रोहित जैसों की सबसे बड़ी लड़ाई तो उस नफ़रती पहचान से है

नासिरूद्दीन, TwoCircles.net के लिए


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‘…किसी शख़्स की क़ीमत महज़ उसकी पैदाइशी पहचान में समेट कर रख दी गई है. उसकी क़ीमत महज़ उसके ज़रिए लिए जाने वाले फ़ायदे तक सिमट गई है. वह सिर्फ़ एक वोट बन कर रह गया है. उसे सिर्फ़ आंकड़ा बना दिया गया है. कभी किसी शख़्स की हैसियत उसकी दिमाग़ी क़ाबिलियत से नहीं आंकी गई… कुछ लोगों के लिए उनकी ज़िन्दगी ही लानत और बद्दुआ है. मेरी पैदाइश, मेरा जानलेवा हादसा है.’

रोहित वेमुला की मौत के बाद एक और साल गुज़र गया. रोहित को मौत की तरफ़ ढ़केलने के ज़िम्मेदार लोगों पर इन दो सालों में आंच तक नहीं आई. बल्कि कुछ उलटा ही हुआ. मौत के बाद भी उसे अपनी ‘जनमना पहचान’ से जूझना पड़ा. रोहित जिस ‘पहचान’ के साथ और जिसकी वजह से समाज के साथ जद्दोजेहद करता रहा, मौत के बाद वह ‘पहचान’ भी उससे छीनने की पुरज़ोर कोशि‍श की गई.

सबसे ऊपर की सात लाइनें रोहित की लिखी आख़ि‍री चंद लाइनों का हिस्सा हैं. वह जिस पहचान की बात कर रहा है, वह ख़ास क़िस्म की है. न… वह स्टूडेंट, रिसर्च स्कॉलर, विद्वान, लेखक, वैज्ञानिक, खि‍लाड़ी… जैसी पहचान तो क़तई नहीं है.

वह अकेली ‘पहचान’ ही, हमारे समाज की अनेक पहचानों पर भारी है. इसका कमाल ज़बरदस्त है. किसी शख़्स के जन्मते ही यह पहचान -गांव, टोला, मोहल्ला, शहर, स्कूल, कॉलेज, नातेदारी, प्राकृतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थ‍िक संसाधन- सबके साथ रिश्ता तय कर देती है. यह जाति की सामाजिक पहचान है.

हां, यह पहचान कुछ समूह को बहुत ताक़त देती और उनके फ़ायदे की है. वे इसके साथ बखू़बी जीते हैं. इसका लुत्फ़ उठाते हैं. इसलिए वे इस पहचान से परेशान नहीं होते हैं.

मगर यह पहचान, बड़े सामाजिक समूह के लिए ज़िन्दगी के हर मामले में अछूतपन, ग़ैर-बराबरी, भेदभाव, नफ़रत, हिंसा, शोषण और नुक़सान की वजह है.

रोहित इसी दूसरे वाले बड़े सामाजिक समूह से वास्ता रखता था. इन्हें हम आज दलित के नाम से पहचानते हैं. हममें से बहुतों को लगता है कि आज़ादी के 70 साल बाद अछूतपन, गैर-बराबरी या भेदभाव की बातें अब कोरी गप हैं. है न?… क्योंकि हम में से ज़्यादातर की ज़िन्दगी फ़ायदे वाले समूह से वाबस्ता रही है. उस फ़ायदे वाले समूह में हम कितना भी वंचित क्यों न हों, अछूतपन और भेदभाव हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का वैसा हिस्सा नहीं है, जैसा यह दलितों की ज़िन्दगी से चस्पा है. यह वह चीज़ है, जो इंसान को, इंसान मानने से इनकार करती है.

दलित, भारत में रहने वाले हर समुदाय का सच हैं. कहीं यह बहुत गहरा और उजागर है तो कहीं यह ढका-छिपा है. मगर है. इससे इनकार नहीं किया जा सकता है. 

क़रीब सवा सौ साल पहले रत्नागिरी के स्कूल में बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर की ज़िन्दगी से अछूतपन चिपका था. जब वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से पढ़कर आए तब भी वैसा ही अछूतपन, उनको हर जगह घेरे था. उसे अपने साथ चिपकाकर रखना, अम्बेडकर की ख़्वाहिश नहीं थी. उसे तो हटाने से भी हटने नहीं दिया जा रहा था. इसीलिए अम्बेडकर का मानना था कि ‘जातियों के विनाश के बिना, अछूतों की मुक्ति नहीं हो सकती है.’ 

… क़ायदे से तो आज़ादी मिलने और संविधान बनने के साथ इसका लोप हो जाना चाहिए था. मगर बाबा साहेब अम्बेडकर को पता था कि यह इतना आसान नहीं है. याद करें, 25 नवम्‍बर 1949 को संविधान प्रारूप समिति के अध्‍यक्ष के रूप में उन्होंने क्या कहा था. अम्बेडकर ने कहा था —’26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभास से भरी ज़िन्दगी के उस दौर में प्रवेश करने जा रहे हैं, जहां राजनीतिक दृष्टि से हम सब बराबर होंगे, लेकिन सामाजिक और आर्थिक मामलों में गैर-बराबरी झेलते रहेंगे. सामाजिक और आर्थिक मामलों में हम कितने दिनों तक लोगों को बराबरी के अधिकार से वंचित रखेंगे. ज़्यादा दिनों तक गैर-बराबरी को बरक़रार रखने का मतलब लोकतंत्र को ख़तरे में डालना होगा.’

मगर न जाति का विनाश हुआ और न अछूतपन का… और हमारे वक़्त में रोहित जैसों लाखों की ज़िन्दगी से भी जुड़ा है. अभी हाल ही में एक सर्वे ने यह बताने की कोशि‍श की है कि हमारे मौजूदा भारतीय समाज में जातीय भेदभाव और पूर्वग्रह कितना मज़बूत है. इस अछूतपन को जहां टूट जाना चाहिए था, वहां वह तोड़ने की ख़्वाहिश करने वालों को तोड़ने में जुट जाती है. बल्कि शि‍द्दत के साथ वह उन्हें बार-बार याद‍ दिलाती है कि वे इसके ‘लायक़’ नहीं हैं. वे अलग हैं और समाज की सीढ़ी पर सबसे नीचे हैं. स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय वह जगह हैं, जहां सामाजिक गैर-बराबरियों को ख़त्म हो जाना चाहिए. मगर ऐसा कहां हुआ?

आंगनबाड़ी केन्द्र हों या प्राथमिक स्कूल… आज भी छुटपन से ही दलित बच्चे-बच्च‍ियों को इस अछूतपन से गुज़रना पड़ता है.

ज़्यादातर दलित बच्चे-बच्चि‍यों को ‘पैदाइशी पहचान’ से जुड़े कड़वे अनुभव से गुज़रना पड़ता है. अगर हमें यक़ीन न आ रहा हो और हम ख़ुद देखना/समझना चाहते हैं तो किसी भी मिली-जुली बस्ती या दलित टोला में चलने वाले स्कूलों में इस पहचान के असर को आसानी से देख और समझ सकते हैं.

इस पहचान के ज़रिए उन्हें ख़ौफ़ज़दा किया जाता है ताकि उन्हें तालीम से ही डर लगने लगे. मगर कुछ लोग सब झेलते हुए बाहर निकल ही आते हैं और अब ऐसे लोगों की तादाद अच्छी ख़ासी होती जा रही है.

वे बाबासाहेब भीमराव अम्‍बेडकर की इस सलाह पर अमल करने लगे हैं -‘आप सबके लिए मेरी आख़िरी सलाह है- पढ़ें, संघर्ष करें, संगठित हों. ख़ुद पर यक़ीन करें. इंसाफ़ हमारे साथ है. मुझे पक्‍का भरोसा है, जीत हमारी होगी.’

ऐसे ही माहौल में बढ़े और पढ़े लड़के-लड़कियां बड़ी तादाद में अब देश के बड़े नामी कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में पहुंच गए हैं. यह नई पीढ़ी चुपचाप सब बर्दाश्त करने को राज़ी नहीं है. वह सब कुछ ‘भाग्य भरोसे’ मानने को तैयार नहीं है. अब तक जो उन्हें बताया/समझाया गया, वे उसे आसानी से मानने को भी राज़ी नहीं हैं. वे ‘स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की भावना पर आधारित’ अम्बेडकर का ‘आदर्श समाज’ बनाने का ख़्वाब देखते हैं.

रोहित वेमुला और उनके दोस्तों का भी ख़्वाब ऐसा ही है. वे अम्बेडकर के सपनों का समाज बनाने के लिए महज़ अपनी पैदाइशी पहचान तक सिमटे रहने को तैयार नहीं हैं. मगर यह इतना आसान होता तो क्या बात थी. जैसा कि अम्बेडकर बहुत साफ़-साफ़ कहते हैं -‘अस्‍पृश्‍यता की समस्‍या वर्ग संघर्ष का मामला है. यह सवर्ण हिन्‍दुओं और अछूतों के बीच का संघर्ष है. यह किसी एक शख़्स के साथ नाइंसाफ़ी का मामला नहीं है. यह एक वर्ग का दूसरे वर्ग के साथ की जाने वाली इंसाफ़ी है. जैसे ही कोई बराबरी का दावा करता है, यह संघर्ष उसी वक़्त शुरू हो जाता है.’

रोहित जैसों को आज इस संघर्ष से गुज़रना पड़ रहा है. इसलिए अम्बेडकर की सलाह पर चलते हुए वे संघर्ष कर रहे हैं और पढ़ रहे हैं. संगठित हो रहे हैं. संगठित होकर संघर्ष कर रहे हैं. ऐसे ही संघर्ष का अक्स हमें आईआईटी -मद्रास, फ़िल्म एंड टेलिविज़न संस्थान (एफ़टीआईआई)- पुणे, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू), बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर यूनिवर्सिटी जैसे कैम्पस में या गुजरात, मुंबई, सहारनपुर, मुज़फ़्फ़रनगर, सीतापुर, अररिया की सड़कों पर दिखाई देता है.

वैसे रोहित या उन जैसे अपनी ‘पैदाइशी पहचान’ से इतर क्या चाह रहे/रही हैं…

वे बतौर भारतीय नागरिक अपनी बराबरी की पहचान की मांग कर रही/रहे हैं. वे अपने इंसान होने का, इंसानी हक़ मांग रही/रहे हैं. इंसान जैसे सुलूक के लिए मज़बूती से खड़ी हो रही/रहे हैं. इंसानी वक़्त का दावा कर रही/रहे हैं. उनकी ख़्वाहिश है कि दुनिया, उन्हें उनकी मेहनत, उनकी कला, दिमाग़ी ताक़त, सोचने-समझने की स‍लाहियत और वैज्ञानिक कल्पना की उड़ान से पहचानें न कि उनकी ‘पैदाइशी पहचान’ से.

अब इस चाह को कुछ लोग राष्ट्रद्रोह, जातिवादी ज़हर, साज़िश कहने से गुरेज़ नहीं कर रहे हैं. वे ऐसी चाह रखने वाले सभी पर हमलावर हैं. 

क्या ऐसी चाह रखने वाले रोहित वेमुला हों या डोंथा प्रशांत हों या फिर चंद्रशेखर हों या फिर राधि‍का वेमुला या ग्रेस बानो… राष्ट्रद्रोही हो गईं/गए. तब तो इन्हें संगठित हो संघर्ष की सलाह देने वाले अम्बेडकर के बारे में भी तय करना होगा न? क्यों?

(नासिरूद्दीन वरिष्ठ पत्रकार हैं. शोधपरक कामों के लिए जाने जाते हैं. कई कामों के बीच, वे झूठ, नफ़रत और हिंसा के ख़िलाफ़ गांधी के विचारों को आम बनाने की कोशि‍श में जुटे हैं. इसी के इर्द-गिर्द इन्होंने, गांधी जी के विचारों की एक बड़ी प्रदर्शनी भी तैयार की है.)

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