सीतामढ़ी हत्याकांड: दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ उठी कार्रवाई की मांग, बढ़ी प्रशासन में बेचैनी

 फ़हमीना हुसैन, TwoCircles.net

हिरासत में जुर्म साबित होने से पहले यातना देना ये कहीं से उचित नहीं है. इसे बारे में मई 2017 में, संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद अटॉर्नी जनरल ने कहा था कि “यातना की अवधारणा हमारी संस्कृति के लिए पूरी तरह से विदेशी है और देश के शासन में इसका कोई स्थान नहीं है.”


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दरअसल 7 मार्च को बिहार के सीतामढ़ी जिले में दो मुस्लिम युवकों को इलाके में चोरी और हत्या के एक मामले को लेकर डुमरा पुलिस ने पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था. जिसके बाद उन दोनों मुस्लिम युवको की पुलिस द्वारा हिरासत में बुरी तरह पिटाई के बाद उनकी मृत्यु का मामला सामने आया.

मृतकों के अंतिम संस्कार से पहले खीचे गए फोटो-वीडियो और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके नाखूनों पर हथौड़े से मार किए जाने के निशान पाए गए. वहीं मामले के सामने आते ही पुलिस विभाग भी हरकत में आ गया. इस मामले में मृतकों के परिवार वालों से मिलकर FIR दर्ज की गई और ड्यूटी पर रहे पांच पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया वहीँ आनन-फानन में कुछ तबादले हुए.

इस घटना को एक सप्ताह से अधिक समय बीत चुका, कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है. बिहार के राज्य प्रशासन की बात करें तो अधिकारियों ने माना है कि हिरासत में हुई इस तरह की मौतों को किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं किया जायगा.

अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष सैय्यद गैयूरुल हसन ने इस पुरे मामले को इंसानी दरिंदगी की इंतहां बताई वही कहा कि घटना के बाद दो दरोगा और एक जमादार को निलंबित किया जा चूका है, लेकिन ये करवाई काफी नहीं है. इस बर्बता के खिलाफ ख़ामोशी इख्तियार कर ली जाये ये मुमकिन नहीं है इसलिए दोषियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज़ होना चाहिए।

वही राजद के जिला अध्यक्ष मोहम्मद शफ़ीक़ खान ने और विधायक सुनील कुशवाहा ने बिहार में बड़े पुलिसिया मनमानी को ज़िम्मेदार ठहराया है. उन्होंने कहा कि बिहार में हालिया तीन सालों में अपराध और पुलिस कस्टर्डी में लगातार मौतों का सिलसिला जारी है. इस मामले में प्रशासन को हरहाल में कारवाही कर सजा दिलानी होगी।


सीतामढ़ी संघर्ष समिति के अध्यक्ष मोहम्मद शम्स शाहनवाज़ ने बताया कि जिला प्रशासन को सौंपी गई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पुलिस की पिटाई की बात तो सामने आई है लेकिन मौत के कारणों को स्पष्ट नहीं किया गया. उन्होंने कहा है कि जेल भेजने के 24 घण्टे के अंदर उनकी मौत होना राज्य प्रशासन पर कई सवाल खड़े कर रहे हैं.

वही इस मामले को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने बिहार पुलिस के इस बर्बरता के खिलाफ छह सप्ताह का समय अंतराल में जवाब माँगा है. साथ ही कई सिविल सोसाइटी प्रतिनिधियों की ओर से सीतामढ़ी में एक एनएचआरसी टीम के तत्काल पर भी राज्य सरकार को पत्र भेजा गया है जिसमे पूर्व के 38 प्रशासनिक अधिकारीयों ने NHRC की गाइड लाइन को फॉलो करने के लिए अपनी सहमति दर्ज़ की है.

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने ‘सीतामढ़ी संघर्ष समिति’ की शिकायत के बाद इस पुरे मामले पर संज्ञान लेते हुए 15 मार्च को पूर्व सिविल अधिकारीयों ने मुख्यमंत्री को एक पत्र भेजा था, जिसमें मांग की गई थी कि पीड़ित परिवारों को कानूनी सहायता, राज्य सरकार से न्यायायिक जांच, और 10 दिनों के अंदर जवाब तलब किया हैं. हस्ताक्षरकर्ताओं में पंजाब के पूर्व डीजीपी जूलियो रिबेरो, असम से प्रकाश सिंह, सीमा सुरक्षा बल पी.के.एच. केरल के थारकन और जैकब पुन्नोज, हैदराबाद के कमल कुमार, महाराष्ट्र के संजीव दयाल, असम के जयंतो एन. चौधरी और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड और मेघालय के एन. रामचंद्रन का नाम भी शामिल है.

दरअसल डुमरा के इस घटना के अलावा भारत में पुलिस अत्याचार की बहुत सारी उदहारण मौजूद है. NHRC द्वारा हर साल प्राप्त होने वाली लगभग 40% शिकायतें पुलिस के खिलाफ हैं – मुख्य रूप से हिरासत में हिंसा के लिए. एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स ने हिरासत में मौतों के जो आंकड़े जारी किए हैं जिसमें 1 अप्रैल 2017 से लेकर 28 अप्रैल 2018 के बीच 1,530 मौतें न्यायिक हिरासत में और 144 मौतें पुलिस हिरासत में हुईं। जिसमें बिहार के 109 मामले हैं.

इस मामले में मानवधिकार सोशल एक्टिविस्ट आलोक कुमार का कहना है कि हिरासत में पुलिस को किसी भी यातना और बर्बता का अधिकार नहीं देता है. जो की अपने आप में एक कानूनन जुर्म है. इस तरह के मामले को लेकर भारत ने 1997 में अत्याचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के समझौते पर हस्ताक्षर भी किए, और बाद में 2013 में देश में केंद्र स्तर पर कानून भी पारित किया गया. उन्होंने बताया कि बिहार के डुमरा का मामले पहला नहीं है. पिछले कुछ सालों में हिंसा का स्तर जहाँ बढ़ा है वहीँ पुलिस कस्टर्डी डेथ रेट भी तेज़ी से बढ़े हैं.

आलोक कुमार ने एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स (एसीएचआर) की ताज़ा रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि पुलिस हिरासत में हुए मौत के अधिकत मामलों की मॉनिटरिंग टाइम टू टाइम नहीं होती, इसके अलावा हिरासत में मौत के मामले या तो एनएचआरसी को बताए नहीं गए या एनएचआरसी द्वारा दर्ज नहीं किए गए.

उन्होंने बताया कि बिहार में पिछले तीन सालों के अंदर लगभग 50 से अधिक मामले में आरोपी पुलिस के ज़ुल्म के शिकार हुए तो कुछ जेल के भीतर पहुच कर दम तोड़ दिए. इस तरह के अधिकतर मामलों में पुलिसकर्मियों पर आरोप पत्र दाखिल किया जाता है जिसमें रिपोर्ट के अनुसार 12 से 14 प्रतिशत पर ही दोष साबित हो पता है. अधिकार मामलों में आरोपी पुलिस कर्मियों पर या तो आरोप साबित नहीं हो पातें या केस अधिक लम्बे समय से चलने के कारण उनकी मॉनिटरिंग नहीं हो पाती.

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