कानूनी दाव पेंच में उलझा बिहार का आदिवासी विद्यालय

फहमीना हुसैन, TwoCircles.net

एक ख्वाब था. ऐसी बच्चियां जो किन्ही कारणों से  स्कूल नहीं जा पाई उनके लिए हॉस्टल की सुविधा वाला एक आवासीय विद्यालय. कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय की योजना कुछ इसी तरह बनायीं गयी. लेकिन पिछले तेरह साल से बिहार नौहट्टा जिला प्रखंड मुख्यालय में आदिवासी समुदाय की लडकियों के लिए ये आज भी एक ख्वाब हैं.


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उनके क्षेत्र में विद्यालय तो 15 दिसंबर 2005 में खुल गया. लेकिन पिछले 3 साल में न वहां टीचर हैं, न ही स्कूल की अपनी बिल्डिंग. एक वार्डन और एक कुक, बस यही सब कुछ इस कस्तूरबा आवासीय विद्यालय में जो अब धीरे धीरे फाइल में सिमट रहा हैं.

पुराना स्कूल

बिहार के नौहट्टा जिला का ये पहला कस्तूरबा गाँधी आवासीय बालिका विद्यालय आदिवासी बहुल क्षेत्र नौहट्टा में में स्थापित किया गया था. जहाँ जिला के पहाड़िये क्षेत्र के पचास आउट ऑफ़ स्कूल बच्चियों का चयन किया गया लेकिन भवन के आभाव में डालमियानगर के मिडिल स्कूल में पढाई की शुरुआत की गई. हालांकि इसके बाद 2006 में जिला प्रशासन ने 50 बच्चियों के लिए भवन का निर्माण कराया.

इसके बाद 15 अगस्त 2007 को डालमियानगर से इसको नए भवन में शिफ्ट कर दिया गया. फिर राज्य शिक्षा अभियान के अंतर्गत 2008 में विधायल में सौ बच्चियों के नामांकन का निर्देश राज्य सरकार की ओर से जारी किया गया. सरकार द्वारा निर्देश जारी तो कर दिया गया लेकिन इस आवासीय विधालय में पचास बच्चियों की ही व्यवस्था रही.

कस्तूरबा गाँधी विद्यालय में पढ़ने वाली संध्या कुमारी और बबिता देवी बताती है कि बरसात में करीब-करीब सभी कमरों में सीड़न है. दो- तीन कमरों के छत  से पानी भी टपकता है. भवन की मरमत की बात पर दोनों बच्चियां बताती है कि, जब से वो यहाँ पढ़ने आई है तब से भवन में किसी भी तरह की मरम्मत के काम को होते नहीं देखा है.

 हालांकि साल 2012 में उस वक़्त के डिस्ट्रिक एजुकेशन ऑफिसर (DEO) नयन रंजन कुमार वर्मा ने विद्यालय के भवन की बदहाल हालत को देखते हुए, किसी दुर्धटना के डर  से विद्यालय को बालिका मिडिल स्कूल, रोहतास में शिफ्ट करा दिया था और साथ ही भवन के हालत पर विरोध FIR भी दर्ज़ कराइ थी. तब से अभी तक कस्तूरबा गाँधी आवासीय विधायल मिडिल स्कूल में ही चलाया जा रहा है.

 इतना ही नहीं ये आदिवासी बहुल क्षेत्र नौहट्टा जिले का ये पहला आवासीय बालिका विद्यालय है लेकिन पिछले तीन सालों से यहाँ किसी भी शिक्षक की व्यवस्था नहीं है.

स्कूल जाने वाला रास्ता

इसी क्षेत्र के स्थानीय लोगों ने बताया कि सालों पहले यहाँ एक-दो महिला टीचर रहा करती थी लेकिन कुछ सालों से यहाँ टीचर की बहाली नहीं है जिससे केवल वार्डन ही पुरे स्कूल को संचालित करती हैं.

आवासीय विद्यालय की वार्डन मंजू महासेठ ने बताया कि विधयालय का ना तो अपना भवन है और ना ही यहाँ शिक्षक की व्यवस्था है. इसके लिए उन्होंने अधिकारी और प्रशासनिक दोनों जगहों पर अनुरोध पत्र कई बार भेजा है. उन्होंने आगे बताया कि बच्चियों को पढ़ाने से लेकर और संचालन के कार्यों को करने में बहुत मुश्किलात पेश आती हैं.

उन्होंने अपने बातचीत में बताया कि अकेले इतने कार्यों को सँभालने के बाद भी उन्हें अपने पोस्ट का सामान्य वेतन ही मिलता है. शिक्षक के ना होने से बच्चियों के शिक्षा में भी कवालिटी एजुकेशन नहीं मिल पा रही है.

बच्चियों की देखभाल और विद्यालय में खाना पकाने का काम करने वाली मालती बताती हैं, वार्डन को अगर किसी मीटिंग, बैठक पर जाना होता है तो उस वक़्त अकेले विद्यालय की देखभाल और संचालन करने में दिक्कत आती है. तीन साल से कोई शिक्षक बहाल हुई नहीं तो अकेला ही वार्डन मैडम को सब कुछ देखना पड़ता है.

कुछ महीनो पहले विद्यालय में पढ़ने वाली बच्चियों के अविभावकों ने सवाल करना शुरू किया उस वक़्त बिहार शिक्षा परियोजना के महिला संभाग प्रभारी डॉ. इन्दू त्रिपाठी ने अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि जिले के 18 प्रखंडों में पदस्थापित विद्यालयों में जितने भी वेकेंट सीट हैं उनको भरने के लिए डीएम के पास प्रस्ताव भेजा जा रहा है. जल्द ही रिक्त पदों पर भर्ती की प्रक्रिया भी शुरू कर दी जायगी.

हालांकि इस बात को गुजरे अब साल होने को हैं लेकिन अभी तक मामला वहीँ का वहीँ है.

जिला BDO बैजू मिश्रा पहले तो सभी सवालों के जवाब देने से मनाही करते हुए केवल उन्होंने इतना बताया कि कस्तूरबा गाँधी विद्यालय की समस्याओं के समाधान के लिए वरिष्ठ अधिकारी अपनी पूरी कोशिश में जुटे हैं. अधिकारीयों से बातचीत जारी है. उन्होंने कहा की इन सभी के निपटारे में कितना वक़्त लगेगा ये कहना मुश्किल है.

बिहार में 68 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय संचालित हैं. इनमें केंद्र सरकार द्वारा प्रति छात्रा 25 हजार रुपये देने का प्रावधान किया गया है. हर साल समय पर छात्रों तक ये राशि पहुँचती है या नहीं?इस बारे में वार्डन से लेकर जिला शिक्षा विभाग अधिकारी तक कुछ भी साफ़ तौर पर बताने को तैयार नहीं.

गौरतलब है कि शैक्षणिक तौर पर पिछड़े ब्लॉकों में बालिका शिक्षा के मद्दे नज़र कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय को सरकार द्वारा शुरू की गई. जिसमे कक्षा 6-8 तक पढाई और आवासीय सुविधा प्रदान की जाती है. इस योजना का शुभारम्भ 2004 में केंद्र सरकार ने सर्वशिक्षा अभियान‎ को बड़ावा देनें के लिए किया था. हालांकि वर्तमान में क्लास को अपग्रेड कर 12 तक की पढाई को मंज़ूरी मिल गई है. 75 प्रतिशत अनुसूचित जाति/जनजाति/अत्यन्त पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक समुदाय की बालिकाओं तथा 25 प्रतिशत गरीबी रेखा से निचे के लोगों का प्रवधान है.

स्कूल परिसर में जमा कचरा

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