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तक़लीफ़ -ए-ख़्वातीन : इस शर्मिंदगी से निज़ात मिलना ही 'जन्नत ' है!

तक़लीफ़ -ए-ख़्वातीन :  इस शर्मिंदगी से निज़ात मिलना ही 'जन्नत ' है!

कोरोना महामारी के दौरान किए  लॉकडाऊन में सबसे गहरी तक़लीफ़ का सामना ख़्वातीनो ने किया है। बैंक के बाहर 500 ₹ और राशन डीलर 5 किलो अनाज के लिये भारी संख्या में जुटने वाली महिलाओं के पास दर्द साझा करने के लिए बहुत कुछ है। यह रिपोर्ट पढिये 

 
आस मोहम्मद कैफ़।Twocircles.net प्रवीन जहां (45) खतौली के एक बैंक के बाहर सुबह 6 बजे पहुँच गई थी। खतौली पश्चिमी उत्तर भारत मे मुजफ्फरनगर के एक बड़ा कस्बा है। प्रवीन बताती है कि वहां सुबह 6 बजे भी 41 औरतें लाइन में लगी हुई थी।मेरा नंबर 42 वां था। बैंक 10 बजे खुलना था। तब पहली औरत को एंट्री मिलती। मैं इसलिए जल्दी गई थी कि मुझे पहले एंट्री मिल जायेगी। मगर 41 औरतें मुझसे भी ज्यादा एडवांस थी। बैंक तो सभी के लिए था। मगर सभी को बुर्के में देखकर मुझे लगा कि ये सभी मुसलमान थी।मैं 500₹ लेने के लिए बैंक गई थी। ये सभी भी इसलिए आई थी।सरकार ने जन-धन खाते में प्रत्येक महिलाओं को 500₹ भेजे थे। यह मदद कुछ भी नही थी मगर खासकर मुस्लिम महिलाओं के लिए बहुत कुछ थी।

प्रवीन बताती है कि उसे दोपहर 1 बजे ये पैसे मिले,तब तक लाइन में 500 ही औरतें आ गई थी। कुछ औरतें इसलिए भी आ गई थी कि उन्हें डर था कि अगर ये पैसे न निकाले गए तो वापस चले जायेंगे। प्रवीन यह भी कहती है कि लाइन में खड़ी हुई औरते कह रही थी कि बाज़ार में एक लिपस्टिक आती है जो 500₹ की है और अमीरों की औरतों के पास ऐसी 10-10 रंग की भी होती है।प्रवीन बताती है कि यह अप्रैल की बात है,मई और जून तक भी यही हुआ। मगर सबसे खऱाब हालात मई में हुई। लाइन में खड़ी हुई महिलाओं को महिला पुलिस कर्मी बुरा भला  कहती थी। कभी-कभी लाठी भी मार देती थी। महिलाएं में अधिकांश एक समुदाय से थी वो मुसलमान थी। यह नोटबन्दी से अधिक भयावह था। इस बार लाइन में सिर्फ महिलांए थी। 500₹ महीना पाने की यह जुस्तुजू कोरोना के खतरे को भी चीर रही थी।

बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने इन 500₹ की मदद में रोटेशन प्रणाली लागू कर दी। जिसने इस महिलाओं और अधिक कंफ्यूज कर दिया। सहारनपुर के गांव मुगल माज़रा की अनवरी बेग़म (50) के अनुसार मेरे गांव की औरतों को जब तक रोटेशन समझ में आया तब तक उनका नंबर निकल गया।

मुजफ्फरनगर के मीरापुर की सभासद संतोष देवी बताती है कि राशन कार्ड से रिलेटेड काम के लिए महिलायें उनके घर जुटने लगी। महामारी में इस परिस्थिति से निपटना आसान नही था। अस्थाई राशन कार्ड, पुराने राशन कार्ड, सदस्य सम्मिलित कराना एक महीने में प्रति व्यक्ति को मिलने वाले 5 किलो गेंहू और चावल के लिए जरूरी अहर्ताएं थी। राशन डीलरों ने इस दौरान चांदी काटनी शुरू कर दी। हर एक कोटा डीलर के बाहर बड़ी संख्या में औरतें जुटने लगी।डीलर मनमानी कर रहे थे। महामारी के बीच यह हालत कलेजा छील देने वाले थे।

सहारनपुर के मौहल्ला हिरणवरान की शमीना(44) बताती है कि उन्हें लाइन में लगने के लिए बैंक और राशन डीलर में से एक का चुनाव करना था दोनो में पूरा एक दिन लगना था। सोमवार को मैं पूरे दिन बैंक के बाहर खड़ी थी और मंगलवार को मुझे 3 बजे राशन मिला। बता दें कि नई सरकारी व्यवस्था के मुताबिक महिला को राशन लेने के लिए अपने अंगूठे का माप देनी पड़ती है।

कांधला की यासमीन (29)  इनसे ज्यादा अलग नही है वो कहती है" मई का महीना ही सबसे तक़लीफ़देह था। इस महीने रमज़ान था,काम नही था। मर्द बाहर जाते थे तो पुलिस पिटाई कर रही थी या जुर्माना हो रहा था।बच्चें बिलबिला रहे थे और औरते बैंक और राशन डीलर की दुकान के बाहर दिन भर लाइन लगी थी। जो लोग यह कहते हैं कि 500 ₹ कुछ नही होते हैं उनके लिए यह महिलाओं की भीड़ बहुत कुछ सिखाने के लिए काफ़ी थी।
मुजफ्फरनगर के वसीम अहमद (26) बताते हैं उनके सामने एक मामला हुआ था जब उन्होंने देखा था कि यहां यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के बाहर एक महिला पर तंज करते हुए एक स्थानीय नेता ने कहा था कि औरतों को शर्म आनी चाहिए कि वो 500₹ के लिए सुबह से शाम तक लाइन में खड़ी हुई है,इस पर महिलाओं में बहुत अधिक गुस्सा आ गया और वो नेता पर पिल पड़ी इनमे से एक ने तेज़ आवाज़ में कहा "क्या मर्द जानते हैं कि औरतों को क्या क्या जरूरतें होती है हमारे लिए इस शर्मिंदगी से निज़ात मिलना ही जन्नत है"।
मीरापुर में मैडिकल स्टोर चलाने वाले जाकिर मेवाती (25) कहते हैं उनके मैडिकल स्टोर को 30 साल हो गए हैं उन्होंने कभी खासकर महिलाओं को इतना बेबस और लाचार नही देखा है वो सैनिटेरी पैड्स तक उधार ले जा रही थी।
मेरठ की लिसाड़ी गेट में रहने वाली नेहा(32) कहती है "लॉकडाऊन की इस सबसे बड़ी तक़लीफ़ का एहसास ही औरतों को हुआ है। मर्द लोग तो काम पर नही गए। वो घर पर रहे तनाव पनपा तो अपनी बीवी पर हाथ उठाने लगे।
इससे घरों में कलह अधिक हुई और घरेलू हिंसा की बहुत वारदात हुई।"

फिरदौस के मुताबिक छोटे बच्चें दूध की कमी से बिलख रहे थे। कुछ बच्चें शाम में खीरा खाकर सो जाते थे। बीमारों को दवाई नही मिली। महिलाओं ने सबसे ज्यादा तक़लीफ़ झेली है।जानसठ के रसूलपुर की शमा (35)(बदला हुआ नाम ) की पास बताने की सबसे दर्दनाक कहानी है वो कहती है"यह (शमा के शौहर)फेरी लगाकर कपड़ा बेचते हैं। लॉकडाऊन से पहले यह जयपुर थे। वहां एक महीने से काम नही चल रहा था।

लॉकडाऊन के दौरान वो फंस गए। जैसे-तैसे वापस आ गए। पैसे बिल्कुल नही थे। बीमार हो गए।इन्हें 14 दिन तक घर से बाहर नही जाना था। न ही कोई अंदर आ सकता था। मैंने कई स्थानीय नेताओं,समाजसेवियों और बड़े लोगो के यहां जाकर मदद मांगी ,उन्हें बताया कि घर मे खाने के लिए नही है,उन्हें अपना सही नाम नही बताया और अपने शौहर का भी नही।यहां से जो राशन मिला उसे दुकान पर बेचकर दवाई ली। उसके बाद दूसरी जगह से मदद मांग ली। मैं एक तरह से भिखारिन बन गई मगर मैंने किसी को अपना असली नाम नही बताया।