एएमयू बिरादरी की राह देख रहा है दंगा पीड़ितों का अधूरा स्कूल

आस मुहम्मद कैफ़, TwoCircles.net


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जौला (बुढ़ाना) : 2013 के मुज़फ़्फ़रनगर दंगो के बाद हज़ारों की संख्या में मुसलमानों ने अपना घर छोड़ दिया था. घर क्या छूटा, बच्चों का स्कूल भी छूट गया. दुनिया भर में मुसलमान दंगा पीड़ित के लिए हमदर्दी का माहौल था.

ऐसे में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी भी मदद के लिए सामने आई. वहां के छात्रों, शिक्षकों ने भी मदद के लिए हाथ बढ़ाया. उस समय के वाईस चांसलर लेफ्टिनेन्ट जनरल ज़मीरूद्दीन शाह ने दंगा पीड़ितों के बच्चों को पढ़ाने के लिए एक स्कूल खोलने की पेशकश की.

ये एक ऐसा क़दम था जिसकी सभी ने तारीफ़ की. स्कूल बनवाने के लिए पैसे जुटाने शुरू हो गए. सर सैय्यद डे का 51 लाख और सभी फैकल्टी का 67 लाख रूपया स्कूल के लिए दिया गया. बड़ी उम्मीदें संजोकर जौला में ये स्कूल बना. लोगों के बीच ये बात चल पड़ी कि ये स्कूल, एएमयू की एक ब्रांच है. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है.

वर्तमान में ये स्कूल एक ट्रस्ट ‘सर सैय्यद एजुकेशनल फाउंडेशन’ के तहत चलाया जा रहा है, जिसके पदाधिकारी पूर्व वी.सी. जनरल शाह और एक सलमान जाफ़री बताए जाते हैं. इस ट्रस्ट का एएमयू के साथ क्या संबंध है, इस बात की पुष्टि नहीं हुई, क्योंकि जनरल शाह से बात नहीं हो पाई और एएमयू के अधिकारियों ने इस मामले में बोलने से इंकार कर दिया. लेकिन स्थानीय लोगों में आज भी ये स्कूल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के स्कूल के रूप में मशहूर है.

इस स्कूल की ग्राउंड रिपोर्ट जानने के लिए TwoCircles.net ने दौरा किया. पेश है एक रिपोर्ट…

बुढ़ाना चौराहे से पश्चिम की ओर 3 कि.मी. चलने पर बायीं तरफ़ बसा एक गांव है —जौला. 10 हज़ार से ज्यादा आबादी वाले इस गांव के ठीक सामने जंगल में बेहद ख़राब रास्ते से लगभग डेढ़ कि.मी. अंदर यह स्कूल है. स्कूल के ठीक सामने ‘आस ब्रिक फील्ड्स’ के नाम ईंट भट्टा है. इन्हीं लोगों की ज़मीन पर यह स्कूल बना है. स्कूल पर कोई बोर्ड नहीं लगा है. स्कूल के बाहर कोई हलचल नहीं है.

मुख्य दरवाज़े के बाहर अलीगढ़ मुस्लिम युनीवार्सिटी के पूर्व वीसी ज़मीरुदीन शाह साहब का पत्थर लगा है. मुख्य गेट बंद है और वहां एक बुजुर्ग बैठे हैं. वो हमें बाहर रुकने को कहते है.

कुछ ही मिनटों में लगभग 40 साल के एक शख्स बाहर आते हैं. इन्हें इंजीनियर साहब कहा जा रहा है. खुद को पत्रकार बताए जाने के बाद वो गेट के बाहर हमसे पूछते हैं —किससे मिलना है? फिर खुद ही मैनेजमेंट व प्रिंसिपल दोनों का स्कूल में ना होना बताते हैं और हमें किसी भी तरह का कोई फोटो खींचने से रोक देते हैं.

अंदर स्कूल में लगे बोर्ड मे स्कूल में 5वीं तक की सीबीएससी बोर्ड की मान्यता का लेटर लगा है. किसी फैकल्टी से बात कराने की बात करने पर वो एक महिला टीचर को लेकर आते है. इनका नाम दानिया रियाज़ है. ये बहराइच की रहने वाली हैं और एएमयू की पुर्व छात्रा रही हैं, फिलहाल यहीं  होस्टल मे रहती हैं. यानी मैनेजमेंट व ऐकेडमिक दोनों पक्ष को रखने के लिए यहां सिर्फ़ दानिया हैं.

हम दानिया से पूछते हैं —क्या इस स्कूल का एएमयू से कोई ताल्लुक़ है? तो दानिया कहती हैं —बिल्कुल नहीं, यह ट्रस्ट का स्कूल है और सीबीएससी से मान्यता प्राप्त है, जैसे दूसरे स्कूल होते हैं. ठीक वैसे ही…

दानिया यह भी बताती हैं कि, यहां 180 बच्चे पढ़ते हैं, सभी आसपास के गांव के हैं. वो यह भी कहती हैं कि हम इनकी फ़ीस लेते हैं. दंगा पीड़ितों को कुछ छूट है.

दानिया बताती हैं कि यहां अक्सर लोग यह सवाल करते हैं कि यहां पढ़ने से क्या उनके बच्चों को अलीगढ़ मे दाखिला मिलेगा, जिसके लिए हम कहते हैं कि इस स्कूल का एएमयू से कोई ताल्लुक़ नहीं है, सिवाय इसके संस्थापक ज़मीरुद्दीन साहब एएमयू के वीसी रहे हैं. दूसरे व्यक्ति जो इस स्कूल से संबंधित हैं, वो हैं सलमान जाफ़री जो दिल्ली के एक बड़े बिल्डर हैं और पूर्व वीसी ज़मीरुद्दीन शाह के बेहद क़रीबी हैं. इस संस्था में वो मुख्य भूमिका में हैं.

हम कुछ बच्चों के यूनिफ़ॉर्म में फोटो खींचना चाहते हैं, मगर इसके लिए हमें फिर एक बार मनाकर दी जाती है. एक करोड़ रुपए से ज्यादा इमदाद पाने वाले स्कूल की दीवारों पर अभी प्लास्टर भी नहीं हुआ है. वैसे स्कूल से बिल्कुल क़रीब एक मस्जिद भी है. और हां, भले ही यहां के स्टाफ़ इस स्कूल का ताल्लुक़ एएमयू से होने से इंकार करें, मगर बनावट बिल्कुल वही दी गई है.

जौला के आस-पास के 24 गांव के चौधरी और बड़े किसान नेता गुलाम मोहम्मद जौला इस स्कूल के बारे में बताते हैं, पहले हमसे कहा गया कि यहां युनिवर्सटी स्कूल खोल रही है. हम ज़मीन देने को राज़ी हो गए, क्योंकि युनिवर्सिटी का नाम ही ऐसा है. बाद में बेनामा अपनी संस्था के नाम कराने लगें. हम गांव के किसान हैं, मगर बेवकुफ़ नहीं. हमने बेनामा नहीं किया. मेरे भतीजे कल्लन खान और छुट्टन खान का नाम पत्थर पर लिखा है. ज़मीन आज भी हमारी है.

हालांकि इस स्कूल की कुछ लोग तारीफ़ भी करते हैं. गांव के पूर्व ज़िला पंचायत सदस्य महबूब जौला कहते हैं, अलीगढ़ युनिवर्सटी का ये स्कूल बहुत बढ़िया है. मेरे बच्चे भी वहीं पढ़ते हैं. पढ़ाई अच्छी है. फ़ीस थोड़ी ज्यादा हैय टीचर भी सब अलीगढ़ के हैं.

वो बताते हैं कि, स्कूल की सुरक्षा एक बड़ा सवाल है. 12 बीघे ज़मीन में बने इस स्कूल के चारों तरफ़ ईख खड़ी है और एक बुजुर्ग गेट पर रहते हैं.

पास के खेत में चारा काट रहे यासीन कहते हैं, यह स्कूल ना दंगा पीड़ितों के लिए है और ना हमारे लिए, यह तो पैसे वालों के लिए है.

दानिया की कही हुई एक और बात याद आती है कि ऐसे 46 स्कूल और चलाने हैं. 8 अक्टूबर, 2014 को लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) ज़मीरुद्दीन शाह ने इस ‘सर सैय्यद नेशनल स्कूल’ की नींव रखते हुए यही बात कही थी.

उधर, एएमयू में इस स्कूल की स्थापना के बाद से ही राजनीति शुरू हो गयी थी. तत्कालीन वी.सी. जनरल शाह पर आरोप लगा था कि वो अपने निजी ट्रस्ट को बढ़ावा दे रहे हैं. मामला आगे बढ़ा और फिर ठन्डे बस्ते में चला गया.

फिलहाल एएमयू का अधिकारिक रूप से स्कूल से कोई सम्बन्ध नहीं है. लेकिन सम्बन्ध कभी रहा भी नहीं है. स्कूल खोलने का इरादा और एएमयू के लोगों की मदद, दंगा पीड़ितों के लिए छोटी सी मदद ही कही जा सकती है.

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