ऐसी पुलिस लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है…

विकास नारायण राय


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जब समझौता बम विस्फोट हुआ था तो पहले अल-क़ायदा और सिमी को लेकर शक किया गया, लेकिन जब हम जांच के दौरान सबूतों को खंगालने लगे तो दो महीने के भीतर ही इंदौर से इसके कनेक्शन जुड़ने लगे.

इस घटना में चाहे कर्नल पुरोहित हों, असीमानंद हों या प्रज्ञा सिंह ठाकुर हों, इस पूरे गिरोह की भूमिका अजमेर, मक्का मस्जिद जैसी घटनाओं में भी थी. जबकि मक्का मस्जिद मामले में पहले मुस्लिम लड़के पकड़ लिए गए थे.

एनआईए की भूमिका के चलते जहां प्रज्ञा ठाकुर बरी हुई तो वहीं इसका लाभ कर्नल पुरोहित को भी मिला.

भाजपा सांसदों द्वारा समझौता कांड के फिर से जांच कराने की मांग गलत है. सबूत सबूत होते हैं और उसके आधार पर किसी भी जांच का निष्कर्ष वही निकलना है.

बटला हाउस मामले पर काफी सवाल उठे, जिसे बहुत पारदर्शी तरीक़े से सरकार जांच कराकर जवाब दे सकती थी. लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं करके लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ मज़ाक़ किया. ऐसे रवैए से लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति लोगों में निराशा फैलती है, जो लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है.

पुलिस को मिलिट्राइज़ नहीं, बल्कि डेमोक्रेटाइज़ करने की ज़रूरत है. लोकतंत्र के कमज़ोर होने के चलते राज्य शक्ति उससे खेल रही है. शासन की जो राजनीतिक भाषा है वह पुलिस की भाषा बनती जा रही है. हमारे देश की पुलिस पीपीपी माॅडल जैसी ट्रेनिंग पाई है. रूल ऑफ लाॅ में हम किसी से पीछे नहीं हैं, लेकिन रोल ऑफ लाॅ न होने की वजह से लोकतंत्र कमज़ोर होता है.

पुलिस की ट्रेनिंग ही इस तरह हो रही है कि उनका राजनीतिक और आपराधिक इस्तेमाल बहुत आसानी से हो जाता है. ऐसी पुलिस लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है.

(ये बातें आज समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट की जांच करने वाली एसआईटी के प्रमुख रहे हरियाणा कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी विकास नारायण राय ने रिहाई मंच की ओर से बटला हाउस फ़र्ज़ी मुठभेड़ की 9वीं बरसी पर यूपी प्रेस क्लब लखनऊ में आयोजित सेमिनार में कहा है.)

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