दो हैंडपंप, घास की रोटी, भीख और निष्क्रिय सरकारों के बीच बुंदेलखंड के बाशिंदे

TwoCircles.net Staff Reporter

नई दिल्ली: किसानप्रिय राजनीति से सम्बन्ध रखने वाले संगठन ‘स्वराज अभियान’ ने हाल में ही उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के गंभीर सूखा प्रभावित बुन्देलखंड क्षेत्र का एक ताज़ा सर्वे किया. इस सर्वे में सूखे की स्थिति अकाल की और बढ़ती नज़र आ रही है.


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बारिश होने में अभी लंबा वक़्त बाकी हैं लेकिन पीने के पानी का संकट चरम पर है. बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश वाले हिस्से में पानी का गिरता स्तर और भी भयावह हो चुका है. दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में योगेन्द्र यादव ने कहा, ‘समाज का निचला तबका भूख और ग़रीबी झेल रहा है. पशुओं के लिए भुखमरी की स्थिति है. पशुओं के मौत की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है. ऐसे समय में लोग सरकार की ओर देखते हैं लेकिन लोगों का दुर्भाग्य यह है कि यूपी और मध्य प्रदेश दोनों ही राज्य सरकारों ने इस नाजुक मौके पर आँखें मूँद ली हैं.’

योगेन्द्र यादव ने आगे कहा, ‘फ़सल नुकसान का मुआवज़ा पिछले 6 महीने से किसानों तक नहीं पहुंचा है. पीने के पानी के संकट से निपटने में दोनों सरकारों की निष्क्रियता आश्चर्यजनक है.’

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यूपी के 7 जिलों और मध्य प्रदेश के 4 जिलों में प्रभावित बुन्देलखंड क्षेत्र में स्वराज अभियान द्वारा कराये गए सर्वे में आए आंकड़े परेशान करने वाले हैं. स्वराज अभियान ने 2015 के नवम्बर-दिसम्बर के महीने में यूपी के 109 गांवों और मध्य प्रदेश के 63 गांवों में पहले दौर का सूखा प्रभाव आकलन सर्वे किया था.

मध्य प्रदेश के टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना और दतिया जिलों में सर्वे के दौरान जल संकट का भयावह स्वरूप देखा गया. तकरीबन 40 प्रतिशत गांवों में हैंडपंप की संख्या घटकर एक या दो रह गयी है. सिर्फ 18 ऐसे गांव हैं जो सुरक्षित जोन में हैं क्योंकि इन गांवों में 10 से ज्यादा हैंडपंप चालू स्थिति में हैं. उत्तर प्रदेश में भी 14% गाँव ऐसे हैं, जहाँ दो या उससे भी कम हैंडपंप चालू स्थिति में हैं.

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पिछले तीन महीने के कठिन दौर में यूपी के 72% गांवों और मध्य प्रदेश के 74% गांवों में सरकार द्वारा कोई काम न होने की रिपोर्ट है.

सूखा सिर्फ पानी को नहीं मारता. यह खाने को भी ख़त्म कर देता है, इससे कुपोषण उपजता है. स्वराज अभियान की रिपोर्ट इस मामले में रोचक तस्वीर पेश करती है. यूपी के बुन्देलखंड के 59 प्रतिशत गांवों में 10 से ज्यादा परिवारों को दो समय का भोजन भी नहीं मिल पा रहा है. मध्य प्रदेश में ऐसे गांवों की संख्या लगभग 35 प्रतिशत है.

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भोजन के लिए लोग भीख मांग रहे हैं. मजबूरी में जंगली घास ‘फ़िकार’ के बीज खा रहे हैं. घास की रोटियां खाना आम है.

परेशान किसान अपने घरेलू पशुओं को खुला छोड़ रहे हैं. यूपी के 78 प्रतिशत गांवों और मध्य प्रदेश के 62 प्रतिशत गांवों से रिपोर्ट है कि पहले की तुलना में जानवरों को छोड़ देने की प्रक्रिया में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. पिछले हफ़्ते यूपी के 56 प्रतिशत गांवों और मध्य प्रदेश के 44 प्रतिशत गांवों में पशुचारा और पीने के पानी की भारी कमी है. सिर्फ पिछले एक महीने में उत्तर प्रदेश बुन्देलखंड के 41 प्रतिशत गांवों और मध्य प्रदेश बुन्देलखंड के 21 प्रतिशत गांवों में भूखमरी या ज़हर के कारण 10 से ज्यादा पशुओं के मौत की हुई है.

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मामले की गंभीरता को समझाते हुए स्वराज अभियान ने लोगों से बात की. उन्होंने कहा, ‘आपदा की इस स्थिति में दोनों ही राज्य सरकारें अपर्याप्त काम कर रही हैं. यूपी सरकार घोषणाओं और दौरों के मामले में सक्रिय है लेकिन जमीनी स्तर पर कोई कार्य नज़र नहीं आता. मध्य प्रदेश की सरकार ने इस क्षेत्र के लिए अभी तक कोई विशेष घोषणा या व्यवस्था नहीं की है. मध्य प्रदेश सिर्फ़ फ़सल नुकसान का मुआवज़ा देने के मामले में यूपी से बेहतर स्थिति में है. मध्य प्रदेश के लगभग 30 प्रतिशत गांवों में किसानों को मुआवज़ा मिला है जो कि यूपी में नगण्य है.’

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