‘किसानों की हालत 100 साल बाद भी वैसी ही है’

सिराज माही

नई दिल्ली : ‘भारत में आज जो हिंदू-मुस्लिम के बीच विवाद है, इसके ज़िम्मेदार आम लोगों से ज़्यादा हम एक्टिविस्ट हैं. आज के भारत की जो स्थिति है, वह आज की पैदा की हुई नहीं है, बल्कि उसकी तैयारी दशकों पहले की गई थी. 1917 में गांधी ने चम्पारण में तीन स्कूल खोलें, जिन्हें हम बचा नहीं सके. लेकिन 1952 में गोरखपुर में एक स्कूल खुला, आज उसकी 17 हज़ार शाखाएं पूरे भारत में हैं. इन स्कूलों से हर साल लाखों की संख्या में छात्र निकलते हैं. उनको उस स्कूल में एक सोच के तहत शिक्षा दी जाती है. उनकी सोच बनाई जाती है. तो ऐसे में ज़ाहिर है कि वो विचारधारा हर घर में पनपेगी ही.’ 


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ये बातें देश के जाने माने पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने चम्पारण सत्याग्रह के 100 साल पूरे होने पर शनिवार को ऑल इंडिया मुस्लिम मसलिस-ए-मुशावरत के दफ़्तर में आयोजित एक सेमिनार में रखीं. 

आगे उन्होंने कहा कि, चम्पारण एक ऐसी कहानी है, जिसके बहुत सी खिड़कियां खुलनी अभी बाक़ी हैं. चम्पारण में 100 साल बाद भी कुछ नहीं बदला है.

वरिष्ठ पत्रकार व गांधीवादी विचारक अरविंद मोहन ने चम्पारण सत्याग्रह को याद करते हुए आज के भारत की तुलना आज़ादी के वक़्त के भारत से की. उन्होंने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा कि, उस वक़्त तो अंग्रेज़ों का राज था तो किसानों की बुरी हालत स्वाभाविक थी, मगर आज तो देश आज़ाद है, लेकिन आज किसानों की हालत उससे भी बदतर है. आज भी हम देखते हैं कि हर दिन चार से पांच किसान आत्महत्या कर रहे हैं.

उन्होंने बताया कि, चम्पारण में जिनके उम्मीदवारों को 8-10 वोट ही मिलते थें, पर आज सबसे ज़्यादा भाजपा की सीटें चम्पारण से ही हैं. यहां कभी यह देखा जाता था कि हम जिसके घर में शादी करने जा रहे हैं, उसका जुड़ाव किस पार्टी के साथ है. हमने ऐसे कई मामले देखे हैं, जहां रिश्तेदारों के आरएसएस से रिश्ता होने के कारण रिश्ता टूट गया.

उन्होंने आगे कहा कि चम्पारण सत्याग्रह में हिंदू-मुसलमान दोनों की भागीदारी थी. उन्होंने चम्पारण सत्याग्रह की चुनौतियों के बारे में बताया. बता दें कि अरविंद मोहन ने चम्पारण सत्याग्रह पर चार किताबें लिखी हैं. 

राज्यसभा टीवी से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार क़ुर्बान अली ने देश के राष्ट्रीय आन्दोलन के आईडोलॉजी पर अपनी बात रखते हुए कहा कि, धार्मिक उन्माद के आधार पर कोई भी राष्ट्र बनेगा तो ज़्यादा दिनों तक बाक़ी नहीं सकता है. उसका वही हाल होगा जो हाल पाकिस्तान का हुआ. अपने निर्माण के 25 साल के अंदर वो दो टुकड़ों में बंट गया. आगे और उसके चार टुकड़े होंगे. वो अभी बस कश्मीर के नाम पर एक है. लेकिन जिस दिन कश्मीर के समस्या का निदान हो गया, उस दिन पाकिस्तान फिर से चार टुकड़ों में बंट जाएगा.

आगे उन्होंने कहा कि, धार्मिक उन्माद फैलाकर देश को तोड़ने वालों को इससे सबक़ लेने की ज़रूरत है. अगर भारत को एक रखना है तो साम्प्रदायिक सौहार्द बरक़रार रखना होगा. किसी एक सुमदाय विशेष को टारगेट व परेशान करके देश आगे नहीं बढ़ सकता.

अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के इतिहास के प्रोफ़ेसर मोहम्मद सज्जाद ने अपनी बात रखते हुए कहा कि, चम्पारण के आन्दोलन में बहुत से अहम नेता थे, जो 19वीं सदी में भी और 1917 के पहले 1907-08 में भी किसानों को लीडरशीप दे रहे थे. किसानों के मुद्दों को उठा रहे थे. ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके बारे में इतिहासकारों को खोज करनी होगी. उनके बारे में लोगों को बताना होगा कि उनका योगदान क्या है. किसानों को उन्होंने कैसे एकजूट व आंदोलित किया.

आगे उन्होंने कहा कि, चम्पारण सत्याग्रह किसानों का आन्दोलन था. सारे नेताओं की पहचान किसान के रूप में देखा गया. उनके धार्मिक पहचान की कोई महत्व नहीं थी. लेकिन उसी समय पर कुछ लोग धर्म के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश में लगे हुए थे. साम्प्रदायिक तनाव व हिंसा की कई घटनाएं उस समय देखने को मिलती हैं.

इसी सेमिनार में TwoCircles.net से जुड़े पत्रकार अफ़रोज़ आलम साहिल की लिखी किताब ‘शेख़ गुलाब : नील आन्दोलन के एक नायक’ का लोकार्पण हुआ.

इस लोकार्पण के बाद साहिल ने लोगों के समक्ष शेख़ गुलाब के कारनामों की चर्चा की. मौजूदा दौर में चम्पारण में किसानों के हालात के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि, 1907 में जब अंग्रेज़ों ने साठी में किसानों से पईन खर्च के नाम पर 3 रूपया मासिक लेना शुरू किया तो शेख़ गुलाब ने आन्दोलन चलाया, लेकिन आज आज़ाद भारत में उसी साठी गांव में किसानों से पानी के नाम पर 200-300 रूपये घंटा खर्च करना पड़ता है, मगर कोई किसान नेता इस मसले पर बात नहीं करता.

आगे उन्होंने बताया कि, आमतौर लोग सोचते हैं कि शेख़ गुलाब का दौर 1908 तक ही रहा है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि वो जेल से बाहर आने के बाद भी 1912 से फिर सक्रिय नज़र आते हैं. 1917 में वो गांधी के साथ होते हैं. गांधी उनके घर जाते हैं. उनका ऐतिहासिक बयान दर्ज होता है. लेकिन इस बयान को किसी भी इतिहासकार ने कहीं भी दर्ज नहीं किया है. लेकिन ये इतिहास उस वक़्त के प्रताप अख़बार के पन्नों पर ज़रूर दर्ज है.

यह सेमिनार मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी के स्वागत भाषण से शुरू हुआ. इनके अलावा जमीअत अहले हदीस के अध्यक्ष मौलाना असग़र इमाम सल्फ़ी ने भी इस सेमिनार को संबोधित किया. इस सेमिनार का समापन ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत के राष्ट्रीय अध्यक्ष नवेद हामिद के अध्यक्षीय भाषण से हुआ. 

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