“मुजफ्फरपुर दंगों की जांच हाशिमपुरा की राह पर”

By TCN News,

‘अजीजपुर गाँव, मुज़फ्फरपुर में दिन दहाड़े हुए साम्प्रदायिक हमलों पर जिस प्रकार सरकार लीपापोती कर रही है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि बिहार सरकार, मुज़फ्फरपुर में हुए साम्प्रदायिक हमलों में वही फ़ैसला देना चाहती है जैसा फ़ैसला उत्तर प्रदेश के हाशिमपुरा नरसंहार में आया है.’ यह बातें कहीं गयीं मुज़फ्फरपुर दंगों पर ‘समाज बचाओ आंदोलन’ द्वारा की गयी एक समीक्षा सभा के दौरान.


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इस सभा में यह बात निकलकर आई कि सरकार और प्रशासन द्वारा आरोपियों को गिरफ्तार करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है. बल्कि एक मुख्य आरोपी पुलिस हिरासत से भाग जाता है और इस बात की जांच भी नहीं होती कि उसे भगाने में किन अफसरों का हाथ है.


Muzaffarpur riots, press conference of Samaaj Bachao Aandolan

स्थानीय राजनेताओं पर आरोप लगाते हुए कहा गया कि पारू के विधायक, उनके भाई और सहयोगियों की इस पूरे कांड में क्या भूमिका है, इसकी समुचित जांच नहीं की जा रही है. विधायक उनके भाई और सहयोगियों के फोन रिकॉर्ड से चेक करने की ज़रूरत है और ये देखा जाए कि वे लोग बहिलवाड़ा और अजीजपुर गाँव के किन लोगों के सम्पर्क में थे? पुलिस अधीक्षक को मुज़फ्फरपुर से अजीजपुर पहुँचने में इतनी देर क्यों हुई, इस बात की जांच अलग से किसी मजिस्ट्रेट द्वारा कराये जाने की ज़रूरत है. पुलिसिया तंत्र पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि, ‘अभी जनता मुज़फ्फरपुर के पुलिस अधीक्षक को इन दंगों के लिए दोषी मानती है, इस लिहाज़ से उनके नज़दीकी रिश्तेदार का पुलिस महानिदेशक बने रहना भी ठीक नही है. इससे न्याय की प्रक्रिया प्रभावित होगी, जांच अधिकारी दबाव महसूस करेंगे और इन्साफ का रास्ता और कठिन होता जाएगा.’

आज भी अजीजपुर गाँव के लोग काफ़ी डरे हुए हैं और सभी लोग इस डर की वजह से गवाही नहीं दे पा रहे हैं. जिन लोगों ने गवाही दी है वे बहुत ही असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.

सरकार द्वारा उनकी सुरक्षा का समुचित उपाय नहीं किया गया है. ऐसे में मुमकिन है कि ये गवाह अदालत में गवाही देने से डरें या पूरी गवाही ना दे पाएं. इसके कारण दोषी छूट जायेंगे और इन मामलों में भी 10-20 साल के बाद वही फैसला आयेगा जो हाशिमपुरा नरसंहार में कुछ दिनों पहले आया है.

समाज बचाओ आंदोलन की इस सभा में दस-सूत्रीय मांगें रखी गयीं, जिसमें मामले को विधानसभा में उठाने से लेकर बजरंग दल पर प्रतिबन्ध की भी मांग की गयी है. साथ ही ऐसे प्रयास करने की मांग की गयी है कि जिससे गाँव वालों के भीतर से गवाही और केस को लेकर सारा डर खत्म किया जा सके.

इस वार्ता में मुख्य संयोजक मोहम्मद काशिफ़ युनुस, अधिवक्ता रेयाज आतिश, सह-संयोजक वीरेंद्र विक्रम सिंह मौजूद थे.

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