आसिम खान की ये कामयाबी आज़मगढ़ की बदलती तस्वीर को बयान कर रही है…

अफ़रोज़ आलम साहिल, TwoCircles.net

आज से क़रीब दस साल पहले मीडिया ने आज़मगढ़ की चाहे जैसी भी तस्वीर पेश की हो, लेकिन ये कहानी आपको बताएगी कि यहां के नौजवान अब अपने आज़मगढ़ की तस्वीर अब बदल रहे हैं.


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सरायमीर इलाक़े में रहने वाले आसिम खान इस बदलती तस्वीर की पहली कड़ी बने हैं. इन्होंने इस साल यूपीएससी के सिविल सर्विसेज़ परीक्षा में 165वीं रैंक हासिल करके आज़मगढ़ का नाम सुनहरे अक्षरों में लिख दिया है. आसिम ने इसी साल इंडियन फॉरेस्ट सर्विस में भी अपनी कामयाबी का परचम लहराया है.

आसिम की कामयाबी की ये कहानी बता रही है कि आने वाले दिनों में आज़मगढ़ की फिर से एक अलग तस्वीर देखने को मिल सकती है.

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आज़मगढ़ को लेकर मीडिया में जिस तरह की चीज़ें आई थीं, उस बारे में पूछने पर आसिम कहते हैं कि, पहले जो चीज़ें गुज़र गई हैं, उसे कुरेद कर कुछ नहीं मिलने वाला. मेरी जेनरेशन के काफ़ी लड़के अच्छी जगहों पर पढ़ रहे हैं. सिविल सर्विस के लिए भी कई लड़के तैयारी कर रहे हैं. कई लड़के करना चाहते हैं. हालांकि कई लड़कों ने घर के आर्थिक हालात की वजह से बीच में ही तैयारी छोड़ी भी हैं. यक़ीनन वक़्त के साथ सारे ज़ख्म भर जाएंगे, जो तस्वीर क्रिएट की गई थी, या यूं कह लीजिए कि जो बन गई थी, वो अगले कुछ दिनों में बदल जाएगी.

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आसिम के पिता वासिक़ अहमद आज़मगढ़ में बिजनेसमैन हैं और अम्मी आएशा खातून घर का काम संभालती हैं. आपकी छठी क्लास तक की पढ़ाई मदरसा तंज़ीमुल क़ौम से हुई है. सेन्ट्रल पब्लिक स्कूल से दसवीं और फिर आज़मगढ़ से ही बारहवीं की पढ़ाई हुई है. इसके बाद एएमयू से बीएससी (ऑनर्स) बॉटनी और माइक्रो बायलॉजी में एमएससी की डिग्री हासिल की है. 6 भाई-बहनों में इनका नंबर 5वां है.

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आसिम बताते हैं कि, मुझे इन सब चीज़ों के बारे में जानकारी नहीं थी. 12वीं में बायलॉजी होने के कारण बाक़ी लड़कों की तरह मैं भी मेडिकल के क्षेत्र में जाना चाहता था. एमबीबीएस करके डॉक्टर बनना चाहता था. लेकिन मैंने जैसे ही 12वीं क्लास पास की, मेरे वालिद ने मुझे मश्विरा दिया कि एएमयू जाओ. पहले वहां ग्रेजुएशन में दाख़िला लो, फिर तुम्हारा जो दिल करे, वो करना. मेडिकल की तैयारी भी वहीं रहकर कर सकते हो. मेरे वालिद भी एएमयू से पढ़े हैं.

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वो आगे बताते हैं कि, मेरे वालिद ने इसी दौरान मुझे सिविल सर्विस के बारे में भी बताया, लेकिन ये मुझे बहुत ज़्यादा आकर्षित नहीं कर पाया. लेकिन जब मैं एएमयू आया तो खुशक़िस्मती से मुझे प्रोफेसर एहसामुद्दीन साहब मिलें. उन्होंने भी अपने वक़्त में सिविल सर्विस की तैयारी की थी.

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वो कहते हैं कि, प्रोफेसर एहसामुद्दीन ने ही फिर से मुझे इसके बारे में विस्तारपूर्वक बताया. ये भी बताया कि एक साइंस का स्टूडेन्ट कैसे इस परीक्षा को दे सकता है. उसके लिए क्या संभावनाएं हैं. मैं बॉटनी को कैसे पढ़ूं और फिर इसका इस्तेमाल कैसे कर सकता हूं. उन्होंने ही मुझे इंडियन फ़ॉरेस्ट सर्विस के बारे में भी बताया. उन्होंने यह भी बताया कि अगर कामयाबी हासिल करनी है तो एक कुर्बानी देनी पड़ेगी. और ये क़ुर्बानी अलीगढ़ को छोड़ने की थी.

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आसिम बोलते-बोलते हंस पड़ते हैं और फिर हंसी रोक कर कहते हैं कि, ये सच में एक बड़ी क़ुर्बानी है. इसे सिर्फ़ एएमयू वाले ही समझ सकते हैं. ये क़ुर्बानी देना मेरे लिए इतना आसान नहीं था. इसलिए इस क़ुर्बानी के बारे में सोचे बग़ैर एमएससी में दाख़िला ले लिया.

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आसिम एएमयू से एमएससी करने के बाद 2014 में आख़िरकार दिल्ली आ गए. पहले तो खुद से ही इसकी तैयारी की. फिर हमदर्द स्टडी सर्किल को ज्वाईन किया. इस बीच घर के कुछ ऐसे हालात बनें कि उन्हें वापस आज़मगढ़ जाना पड़ा. एक साल तक वहीं रहकर पढ़ते रहे. फिर वापस दिल्ली आए. तैयारी को सिरियसली लिया. नतीजे में पिछली बार इंटरव्यू तक पहुंच कर रह गए. लेकिन इस बार कामयाब हो चुके हैं. इन्होंने यह कामयाबी चौथी कोशिश में हासिल की है.

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आसिम का कहना है कि पहले मेरी ख़्वाहिश इंडियन फॉरेस्ट सर्विस में जाने की थी. लेकिन अब मैं आईपीएस बनना चाहता हूं. इंशा अल्लाह मेरे इस रैंक पर मुझे आईपीएस मिल जाएगी.

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वो कहते हैं कि मैंने रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में देखा है कि सबसे ज़्यादा कोई अगर किसी से डरता है तो वो पुलिस है. लोग पुलिस स्टेशन जाने से घबराते हैं. वहीं लोगों की एक सोच बन गई है कि बिना कुछ दिए काम नहीं होने वाला. तो ऐसे में मुझे लगता है कि पुलिस को अपनी इमेज थोड़ी सही करनी पड़ेगी. मेरी पहली कोशिश यही रहेगी कि मैं इस इमेज को थोड़ा सा भी सुधार पाऊं.

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इन्होंने इस परीक्षा में बतौर सब्जेक्ट बॉटनी लिया था. वो बताते हैं कि क्योंकि बैचलर में मैंने इसी को बेहतर तरीक़े से पढ़ा था. ऐसे में मैंने इसे ही लेना मुनासिब समझा. और इसका फ़ायदा मुझे इंडियन फॉरेस्ट सर्विस वाले इम्तेहान में भी मिला. मैंने इस बार इसमें 310 मार्क्स हासिल किए हैं, जो इस बार का सबसे ज़्यादा नंबर है.

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आसिम को बैडमिंटन खेलना और फुटबॉल देखना पसंद है. फुटबॉल देखना क्यों? ये पूछते ही आसिम कहते हैं कि यहां मुझे फुटबॉल खेलने वाले लड़के मिलते ही नहीं हैं. इसलिए देखकर काम चला लेता हूं. आसिम को फुटबॉल खिलाड़ी मेसी बहुत पसंद हैं और वो इनके सारे मैच देखते हैं.

वो कहते हैं कि यूपीएससी की तैयारी के समय तो मैं सारे मैच देखा करता था, लेकिन अब टेंशन हो रही है कि पता नहीं आगे कैसे देखूंगा. क्योंकि ज़्यादातर मैच देर रात में आते हैं.         

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आसिम यूपीएससी की तैयारी करने वालों से कहते हैं कि, यूपीएससी को तो हम लोग ‘अन-प्रेडिक्टेबल सर्विस कमीशन’ कहते हैं. तो शुरूआत में किसी भी स्टूडेन्ट के लिए थोड़ी सी मुश्किल ज़रूर होती है कि क्या पढ़ें और क्या नहीं पढ़ें. यहां क्या पूछा जाएगा, ये किसी को भी नहीं मालूम. यहां फ्रेमवर्क तो है, लेकिन ये बहुत डायनमिक है. और हां, आपको ज़ेहनी तौर से भी मज़बूत होना पड़ेगा. ये सोच कर चलना होगा कि नाकामी भी हाथ आ सकती है, तो इसके लिए भी आपको तैयार रहना है. और सबसे ज़्यादा मुश्किल तब खड़ी होती है, जब रिश्तेदार व आस-पास के लोग सवाल करने लगते हैं. अपने हिसाब से मश्वरे देने लगते हैं. किसी भी तैयारी करने वालों के लिए ये सबसे बुरे हालात होते हैं.

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मुस्लिम नौजवानों से आसिम कहना चाहते हैं कि, मौजूदा हालात में मुस्लिम नौजवानों को सोशल मीडिया पर चलने वाले प्रोपेगेंडा में नहीं पड़ना चाहिए. उससे ज़्यादा अपने तालीम पर ज़ोर देने की ज़रूरत है. इमोशनल व जज़्बाती होकर कुछ नहीं होने वाला. ज़्यादा बड़बोले लोगों को सुनने से बेहतर है कि जो काम करने वाले लोग हैं, उनकी सुनी जाए, उन्हें फॉलो किया जाए.

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