दिवस’ के तहत यूपी प्रेस क्लब लखनऊ में ‘अवैध गिरफ्तारियां और इंसाफ का संघर्ष’ विषयक सेमिनार का आयोजन किया गया.


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सेमिनार को संबोधित करते हुए साहित्यकार शिवमूर्ति ने कहा, “आज जेलों में तमाम लोग 10-10 सालों से उन मामलों में बंद हैं, जिनमें अधिकतम सजा ही दो साल है. इनमें बड़ी संख्या दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों की है. इससे साबित होता है कि पूरी व्यवस्था ही इन तबकों के खिलाफ है.” शिवमूर्ति ने आगे कहा, “सबसे शर्मनाक कि सामाजिक न्याय के नाम पर सत्ता में आई पार्टियों के शासन में भी यह सिर्फ जारी ही नहीं है बल्कि इनमें बढ़ोत्तरी ही हो रही है. खालिद का मामला इसका उदाहरण है. यह सिलसिला तभी रुकेगा जब मुसलमानों को आतंकवाद के नाम पर फंसाने और उन्हें फर्जी एंकाउंटरों में मारने वाले जेल भेजे जाएंगे जैसा कि गुजरात में देखने को मिला.”


दलितों, आदिवासियों और मुस्लिमों को जेल ही  दे पाया है हमारा लोकतंत्र – शिवमूर्ति

इस अवसर पर दिल्ली से आए वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने कहा, “अवैध गिरफ्तारियों का सवाल सामान्य नहीं है. यह एक बिजनेस मॉडल है. इसका एक ग्लोबल स्ट्ररक्चर है और इसे समझने की ज़रूरत है. यह सवाल दरअसल देश के बहुसंख्यक आवाम से जुड़ा है. देश के 85 प्रतिशत लोगों की सत्ता में कोई भागीदारी नहीं है. वे कोई आवाज न उठाएं इसीलिए यह सब हथकंडे हैं.” इन गिरफ्तारियों के सामाजिक तन्त्र से रिश्ते को समझाते हुए उन्होंने कहा, “विचार तंत्र को नियंत्रित करने वाले संगठनों में अमीरों का कब्जा है. सारी लड़ाई इस लुटेरे आर्थिक तंत्र को वैधता प्रदान करने की कोशिशों से जुड़ी है. आज देश के दलित, आदिवासी और मुस्लिम समाज के लोगों का स्थान अपनी आबादी से अधिक जेलों में है. इसके लिए सिर्फ पुलिस ही नहीं बल्कि देश का राजनीतिक ढांचा भी जिम्मेदार है. पश्चिमी यूपी में जिस तरह दलितों और मुस्लिमों में सापंद्रायिक तनाव भड़काया जा रहा है ऐसे में दलितों को सोचना होगा कि जिस हिन्दुत्वादी अस्मिता के तहत वे कभी बसपा तो कभी भाजपा के साथ जाते हैं, उस राजनीति ने उन्हें क्या दिया?”

मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पाण्डेय ने इस ओर ध्यान दिलाया कि रिहाई मंच की इस लड़ाई ने सरकार पर एक दबाव बनाया और उसके बाद सरकार ने हर जिले में एक शासनादेश भेजा कि सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए बेगुनाह छोड़े जाएं. संदीप पाण्डेय ने कहा, “होना यह चाहिए था कि सरकार मामलों की पर्नविवेचना के बाद उनको छोडने की बात करती. इससे सरकार ने न्याय के इस सवाल को साम्प्रदायिक राजनीति के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की इसलिए निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर अमल कराने के लिए संघर्ष जारी रखना होगा.”

रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि हम आतंकवादियों को छुड़ाने की बात नहीं करते बल्कि बेगुनाहों को छोड़ने की बात करते हैं. सरकार ने वादा किया था कि वह इन नौजवानों को छोड़ेगी और उनका पुर्नवास करेगी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. अभी भी कई बरी लोग पुर्नवास की बाट जोह रहे हैं. रामपुर के जावेद उर्फ गुड्डू, ताज मोहम्मद, मकसूद बिजनौर के नासिर हुसैन और लखनऊ के मोहम्मद कलीम जैसे बेगुनाह बरी होने के बावजूद किसी भी तरह के पुर्नवास से वंचित है. शुऐब ने कहा, “पिछले दिनों बाराबंकी पुलिस द्वारा खालिद मुजहिद की हत्या पर की गई झूठी विवेचना को खारिज करते हुए न्यायालय ने इस मामले की जांच बाराबंकी एसपी को पुनः कराने का निर्देश दिया था. आज खालिद के चचा जहीर आलम फलाही ने उन्हें बताया कि आज उसे दरोगा ने उन्हें फोन किया था कि वे आकर अपनी गवाही दें. दोषपूर्ण विवेचक द्वारा पुनः विवेचना कराना न सिर्फ न्यायालय की अवमानना है, इससे यह भी साबित होता है कि यूपी की सपा सरकार किसी भी हाल में खालिद के हत्यारोपी पुलिस अधिकारी विक्रम सिंह, बृजलाल, मनोज कुमार झा व अन्य आईबी व पुलिस अधिकारियों को हर कीमत पर बचाना चाहती है. जिससे कि आतंकवाद के मामलों में पुलिस व आईबी के गठजोड़ से पर्दा न उठ सके.”

मौलाना खालिद मुजाहिद के चचेरे भाई शाहिद ने कहा, “पूरी दुनिया जानती है कि मेरे भाई को गलत तरीके से उठाया गया. निमेष रिपोर्ट भी इसकी तस्दीक करती है. लेकिन बावजूद इसके, उन्हें पांच साल तक जेल में रखा गया और आखिर में मार डाला गया. मुझे पूरा यकीन है कि इंसाफ के इस संघर्ष के कारण उनके हत्यारे जरूर जेल जाएंगे. सपा सरकार उनको बहुत दिनों तक बचा नहीं पाएगी.”

सामाजिक न्याय मंच के अध्यक्ष राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा, “सवाल केवल खालिद की अवैध गिरफ्तारी का नहीं है, अवैध गिरफ्तारियां आज भी लगातार जारी हैं और व्यवस्था के लिए उनके अपने निहितार्थ हैं. ऐसी अवैध गिरफ्तारियां सत्ता को अपनी हुकूमत बचाए रखने के लिए जरूरी हैं ताकि आम जनता डरकर उनके खिलाफ़ आवाजें उठाना बंद कर दे.”

ट्रेड यूनियन नेता शिवाजी राय ने कहा कि पूंजीवाद के चरित्र में इस किस्म के अपराध होते हैं. यह सब इस व्यवस्था का अंग है. एपवा की नेता ताहिरा हसन ने कहा कि यदि खालिद बेगुनाह है तो फिर उस प्रताड़ना का जवाब कौन देगा जो उसे और उसके परिवार को मिली हैं.

कार्यक्रम में 6 सूत्रीय प्रस्ताव पारित किए गए –

1- मौलाना खालिद मुजाहिद की हत्या की विवेचना को प्रभावित करने वाले हत्यारोपी पुलिस अधिकारियों विक्रम सिंह, बृजलाल, मनोज कुमार झा, चिरंजीव नाथ सिन्हा आदि को तत्काल गिरफ्तार किया जाए.

2- अपने चुनावी वादे के मुताबिक सपा सरकार आतंकवाद के आरोपों से अदालतों से दोष मुक्त हुए मुस्लिम युवकों का पुर्नवास सुनिश्चित करे.

3- आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों को तत्काल रिहा किया जाए.

4- सपा सरकार अपने वादे के मुताबिक आरडी निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर तत्काल अमल करे.

5- ‘लव जिहाद’ और ‘घर वापसी’ के नाम पर सांप्रदायिकता फैलाने वाले हिन्दुत्वादी संगठनों आरएसएस, बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद सरीखे संगठनों पर तत्काल प्रतिबंध लगाते हुए उनके दोषी नेताओं को गिरफ्तार किया जाए.

6- आतंकवाद के नाम पर हुई घटनाओं की न्यायिक जांच कराई जाए, जिसके दायरे में खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों का लाया जाए.

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